गांधी की धर्मनिरपेक्षता के असली वारिस सरदार

शेष नारायण सिंह : आज गोधरा को एक अलग सन्दर्भ में याद किया जाता है लेकिन पंचमहल जिले के इस कस्बे में भारत की आ•ाादी के इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानी भी शुरू हुई थी जब 1917 में यहां गुजरात सभा का राजनीतिक सम्मलेन हुआ था।...

शेष नारायण सिंह

आज गोधरा को एक अलग सन्दर्भ में याद किया जाता है लेकिन पंचमहल जिले के इस कस्बे में भारत की आजादी के इतिहास की सबसे दिलचस्प कहानी भी शुरू हुई थी जब 1917 में यहां गुजरात सभा का राजनीतिक सम्मलेन हुआ था। सरदार तो उनको बाद में कहा  गया लेकिन 1917 में वे बैरिस्टर वल्लभभाई पटेल थे जो अपने बड़े भाई वि_लभाई को वचन दे चुके थे कि वे राजनीति से दूर रहेंगे। लेकिन अहमदाबाद में म्युनिसिपल चुनावों की राजनीति में दोस्तों के कहने से थोड़ा रुचि ले रहे थे। राजनीति से इस $कदर दूर थे कि जब महात्मा गांधी अहमदाबाद के गुजरात क्लब गए तो वल्लभभाई पटेल उनसे मिलने तक नहीं गए। लेकिन 1917 में सरदार पटेल बिल्कुल राजनीति में कदम रखने के लिए तैयार थे। अहमदाबाद नगरपालिका की राजनीति के अलावा वे महात्मा गांधी की राजनीति से इतना प्रभावित हो चुके थे कि अपनी वकालत के साथ साथ भाषण वगैरह भी देने लगे थे। वे सितंबर 1917 में महात्मा गांधी के स्वराज अभियान के लिए जनमत तैयार कर रहे थे। यह अलग बात है कि तब तक वे महात्मा गांधी से मिले नहीं थे। उनकी मुलाकात अक्टूबर 1917 में हुई जब महात्मा गांधी गुजरात सभा के राजनीतिक सम्मलेन के लिए गोधरा पधार। यहीं पर सरदार पटेल को गुजरात सभा का सचिव बनाया गया। बाद में इसी गुजरात सभा को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गुजरात इकाई यानी गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नाम दे दिया गया। इसी गोधरा में महात्मा गांधी ने देश की आजादी की लड़ाई की कई नई शुरुआतें कीं। इसके पहले भारत में जितने भी राजनीतिक सम्मलेन होते थे ब्रिटेन के सम्राट के प्रति वफादारी का प्रस्ताव पास किया जाता था। महात्मा गांधी ने उस प्रस्ताव को फाड़कर फेंक दिया और कहा कि इसकी जरूरत नहीं है।  इसी गोधरा सम्मलेन में महात्मा गांधी ने कहा कि स्वराज तब तक नहीं आएगा जब तक कि किसानों को साथ नहीं लिया जाएगा इसलिए जरूरी है कि सभी लोग भारतीय भाषाओं में भाषण करें। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तो मराठी में बोले लेकिन कांग्रेस के बड़े नेता मुहम्मद अली जिन्ना अंग्रे•ाी के अलावा किसी भाषा में बोलने को तैयार नहीं थे। महात्मा गांधी ने उनको  उनकी मातृभाषा गुजराती में भाषण देने के लिए मजबूर कर दिया। जिन्ना की महात्मा गांधी से बहुत सारी नाराजगियों में एक नाराजगी यह भी है क्योंकि बिल्कुल अंग्रेजीपरस्त बन चुके जिन्ना गुजराती में ठीक से बोल नहीं पाते थे। यह बात 1944 में महात्मा गांधी ने अपने साथ बैठे लोगों को  बताई थी।  भारत की आजादी की लड़ाई में गोधरा का एक और महत्व है। वल्लभभाई पटेल के अलावा यहीं एक और राजनीतिक स्तम्भ को महात्मा गांधी ने अपने साथ ले लिया। 1917 में ही एक  बेहतरीन वकील और लेखक महादेव देसाई को भी महात्मा गांधी ने अपने साथ ले लिया। सरदार पटेल और महादेवभाई देसाई की दोस्ती का भारत की आजादी में बहुत योगदान है। यह दोस्ती इसी गोधरा में गुजरात सभा के राजनीतिक सम्मेलन में शुरू हुई थी और महादेव भाई देसाई के अंतिम समय 1942 तक चली। महादेवभाई महात्मा गांधी के साथ पूना के आगा खान पैलेस में गिरफ्तार किये गए थे और वहीं महात्मा जी की मौजूदगी में उनकी मृत्यु हुई थी। अहमदनगर जेल में बंद सरदार पटेल को जब यह खबर मिली तो  उन्हें बहुत तकलीफ हुई थी।
गोधरा से महात्मा गांधी का साथ सरदारश्री को मिला और उसके बाद वे रुके नहीं। जब गुजरात सभा को गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी बना दिया गया तो वल्लभभाई उसके पहले अध्यक्ष हुए। सारे देश में उनकी राजनीतिक पहचान महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन से बनी। इस आन्दोलन के शुरू होते ही वल्लभभाई ने गुजरात के लगभग सभी गांवों की यात्रा की, कांग्रेस के करीब 3 लाख सदस्य भर्ती किए और करीब 15 लाख रुपया इक_ा किया। सन् 1920 के 15 लाख रुपये का मतलब आज की भाषा में बहुत ज़्यादा होता है। और यह सारा धन गुजरात के किसानों से इकठ्ठा किया गया था। सरदारश्री के जीवन का वह दौर शुरू हो चुका था जिसके बाद उन्होंने गांधीजी की किसी बात का विरोध नहीं किया। कई मुद्दों पर असहमति जरूर दिखाई लेकिन जब फैसला हो गया तो वे महात्मा जी के फैसले के साथ रहे। असहयोग आन्दोलन के दौर में जब गोरखपुर के चौरी चौरा में किसानों ने पुलिस थाने में आग लगा दी तो महात्मा गांधी ने आन्दोलन वापस ले लिया। उनको आशंका थी कि उसके बाद अंग्रे•ाी राज का दमनचक्र उसी तरह से चल पड़ेगा जैसे 1857 के समय में हुआ था। कांग्रेस के बाकी बड़े नेता आन्दोलन वापस लेने का विरोध करते रहे लेकिन वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी का पूरा समर्थन किया। राजनीतिक कार्य के साथ उन्होंने अपने एजेंडे में शराब, छुआछूत और जातिप्रथा के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया। गुजरात के तत्कालीन विकास में सरदार पटेल के इस कार्यक्रम का बड़ा योगदान माना जाता है।
1928 में गुजरात के कई जिलों में भयानक अकाल पड़ा लेकिन अंग्रेजी सरकार किसी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं थी। बारडोली में यह अकाल सबसे अधिक खौफनाक था। महात्मा गांधी का अहिंसा पर आधारित राजनीति का सिद्धांत असहयोग आन्दोलन के दौरान जांचा परखा जा चुका था। सरदार पटेल ने अहिंसा पर आधारित असहयोग आन्दोलन चलाकर अकालग्रस्त बारडोली में एक स्थानीय असहयोग आन्दोलन शुरू किया। किसानों ने खेत का लगान देने से मना कर दिया। मूल असहयोग बारडोली में हुआ लेकिन गुजरात के कई इलाकों में सहानुभूति में आन्दोलन तैयार हो गया। सरकार भी जनता को कुचल देने पर आमादा थी। गिरफ्तारियां हुईं, जब्ती हुई लेकिन वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में आन्दोलन जोर पकड़ता गया। एक मुकाम ऐसा आया जब सरकार को मजबूर कर दिया गया कि वह आन्दोलन को समझौते के आधार पर खत्म करे। किसानों की जमीन आदि सब वापस मिल गई। इसी आन्दोलन में उनके साथियों ने वल्लभ भाई पटेल को सरदार कहना शुरू कर दिया था। इसी आन्दोलन ने भारत को आ•ाादी की लड़ाई का सरदार जिसने महात्मा गांधी को हमेशा समर्थन किया और जवाहरलाल नेहरू को वह सब करने का मौका दिया जिससे वे महान बने। यहां यह ध्यान रखना पड़ेगा कि सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू में बहुत अच्छी दोस्ती थी और जवाहरलाल अपने बड़े भाई सरदार पटेल की हर बात मानते थे।
महात्मा गांधी के सही मायनों में वारिस सरदार पटेल ही थे। 1920 से 30 जनवरी 1948 तक सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की हर बात को स्वीकार किया था। यहां तक कि जब 1946 में मौलाना आजाद के बाद कांग्रेस अध्यक्ष चुनने की बात आई तो सब की इच्छा थी कि सरदार पटेल ही अध्यक्ष बनें क्योंकि 1946 का अध्यक्ष ही आजाद भारत की सरकार का प्रधानमंत्री होता। कांग्रेस कार्यकारिणी में 26 सदस्य थे जिनमें 23 सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। केवल जवाहर लाल नेहरू, मौलाना आजादी और रफी अहमद किदवई उनके खिलाफ थे। चुनाव होना था। सरदार पटेल और जवाहर लाल नेहरू के बीच चुनाव होना था। बैठक शुरू हो गई थी।  लेकिन उसी बीच सरदार पटेल की बेटी मणिबेन ने महात्मा गांधी को एक चिट्टी लाकर सरदार को दे दी। सरदार ने  चि_ी पर एक नजर डाली और उसको कुरते की जेब में डाल लिया। उसके बाद उन्होंने जवाहर लाल नेहरू का नाम प्रस्तावित कर दिया, अपना नाम वापस ले लिया। जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष और बाद में वाइसराय के काउन्सिल के उपाध्यक्ष बने। समाजवादी चिन्तक मधु लिमये अक्सर कहा करते थे कि अगर सरदार पटेल का पूर्ण सहयोग जवाहर लाल को न मिला होता तो भारत वह न होता जो बन पाया। आ•ाादी के बाद सरदार पटेल केवल सवा दो साल जीवित रहे लेकिन जो काम उन्होंने उस कालखंड में कर दिया वह बहुत सारे लोग कई जिंदगियों में न कर पाते। देशी रियासतों को भारत में मिलाने का काम सरदार पटेल ही के बस की बात थी, जिसको उन्होंने बखूबी पूरा किया। हैदराबाद के निजाम को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू को कई बार नजरअंदाज भी किया लेकिन निजाम को बदमाशी नहीं करने दिया। कश्मीर के मामले में भी सरदार पटेल ने वहां के राजा को साफ बता दिया कि जब तक भारत में विलय के दस्तावेज पर दस्तखत नहीं करोगे कबायली और पाकिस्तानी फौज के हमले से नहीं बचाएगें। वही हुआ।
आजादी के बाद से ही नेताओं और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सरदार पटेल मुस्लिम विरोधी और आरएसएस का हमदर्द बताता रहा है। उन लोगों की जानकारी के लिए यह बताना जरूरी है कि आरएसएस पर प्रतिबन्ध तो कई बार लगा लेकिन भारत के गृहमंत्री सरदार पटेल ने आरएसएस का संविधान लिखने के लिए उनके नेताओं को मजबूर किया था और उनके  सरसंघचालक को गिरफ्तार किया था। इतिहास सरदार पटेल को मुस्लिम दोस्त के रूप में भी याद रखेगा। जब भी सरदार का आकलन होगा उनको मुसलमानों सहित सभी भारतीयों के शुभचिंतक के रूप में याद किया जाएगा। सरदार पटेल महात्मा गांधी की धर्मनिरपेक्षता की समझ के असली वारिस थे। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराजÓ में  देश की आजादी के सवाल को हिंदू-मुस्लिम एकता से जोड़ा है। उन्होंने लिखा है - ''अगर हिंदू माने कि सारा हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक-मुल्की हैं, वे देशी-भाई हैं और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा।ÓÓ
महात्मा गांधी ने अपनी बात कह दी और इसी सोच की बुनियाद पर उन्होंने 1920 के आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल प्रस्तुत की, उससे अंग्रेजी शासकों को भारत के आम आदमी की ताकत का अंदाज लग गया। आजादी की पूरी लड़ाई में महात्मा गांधी ने धर्मनिरपेक्षता की इसी धारा को आगे बढ़ाया। लेकिन अंग्रेजी सरकार हिंदू-मुस्लिम एकता को किसी कीमत पर कायम नहीं होने देना चाहती थी। उसने कांग्रेस से नाराज जिन्ना जैसे  लोगों की मदद से आजादी की लड़ाई में अड़ंगे डालने की कोशिश की और सफल भी हुए। बाद में कांग्रेसियों के ही एक वर्ग ने सरदार को हिंदू संप्रदायवादी साबित करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। भारत सरकार के गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 16 दिसंबर 1948 को घोषित किया कि सरकार भारत को ''सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए कृत संकल्प है।ÓÓ (हिंदुस्तान टाइम्स-17.12.1948)।
सरदार पटेल को इतिहास मुसलमानों के एक रक्षक के रूप में भी याद रखेगा। सितंबर 1947 में सरदार को पता लगा कि अमृतसर से गुजरने वाले मुसलमानों के काफिले पर वहां के सिख हमला करने वाले हैं। सरदार अमृतसर गए और वहां करीब दो लाख लोगों की भीड़ जमा हो गई जिनके रिश्तेदारों को पश्चिमी पंजाब में मार डाला गया था। उनके साथ पूरा सरकारी अमला था और सरदार पटेल की बहन भी थीं। भीड़ बदले के लिए तड़प रही थी और कांग्रेस से नाराज थी।  सरदार ने इस भीड़ को संबोधित किया और कहा, ''इस शहर से गुजर रहे मुस्लिम शरणार्थियों की सुरक्षा का जिम्मा लीजिए... मुस्लिम शरणार्थियों को सुरक्षा दीजिए और अपने लोगों की ड्यूटी लगाइए कि वे उन्हें सीमा तक पहुंचा कर आएं।ÓÓ सरदार पटेल की इस अपील के बाद पंजाब में हिंसा नहीं हुई। कहीं किसी शरणार्थी पर हमला नहीं हुआ।
आज उन्हीं सरदार पटेल का जन्मदिन है। सरदार आज होते तो 140 साल के होते।
sheshji@gmail.com


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