‘सूट बूट की सरकार’ की पहली सालगिरह

सुभाष गाताडे : स त्ता में पहला साल जश्न मनाने का वक्त़ होता है। सरकारों की जुबां में जिसे हनीमून पीरियड कहा जाता है, वह तारी रहता है, यह अलग बात है कि मोदी सरकार के लिए जश्न की यह घड़ी मातम की पूर्वसूचना के साथ नमूदार हुई है, भले ही उसके चारण कुछ अलग कहने की कोशिश करें और ओबामा के आगमन के वक्त 10 लाख रुपये का सूट पहन कर दुनिया भर में मज़ाक का पात्र बने प्रधानमंत्री इस मुल्क से उस मुल्क की विदेश यात्राओं की चकाचौंध में खतरे की इन घंटियों को भुला देना चाहें। ...

सुभाष गाताड़े

सत्ता में पहला साल जश्न मनाने का वक्त़ होता है। सरकारों की जुबां में जिसे हनीमून पीरियड कहा जाता है, वह तारी रहता है, यह अलग बात है कि मोदी सरकार के लिए जश्न की यह घड़ी मातम की पूर्वसूचना के साथ नमूदार हुई है, भले ही उसके चारण कुछ अलग कहने की कोशिश करें और ओबामा के आगमन के वक्त 10 लाख रुपये का सूट पहन कर दुनिया भर में मज़ाक का पात्र बने प्रधानमंत्री इस मुल्क से उस मुल्क की विदेश यात्राओं की चकाचौंध में खतरे की इन घंटियों को भुला देना चाहें। और यह उनके विरोधी नहीं बल्कि उनके एक करीबी चैनल द्वारा किए गए सर्वेक्षण के नतीजे हैं। ‘इंडिया टीवी तथा सी वोटर द्वारा अंजाम दिए गए इस सर्वेक्षण के मुताबिक वजीरे आज़म मोदी की लोकप्रियता में गिरावट आयी है, सर्वेक्षण में शामिल 63 फीसदी लोग यह कहते पाए गए कि सरकार की इमेज गरीब विरोधी और किसान विरोधी बनी है।
निश्चित ही बीत गया वह दौर जब जनाब मोदी ने 16 वीं लोकसभा चुनाव के पहले ‘चायवाले’ की अपनी इमेज को खूब बेचा था, अपने अतिपिछड़े तबके से जुड़े होने की मार्केटिंग की थी, गुजरात मॉडल को लेकर खूब ढिंढोरा पीटा था और अब यह आलम है कि साधारण जनता तक जानने लगी है कि यह सरकार किसान-मजदूर विरोधी, गरीब से द्रोह करने वाली और कार्पोरेट पूंजी को मालामाल करने पर आमादा है। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में हालिया बदलाव के जरिए और बाल श्रम के ताजे सुधारों के जरिए उसने अपनी इमेज में एक और इजाफा किया है कि वह बालविरोधी भी है।
कोई यह पूछ सकता है कि क्या यह सब छवि प्रबंधन की गड़बडिय़ों के चलते है या विपक्षी पार्टियों के प्रचार का नतीजा है या मीडिया की खुन्नस का परिणाम है?
दरअसल यह सब मोदी सरकार की अपनी कारगुजारियों का ही फल है। फिलवक्त विपक्षी पार्टियां इतनी मजबूत नहीं दिखती कि वह सरकार को चुनौती दे सकें। भूमि अधिग्रहण कानून को जिस तरह आनन फानन में कार्पोरेटपरस्त बनाने की कोशिशें चल रही हैं, किसानों से सहमति प्राप्त करने की धारा को समाप्त किया जा रहा है इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, फिलवक्त एक नया मसला सामने है जो उजागर करता है कि किस तरह सरकार के द्वारा किए जा रहे ऐलान आम लोगों के साथ खुल्लमखुल्ला छल करते दिखते हैं।
मालूम हो कि बीते दिनों केन्द्र सरकार ने तीन नयी ‘‘सामाजिक सुरक्षा’’ योजनाओं का ऐलान किया, जिनमें से एक में दुर्घटना में बीमा हेतु, दूसरी जीवन बीमा तथा तीसरी पेन्शन योजना शामिल है। सुनने में आकर्षक लगने वाली इन तीनों योजनाओं का फोकस आर्थिक तौर पर वंचित तबके है, मगर इसमें एक पेंच भी है। वही लोग इसका लाभ उठा सकते हैं जिनके बैंक खाते हैं। अब 120 करोड़ की देश की आबादी में महज 15 करोड़ लोगों के बैक खाते है, जिनमें से एक तिहाई के खाते में कोई के्रडिट बैलेंस नहीं हैं। दूसरी तरफ इन योजनाओं को देश के नाम सौंपते हुए जनाब मोदी का वक्तव्य था कि किस तरह देश में समावेशी विकास नहीं हो रहा है, बैंकों के नेशनलायजेशन के फल गरीबों तक नहीं पहुंच रहे हैं, गोया उनकी ताजी योजना उन्हें शामिल करेंगी, जो सच नहीं है।
चन्द माह पहले बीजेपी के एक सीनियर लीडर अरूण शौरी ने अपने एक इंटरव्यू में अपनी ही पार्टी की सरकार की बखिया उधेड़ते हुए जो बात कही थी वह बिल्कुल मुफीद जान पड़ती है। अपनी बातचीत में उन्होंने महान शायर अकबर इलाहाबादी को उद्धृत किया था- जिसका निचोड़ था कि ‘बर्तन खडक़ रहे हैं, मगर खाना नहीं आ रहा है।’
एक तरह से देखें तो मोदी सरकार की नियति बॉलीवुड की उन फिल्मों की तरह लग रही है, जिनके आगमन का काफी गाजाबाजा होता है, मगर सिनेमा हॉल में वह औंधे मुंह गिर जाती हैं। मोदी सरकार जब एक साल पूरा कर रही है तब अतीत के चन्द पलों को याद करना समीचीन होगा।
2004 में कांग्रेस की अगुआई में बनी यूपीए सरकार की सालगिरह जब मनायी ज रही थी तब चाहे सूचना अधिकार कानून के जरिए हो या मनरेगा के जरिए हो या साम्प्रदायिक तत्वों पर अंकुश के जरिए हो, पूरे समाज में समावेश एवं सदभाव का माहौल बनता दिख रहा था, आज जब 2014 में बनी मोदी सरकार की सालगिरह मन रही है तो दो ही बातें प्रमुखता से मन में गूंज रही हैं कि कितनी तेजी से यह सरकार अमीरों को खुश करने पर और समाज में आपसी कलह पैदा करने पर आमादा है।
जानेमाने विश्लेषक गिरीश शहाणे द्वारा मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर लिखी टिप्पणी गौरतलब है-
    ‘‘नरेन्द्र मोदी द्वारा सत्ता सम्भाालने के एक साल बाद न गंगा साफ हुई है, न विदेशों में जमा काला धन वापस आ सका है और न ही राम मंदिर बनने के करीब है। डॉलर के मुकाबले रुपया फिसलता दिख रहा है, जो श्री श्री रविशंकर की इस भविष्यवाणी को खोखला साबित करता है कि मोदी के आते ही वह डॉलर के मुकाबले 50 फीसदी अधिक मजबूत होगा। कई मामलों में यह सरकार न केवल पिछले साल की अपनी मुहिम की उपेक्षा कर रही है बल्कि उसके खिलाफ काम करती दिख रही है। कहां तो भारतीय जनता पार्टी के घोषणापत्र में वायदा किया गया था कि वह सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण करेगी, उधर वित्तमंत्री ने स्वास्थ्य बजट में जबरदस्त कटौती कर दी। कहां यह कहा जा रहा था कि शिक्षा पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 से 6 फीसदी तक बढ़ाया जाएगा बल्कि आलम यह है कि उसी बजट में उसमें भी कटौती की गयी’’
16 मई की अपनी जीत के बाद संसद में प्रवेश के वक्त मोदी ने उसे ‘लोकतंत्र के मंदिर’ की संज्ञा दी थी और संविधान को सबसे पवित्र किताब कहा था। उसी वक्त यह प्रश्न उठा था कि वह इस किताब की गरिमा बनाए रखते हुए भारत को हिन्दुराष्ट्र बनाने पर आमादा विचारों, प्रवृत्तियों पर नकेल डालेंगे या वाचा एवं कर्मणा के बीच अन्तराल को महिमामंडित करते हुए वह भारत के ‘पाकिस्तानीकरण’ के मूकदर्शक बने रहेंगे ? पिछले ग्यारह माह की यात्रा इस बात की गवाह है कि संसद के पटल पर भारत के पहले आतंकी गोडसे के महिमामण्डन से लेकर साम्प्रदायिक दंगों के आरोपियों को सरकार में उच्च स्थान देने तक या अल्पसंख्यक समुदायों पर बढ़ते हमलों के माध्यम से यही संदेश दिया जा रहा है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। चुनावों के वक्त भले ही इस सरकार ने आधिकारिक तौर पर विकास की बात की हो, वह अपने हिन्दुराष्ट्र के एजेण्डे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है।
कहने का तात्पर्य साल भर के अन्दर जनतंत्र के आवरण में हिन्दुत्व की राजनीति के प्रसार का रास्ता अब सुगम हुआ है। और साथ ही साथ भारत में जिन नवउदारवादी आर्थिक बदलावों का सिलसिला शुरू हुआ था, उसी को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। मनरेगा को लेकर लम्बे समय से धनी किसानों/कुलकों की शिकायत रही है कि उन्हें सस्ते श्रमिक नहीं मिलते, इसलिए उसके लिए आवंटित राशि को कम करके उसे भी डाइल्यूट करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। श्रम कानूनों को लचीला बनाने का सवाल विगत दो दशकों से लगभग लटका हुआ रहा है। देशी विदेशी पूंजीपतियों की यह मांग रही है कि इसे अधिक ‘लचीला’ बनाया जाए ताकि आसानी से ‘हायर एण्ड फायर किया जा सके। राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार ने इस दिशा में पहल ली है और केन्द्रीय स्तर पर भी इसके संशोधन को लेकर कदम बढ़े हैं।
ध्यान रहे कि 2014 में अपने बहुमत से जनाब मोदी की अगुआई में सत्ता पर काबिज होने की तुलना तीस साल पहले 1984 में राजीव गांधी की अगुआई में कांग्रेस को मिली अभूतपूर्व जीत के साथ की गयी थी। मगर तुलना करने वालों ने इसका दूसरा हिस्सा बयां करने में संकोच बरता था कि साल दो साल के अन्दर ‘कांग्रेस की इस अभूतपूर्व जीत’ का यह खुमार उतर गया था और बोफोर्स काण्ड एवं अन्य मामलों को लेकर जनाक्रोश इस कदर आगे बढ़ा था कि 1989 के चुनावों में कांग्रेस सत्ता से बाहर कर दी गयी थी, तब तक का उसका वह सबसे खराब परफार्मंस कहा गया था।
अगर एक साल के अन्दर मोदी सरकार की अपनी छवि गरीबद्रोही और अमीरपरस्त बन रही है तो इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि राजीव गांधी हुकूमत की वैधता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होने में भले ही थोड़ा अधिक वक्त लगा था, इस हुकूमत के खिलाफ जनाक्रोश खड़ा होने में और भी कम वक्त लगेगा। और जनता जब रोजी, रोटी और सम्मान की सुरक्षा के लिए सडक़ों पर सैलाब की तरह निकलेगी तब उन्हें मैडिसन स्च्ेयर गार्डन या बीजिंग की सडक़ों पर प्रायोजित स्वागत समारोहों की तस्वीरें दिखा कर फुसलाया नहीं जा सकेगा।

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