देश को कमजोर करने वाली बात न करें

एल.एस. हरदेनिया : संघ परिवार के दो प्रमुखों द्वारा पिछले दिनों ऐसी बातें कही गई हैं जो विवादग्रस्त तो हैं, साथ ही देश को बांटने और कमजोर करने वाली हैं।...

एल.एस. हरदेनिया

संघ परिवार के दो प्रमुखों द्वारा पिछले दिनों ऐसी बातें कही गई हैं जो विवादग्रस्त तो हैं, साथ ही देश को बांटने और कमजोर करने वाली हैं। इनमें से पहली बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कही है और दूसरी बात संघ के स्वयंसेवक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कही है।
डॉ. मोहन भागवत ने आगरा में शिक्षकों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से हिन्दुओं को किसने रोका है। इसके पूर्व भी भागवत हिन्दुओं का आह्वान कर चुके हैं कि एक परिवार में कम से कम चार बच्चे पैदा हों। हिन्दुओं से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील करने के पीछे यह डर है कि मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं और यदि यह सिलसिला नहीं रोका गया तो भारत में मुसलमानों की आबादी हिन्दुओं से ज्यादा हो जाएगी और एक दिन ऐसा आएगा जब देश की सत्ता पर मुसलमान काबिज हो जाएंगे। यह डर पूरी तरह से बेबुनियाद है। मुसलमान इस देश में सैंकड़ों वर्षों से रह रहे हैं। इस दौरान अनेक वर्षों तक देश की सत्ता उनके हाथ में रही। इतने लंबे समय में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से ज्यादा नहीं हो सकी तो अब कैसे अगले दस-बीस साल में ऐसा हो सकेगा।
इतिहास का सबक है कि सत्ता काबिज होने में अकेली जनसंख्या मददगार नहीं होती है। यदि ऐसा होता तो लगभग एक लाख अंग्रेज 200 सालों तक हमारे देश पर शासन नहीं कर पाते।
भागवत कहते हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से हिन्दुओं को किसने रोका है। इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि गरीबी, कुपोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, स्कूलों और घरों में शौचालयों का न होना, लाखों लोगों के सिर पर छत का न होना, बंबई समेत अनेक शहरों में लाखों की संख्या में लोग आकाशतले ही जीवनयापन करते हैं। शहरों के फु टपाथ उनके लिए महलों के समान होते हैं। ठंड के दिनों में खुले आकाश में सोने के कारण हजारों लोगों की मृत्यु हो जाती है। फिर सारी दुनिया में दो से ज्यादा बच्चे पैदा करने की प्रथा लागू है। चीन ने एक परिवार में एक बच्चे की नीति अपनाई, फिर हमने दो बच्चों की नीति अपनाई है।
फिर हमारी एक विशेष समस्या है। हम दलितों को कीड़े-मकोड़ों से बदतर मानते हैं। उन्हें हम अपने पास नहीं बिठाते हैं, वे हमारे नल से पानी नहीं ले सकते, वे हमारे घर के सामने से जूते पहनकर नहीं निकल सकते हैं। स्कूलों में मध्यान्ह भोजन के समय उनके बच्चे हमारे बच्चों के साथ भोजन नहीं कर सकते हैं। गौहत्या और गौमांस रखने पर हम उनकी पिटाई करते हैं। हम दलित सरपंच को स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर झंडा नहीं फहराने देते। यद्यपि हम उन्हें हिन्दू मानते हैं इसके बावजूद हम उन्हें हिन्दू देवताओं के बीच फटकने नहीं देते हैं। इस तरह वे हमसे पूछ सकते हैं कि वे ज्यादा बच्चे क्यों पैदा करें?
फिर यह भी पूछा जा सकता है कि स्वयं भागवत और संघ के हजारों प्रचारकों ने अविवाहित रहने की कसम क्यों खाई है। इस तरह लोगों के बारे में ही कहा गया है ‘पर उपदेश कुशल बहतेरे’। संघ प्रमुख का यह नारा देश को कमजोर करने का नारा है।
ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील के स्थान पर यदि सरकार और समाज से जीवनस्तर के ऊंचा करने की अपील करते तो बेहतर होता। इस समय देश में, मध्यप्रदेश समेत अनेक राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का राज है। परंतु इन राज्यों में से अकेले मध्यप्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में कितनी दयनीय स्थिति है यह यूनिसेफ द्वारा किए गए सर्वेक्षण के नतीजे से स्पष्ट हुआ है। सर्वेक्षण के नतीजे दिल दहलाने वाले हैं। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अगले 15 वर्षों के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किए थे। लक्ष्यों को मिलेनियम डेवलपमेंट लक्ष्य कहा गया था। इन लक्ष्यों की संख्या आठ थी। इन लक्ष्यों का संबंध, भूख, शिक्षा, लैंगिक समानता, बच्चों का स्वास्थ्य, माताओं का स्वास्थ्य, बीमारियों से छुटकारा आदि से था। यूनिसेफ के सर्वेक्षण के अनुसार इन सभी लक्ष्यों की प्राप्ति में मध्यप्रदेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी पीछे हैं। जो स्थिति मध्यप्रदेश की है लगभग वही स्थिति सभी बीमारू राज्यों (बिहार, उत्तरप्रदेश और राजस्थान) की होगी।
इन राज्यों में देश की आधी से ज्यादा आबादी रहती है। इतने भयावह अभावों के चलते ज्यादा बच्चों को पैदा करने का आह्वान बेमानी है और देश को कमजोर करने वाला है।
इसी तरह दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के प्रस्तावित भवन के भूमिपूजन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने आजाद भारत में जितना संघर्ष किया है और यातना भुगती है वह आजादी के आंदोलन के दौरान कांग्रेस द्वारा झेली गईं यातनाओं से कहीं ज्यादा है। जैसा कि अनेक लोगों ने कहा है कि वैसे तो प्रधानमंत्री का यह कथन ऐतिहासिक दृष्टि से बेबुनियाद है वहीं उन लोगों का अपमान है जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गोलियां खाईं, जेलों में लंबे समय तक यातनाएं भोगीं। वैसे मोदी जी को यह ध्यान रखना चाहिए कि आजादी के आंदोलन की कांग्रेस और आज की कांग्रेस में काफी अंतर है। आज की कांग्रेस मात्र एक राजनीतिक पार्टी है जबकि आजादी के संघर्ष को नेतृत्व देने वाली कांग्रेस एक आंदोलन थी। उस समय की कांग्रेस में ऐसे अनेक समूह शामिल थे जो आजादी मिलने के बाद कांग्रेस से अलग हो गए। इस तरह के समूहों में सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट के अलावा सुभाषचन्द्र बोस द्वारा गठित फार्वर्ड ब्लाक भी शामिल थे। आजादी के आंदोलन के शीर्षस्थ नेताओं में राजगोपालाचार्य शामिल थे जिन्होंने आजाद भारत में स्वतंत्र पार्टी का गठन किया था। आजादी के आंदोलन में कांग्रेस के हजारों नेता व कार्यकर्ताओं ने लंबे समय तक जेल की यातनाएं भुगती थीं। सैंकड़ों लोग ब्रिटिश पुलिस की गोली से मारे गए। हजारों महिलाएं विधवा हो गईं, बच्चे अनाथ हो गए। इसकी तुलना में भाजपा के कार्यकर्ता आपातकाल में थोड़े समय जेल में रहे और शायद आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष करते हुए भाजपा के एक भी कार्यकर्ता को पुलिस की गोली नहीं खाना पड़ी। फिर आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष अकेले भाजपा ने नहीं किया। आपातकाल के विरूद्ध संघर्ष करने वालों में अनेक ऐसे लोग भी थे जो कुछ समय पहले तक कांग्रेस के सदस्य भी थे। इनमें एक समय कांग्रेस के नेता रहे मोरारजी भाई भी शामिल थे। आपातकाल का विरोध करने वाले सर्वश्रेष्ठ नेता जयप्रकाश नारायण थे, जिनका भाजपा से कोई लेना-देना नहीं था। इसके अतिरिक्त अनेक कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों ने आपातकाल का विरोध किया था।
इस तरह आजाद भारत में भी जिन्होंने किन्ही कारणों से संघर्ष किया है उनमें भी सभी तरह के लोग शामिल थे। इस तरह नरेन्द्र मोदी जब परतंत्र और आजाद भारत के संघर्षों की तुलना करते हैं तो वे इतिहास के साथ मजाक करते हैं और आजादी के आंदोलनों के शहीदों का अपमान करते हैं।


 

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