अच्छे दिन कहां हैं प्रधानमंत्रीजी!

सीताराम येचुरी : कश्मीर की घाटी में बाढ़ की तबाही का तांडव फिर शुरु हो चुका था। जम्मू-कश्मीर राज्य पर और आस-पड़ोस के इलाकों पर इस बाढ़ का असर जल्द ही नजर आने लगेगा। यह राज्य पिछले साल की बाढ़ से हुई तबाही से उबर भी नहीं पाया था कि दोबारा बाढ़ की चपेट में आ गया। याद रहे कि पिछली बाढ़ के बाद, राहत तथा पुनर्वास के जो वादे किए गए थे, उनका असर राज्य के कई हिस्सों में और खासतौर पर कश्मीर में जनता के बीच दिखाई देना शुरु तक नहीं हुआ था।...

सीताराम येचुरी

कश्मीर की घाटी में बाढ़ की तबाही का तांडव फिर शुरु हो चुका था। जम्मू-कश्मीर राज्य पर और आस-पड़ोस के इलाकों पर इस बाढ़ का असर जल्द ही नजर आने लगेगा। यह राज्य पिछले साल की बाढ़ से हुई तबाही से उबर भी नहीं पाया था कि दोबारा बाढ़ की चपेट में आ गया। याद रहे कि पिछली बाढ़ के बाद, राहत तथा पुनर्वास के जो वादे किए गए थे, उनका असर राज्य के कई हिस्सों में और खासतौर पर कश्मीर में जनता के बीच दिखाई देना शुरु तक नहीं हुआ था। पिछले साल बाढ़ की भयावह मार से अपनी रोजी-रोटी के साधन गंवा बैठे लाखों लोगों तक जरूरी राहत न पहुंचने के लिए पहले तो राज्य विधानसभा के चुनावों को बहाना बनाया गया। और चुनाव के बाद बहाना बनाया गया, राज्य में सरकार के गठन के लिए पीडीपी और भाजपा के बीच चली लंबी बातचीत को। सरकार बनाने के नाम पर, वास्तव में सत्ता की मलाई के बंटवारे के लिए, यह सरासर सिद्घांतहीन गठजोड़ खड़ा करने में स्वाभाविक रूप से लंबा समय लगा।  सरकार कायम होने के बाद, जनता को राहत पहुंंचाए जाने की कोई नौबत आने से पहले ही, दोबारा बाढ़ की विनाशलीला शुरु हो गयी। यह बहुत ही जरूरी है कि केंद्र सरकार, जम्मू-कश्मीर की जनता तथा सरकार, दोनों के लिए सामग्री तथा साज-सामान की सभी संभव मदद मुहैया कराए, ताकि बाढ़ पीडि़तों के लिए राहत व पुनर्वास के फौरी तथा दूरगामी, दोनों ही तरह के उपायों पर फौरन काम शुरू हो सके।
इसके साथ ही साथ, शेष देश में भी विशाल इलाके में काश्तकारों को बेमौसमी बारिश और ओलों से फसलों की भारी तबाही झेलनी पड़ी है। लेकिन, इस तबाही की चपेट में आए करोड़ों किसानों तथा गांववासियों की तकलीफ कम करने में जुटने के बजाय, भाजपा के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार तो इस नुकसान को घटाकर आंकने में ही व्यस्त है। केंद्र सरकार ने 181 लाख हैक्टेयर भूमि पर खड़ी फसल के बर्बाद होने के आरंभिक अनुमान को घटाकर, अब 106 लाख हेक्टेयर कर दिया है। वास्तव में बिहार सरकार ने तो इन तिकड़मों पर तीखी प्रतिक्रिया करते हुए, केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह राज्यों पर ''दबाव डाल रही हैÓÓ कि तबाही से प्रभावित रकबा कम कर के दिखाएं। (द हिंदू, 31 मार्च 2015) याद रहे कि अब तक पूरे 14 राज्यों ने फसल के भारी नुकसान का दावा किया है। इनमें बिहार के अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश तथा महाराष्टï्र भी शामिल हैं।
इससे देश में पहले ही बना हुआ गहरा कृषि संकट और भी गहरा हो गया है। खरीफ की पिछली फसल में बुआई के कुल रकबे में शुद्घ गिरावट तो पहले ही दर्ज हो चुकी थी। आजा दी के बाद यह पहला ही मौका था जब इस तरह की गिरावट दर्ज हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि चूंकि खेती से अब जैसे-तैसे कर के गुजारा करने भर के लायक आय भी नहीं हो रही है, बढ़ती संख्या में किसान खेती का रोजगार छोड़ रहे हैं। इसमें अचरज की कोई बात भी नहीं है। वास्तव में यूपीए-द्वितीय की सरकार के अंतिम वर्ष में, उस सरकार के वित्त मंत्री शरद पवार ने खुद संसद में यह स्वीकार किया था कि पिछले तीन साल में केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य, केंद्रीय कृषि लागत तथा मूल्य ब्यूरो के आकलन के हिसाब से, उत्पादन लागत में हुई बढ़ोतरी से धीमी गति से बढ़ा था। खेती के काम के लिए किसान ऋण लेते हैं। लेकिन, खेती के गैर-लाभकारी काम हो जाने के चलते, कर्ज के बढ़ते बोझ के नीचे दबे अनेक किसानों को आत्महत्या करने में मुक्ति दिखाई देती है।
इसी सब का नतीजा है कि किसानों के हताशा में आत्महत्या करने के प्रकरण बढ़ते ही जाते हैं। उक्त रिपोर्ट के ही अनुसार, ''बेमौसमी तूफानों ने उपजाऊ उत्तरी मैदान के विशाल हिस्से में सर्दियों की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिसका आत्महत्याओं में हाथ होने की ही पूरी संभावना है।ÓÓ पुन: रिपोर्ट यह भी कहती है कि, बहुत से ''ग्रामीणों ने मुसीबत के मारे किसानों की मदद करने के लिए बढ़कर आगे न आने या फसल के दाम स्थिर रहना सुनिश्चित न करने के लिए, मोदी को दोषी ठहराया है।ÓÓ इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी के बहुप्रचारित रेडियो संबोधन, ''मन की बातÓÓ की ओर इशारा करते हुए, जिसमें प्रधानमंत्री ने संसद में विपक्ष को यह कहकर गरिआया था कि वह ''झूठा प्रचारÓÓ कर रहा था और उनकी सरकार के भूमि विधेयक से तो वास्तव में ग्रामीण रोजगार पैदा करने में ही मदद मिलेगी, उत्तर प्रदेश के एक किसान नेता, बुद्घा सिंह ने कहा: ''किसानों को कोई ठोस मदद दिलाने तथा खासतौर पर इस महीने की बारिशों के बाद कोई मदद दिलाने के बजाय, मोदी और उनकी सरकार भूमि विधेयक पर ही अपना समय तथा ताकत लगा रही है।ÓÓ याद रहे कि बुद्घा सिंह आरएसएस/ भाजपा से जुड़े किसान संगठन, भारतीय किसान यूनियन का जिला प्रमुख है। (मिंट, 31 मार्च 2015 में उद्यृत रॉयटर्स की रिपोर्ट।) जहां तक विपक्षी पार्टियों द्वारा ''झूठा प्रचारÓÓ किए जाने के आरोप का सवाल है, प्रधानमंत्री जी, झूठा प्रचार तो खुद आप कर रहे हैं।
इसी सब का नतीजा है कि देश में खाद्यान्न उत्पादन में खासी गिरावट आई है। लेकिन, बजाय इसके कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया जाता तथा यह सुनिश्चित किया जाता कि सबसे ज्यादा जरूरतमंद लोगों तक उनकी जरूरत भर खाद्यान्न पहुंचे, मोदी सरकार तो देश की समग्र आर्थिक वृद्घि दर को बढ़ाने के नाम पर, कृषि उत्पादों के निर्यात ही बढ़ाने की कोशिशों में लगी हुई है। ऐसा लगता है कि सरकार को तो सिर्फ इसी की चिंता है कि किस तरह कृषि उत्पादों के निर्यातों में बहाली लाई जाए। याद रहे कि 2015 फरवरी में चावल, चाय, कहवा, अनाज, तिलहन, फलों तथा सब्जियों समेत अनेक कृषि उत्पादों के निर्यातों में ऋणात्मक बढ़ोतरी दर्ज हुई थी। मोदी सरकार को सिर्फ इन निर्यातों की ही ङ्क्षचता है, जबकि देश में भूखे पेट सोने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है और अन्नदाता कहलाने वाले किसानों को, हताशा में आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
और जहां तक समग्र अर्थव्यवस्था का सवाल है, जमीनी सच्चाई पर एक न•ार डाल लें। ''मंगलवार (31 मार्च, 2015) को जारी सरकारी आंकड़ों ने दिखाया है कि फरवरी 2015 में सालाना ढांचागत उत्पाद वृद्घि दर घटकर 1.4 फीसद रह गई। उसे नीचे खींचा है कि मुख्यत: इस्पात, उर्वरकों तथा रिफानरी उत्पादों के उत्पादन के संकुचन ने। यह उत्पाद, वर्षों के बीच तुलना के अनुसार 2015 की जनवरी में 1.8 फीसद बढ़ा था और 2014 की फरवरी में 6.1 फीसद। वाणिज्य तथा उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार प्राकृतिक गैस, इस्पात तथा कच्चे तेल के उत्पादन में क्रमश: 8.1 फीसद, 4.4 फीसद और 1.9 फीसद की गिरावट दर्ज हुई है। ढांचागत क्षेत्र, जिसमें कोयला, कच्चा तेल, तेल शोधन, प्राकृतिक गैस, सीमेंट, बिजली तथा उर्वरक आते हैं, भारत के औद्योगिक उत्पाद का 37.9 फीसद हिस्सा बैठता है।ÓÓ(बिजनेस स्टेंडर्ड, 31 मार्च 2015)
बहरहाल, मोदी सरकार ने वृद्घि दर की गणना का ''आधार वर्षÓÓ ही बदल दिया है। आंकड़ों के इस हेर-फेर के सहारे भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति की रंगी-चुनी तस्वीर दिखाई जा रही है और मीडिया में भारी प्रचार अंधड़ के  सहारे यह साबित करने की कोशिशें की जा रही है कि इस साल भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था बन गया है! प्रधानमंत्री जी इन बिगड़ते आर्थिक हालात पर आप जनता के ''मन की बातÓÓ क्यों नहीं सुनते?
सच तो यह है कि सारे मीडिया उछाले के बावजूद, आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार का आशावाद, भारत के कार्पोरेट जगत के गले जरा भी नहीं उतरा है। पीटीआई (29 मार्च 2015) की रिपोर्ट के अनुसार, ''भारत के शीर्ष कार्पोरेट कम से कम फौरन निवेश बढ़ाने की योजना नहीं बना रहे हैं।ÓÓ रिपोर्ट यह भी कहती है कि, ''हमारा मानना है कि शीर्ष भारतीय कार्पोरेटों द्वारा पूंजी खर्च में 2014 के वित्त वर्ष के अपने शिखर के मुकाबले, 2016 के वित्त वर्ष में 10 से 15 फीसद की कमी और होगी।ÓÓ रिपोर्ट के अनुसार, इसकी वजह यह है कि कंपनियों को, ''अब तक सरकार के सुधारों से या भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार से ठोस लाभ नहीं मिल सका है।ÓÓ
रिपोर्ट यह भी कहती है कि, ''हमारा मानना है कि यह मंदी उपयोगिताओं व ढांचागत क्षेत्र में सबसे प्रकट रूप से होगी, जिनमें करीब 20 फीसद की गिरावट आएगी, जबकि धातु व खनन के क्षेत्र में, 2014 वित्त वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष 2016 में करीब 30 फीसद की गिरावट आएगी।ÓÓ
इस सब का नतीजा यह हुआ है कि एक अनुमान के अनुसार, मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद, 2014 की तीसरी तिमाही में, सर्वभारतीय रोजगार की स्थिति दयनीय हो गई। दूसरी तिमाही के मुकाबले, तीसरी तिमाही में पूरे 13.2 फीसद की गिरावट हुई थी।
जहां तक आम जनता का सवाल है, उसके जीवन स्तर में गिरावट लगातार जारी है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। सब्जियों, फलों, खाद्यान्नों, प्याज, चीनी, रसोई गैस आदि के मामले में यह खासतौर पर सच है। ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, सो उसके ऊपर से। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में गिरावट का लाभ जनता तक नहीं पहुंचने दिया गया है। इसके बजाय, मोदी सरकार ने उत्पाद शुल्कों में चार-चार बार बढ़ोतरी कर, अपना खजाना जरूर भर लिया है।
प्रधानमंत्री जी, जमीनी सच्चाई तो यही है। अब झूठा प्रचार कौन कर रहा है? विपक्षी पार्टियां, खासतौर पर वामपंथी पार्टियां, या खुद आप की सरकार!
मोदी सरकार का पहला साल पूरा भी नहीं हुआ है, तब तक जनता की रोजी-रोटी पर बढ़ते हमलों की कठोर सच्चाइयां सामने आने लगी हैं। इसके साथ ही साथ, मोदी सरकार के संरक्षण में, आरएसएस की विभिन्न विष-भुजाओं द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ असहिष्णुता बरते जाने तथा हमलों में तेजी ने बहुत ही चिंताजनक रूप ले लिया है। यह सामाजिक सद्भाव के लिए और हमारे देश की एकता के लिए, अलग से खतरा पैदा कर रहा है।
भारत और उसकी जनता की सच्ची संभावनाओं को प्राप्त करना है, तो इस दुहरे हमले का मुकाबला करना होगा और इसे शिकस्त देनी होगी। जनता के लोकप्रिय संघर्षों की तेजी से बढ़ती ताकत ही, इस चिरअभिलक्षित लक्ष्य को हासिल कर सकती है।

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