हम नाचते मोर बनें तो अपने पैर भी देखें...

योगेश मिश्र : सवा अरब लोगों का देश। महाशक्ति बनने का संकल्प। 117 लोगों की सबसे बड़ी टीम। झोली में सिर्फ दो पदक और इन्हीं पदकों पर पैसा, प्यार और अविस्मरणीय दुलार। यह सब है अपरिहार्य। ...

योगेश मिश्र

सवा अरब लोगों का देश। महाशक्ति बनने का संकल्प। 117 लोगों की सबसे बड़ी टीम। झोली में सिर्फ दो पदक और इन्हीं पदकों पर पैसा, प्यार और अविस्मरणीय दुलार। यह सब है अपरिहार्य। अनिवार्य। लेकिन इन सफलताओं ने कई प्रश्न भी उठे हैं। खेल के लिए, खिलाडिय़ों के लिए, आवाम के लिए, और खेल का खेल खेलने वालों के लिए। सवाल यह कि खिलाडिय़ों की तुलना में गैर-खिलाड़ी कितने गए थे। भारी भरकम इस तादाद के बाद भी दीपा करमाकर के पास अपील करने के लिए कोई नहीं था। ओलंपिक नियम के मुताबिक खिलाड़ी किसी भी शिकायत की अपील नहीं कर सकता। दीपा मानती थी कि उसने हवा में दो गुलाटी लगाई। सिर्फ एक दिखाई। पिछले ओलंपिक में हम सोना भी लाए थे। सवाल यह कि सोना का खोना। सवाल यह कि उपलब्धियां सिर्फ आबादी हिस्से। छोटे से राज्य हरियाणा में अब तक ओलंपिक के पदकों का सबसे अधिक हिस्से का जाना।
हम भले ही अतीतजीवी हों, भविष्य के प्रति हमारी आंखों में उम्मीदें हों पर खेल के प्रति हम वर्तमानजीवी होते हैं। तभी तो जब गरीबी से जंग लड़ते हुए हारकर खेल की उम्मीद का एक बड़ा सपना टूट जाता है तब भी हम सिर्फ पदकों पर थिरकते रहते हैं। ओलंपिक में दो बेटियों की लिखी इबारत ने जश्न और दुलार का जो माहौल पैदा किया था, उस पर गरीबी से हारी खिलाड़ी की खुदकुशी ने तुषारापात कर दिया। हालांकि उत्सवधर्मिता में ही जीने वाले तमाम लोग जश्न में खलल बता सकते हैं। पर सपनों के पूरा होने के साथ सपनों का जिंदा रहना भी जरूरी होता है। सपने देखने वाली आंखों का भी। पाश ने कहा है कि- सबसे दुखद है सपनों का मर जाना। हैण्डबाल की राष्ट्रीय खिलाड़ी पूजा का गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर लेना एक बड़े सपने का मर जाना है। पूजा ने मौत से पहले प्रधानमंत्री मोदी को लिखे खत में ढेर सारे सवाल खड़े किए हैं। कुछ सवाल प्रधानमंत्री कार्यालय पर भी हैं। पूजा ने अपने खेल के लिए आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी। सुसाइड नोट में पूजा ने लिखा है कि पता नहीं किन लोगों ने उसे प्रधानमंत्री तक नहीं पहुंचने दिया। गरीबी को बदनसीबी से जोड़ते हुए भगवान पर भी सवाल खड़ा करती है। उसके लिए रोज 120 रुपये खर्च करके कोचिंग के लिए आना मुमकिन नहीं था। उसने हैंडबाल कोच गुरुशरन से गुजारिश भी की थी। गुरुशरन ने उसकी आवाज को अनसुना कर दिया।
रियो में बेटियों की कामयाबी पर झूम रहे देश के लिए पूजा का सुसाइड नोट नाचते हुए मोर को पैर दिखाने सरीखा है। उम्मीद से लबरे•ा एक खिलाड़ी की यह गति सिर्फ एक घटना नहीं है। यह तमाम घटनाओं की शृंखला है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले तमाम खिलाड़ी जीविका चलाने के लिए  चाय की दुकान खोले आपको मिल जाएंगे। इस तरह की सुर्खियां आम हो गयी हैं। झारखंड की तीरंदाज निशा रानी को साढ़े चार लाख का तीर-धनुष गरीबी की लड़ाई लड़ते-लड़ते 50 हजार में बेचना पड़ा।  निशा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया था। इसी राज्य की हॉकी की नामचीन खिलाड़ी नोरी मुंडू गरीबी के चलते अब अपने गांव में शराब बेचने का काम कर रही हैं। इस राज्य में आदिवासियों को शराब बनाने की कानूनी छूट हैं।
नोरी एयर इंडिया के लिए 2006 तक खेलती थी। लेकिन टीम के विघटन के बाद इतना पैसा भी नहीं मिला कि सम्मान का काम कर सके। राष्ट्रीय स्तर पर लान बाल में नाम कमाने वाली झारखंड की फरजाना ने मलेशिया में हुई एशियाई प्रतियोगिता में कांस्य और चीन में स्वर्ण पदक जीतकर भारत की शान में इतना इ•ााफा किया था जितना शायद किसी क्रिकेट खिलाड़ी ने न किया हो। पर उम्र बढ़ जाने के साथ फरजाना को चिंता जिंदगी काटने की हो रही है। उसने जो रुपये कमाए थे वह घर की मरम्मत में खर्च हो गए। पिता नहीं होने की वजह से अपने रिश्तेदार के यहां वह खेल का अभ्यास करती है। अब उसकी हसरत कोई पदक नहीं एक नौकरी रह गई है ताकि वह जी सके।
इंदौर के खिलाड़ी संजय निदान दस साल पहले फुटबाल में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। पर बीते दिनों इंदौर में हुए आईपीएल मैच में बैठने वाले दर्शकों के लिए कुर्सियां साफ करते दिखे थे। ऐसा संजय महज इसलिए कर रहे थे क्योंकि उन्हें 2 रुपये 75 पैसे प्रति कुर्सी की दर से पैसे मिल रहे थे। संजय अपने साथियों के साथ इस काम से पैसे को अपने आनंद फुटबाल क्लब में भी लगाना चाहते हैं।  कैथल के मानस गांव की फुटबाल की चार राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी दूसरे के खेतों में गेहूं काटने को मजबूर हैं। सुदेश सूखी रोटी खाकर प्रैक्टिस करती हैं। उनके पिता कर्मवीर इस बात को लेकर दुखी हैं कि बाहर खेलने जाने पर ब्याज पर पैसे लेने पड़ते। दूसरी पूनम के माता-पिता
भटटे पर काम करते हैं। तीसरी रितु और शीतल सगी बहनें हैं पिता टायर पंचर की दुकान चलाते हैं। गेहूं के सीजन में रितु और शीतल मां शांति और भाई के साथ गेहूं काटने का काम करती है।
हरि अनंत हरिकथा अनंता की तरह यह फेहरिस्त बहुत लंबी हो सकती है। क्रिकेट और टेनिस को छोडक़र शायद ही ऐसा कोई खेल हो जिसके खिलाड़ी को अर्थ का दर्द सालता न हो। फुटबाल, हॉकी, कुश्ती, कबड्डी, एथलेटिक्स आदि-इत्यादि खेलों के खिलाड़ी अपने जीवनकाल में ही इस प्रायश्चित बोध से भर उठते हैं कि काश उन्होंने खेला नहीं होता या फिर उन्होंने क्रिकेट खेला होता। हम यह क्रिकेट ओलंपिक का हिस्सा नहीं, यह गौरव नहीं बढ़ाता, यह ऐश्वर्य दिलवाता है। खेल में जहां भावना प्रधान होती है वहां क्रिकेट ने बाजार को जगह दे दी है। हर खिलाड़ी कुछ न कुछ बेचता न•ार आता है। भारत रत्न के बाद भी सचिन तेंदुलकर तमाम चीजों के लिए बा•ाार बनाते दिखते हैं।
आर्थिक तंगी, गरीबी, पौष्टिक आहार का प्रशिक्षण संस्थानों में न मिलना तो शायद सहकर भी हमारे खिलाड़ी देश का नाम दुनिया में रोशन करने को तैयार हंै। किया भी है। लेकिन जिन बेटियों ने इस ओलंपिक में हमारे गौरव को चार चांद लगाया है उस तरह की दूसरी खिलाडिय़ों का दर्द इससे भी कुछ और ही ज्यादा हैं। यह सवाल भी पूजा ने खड़ा किया है। पूजा की मौत का जो सबब है वह कोच गुरुशरण सिंह गिल हंै। हमारी बेटियों पर तमाम कोच पर भी इससे कम आरोप चस्पा नहीं किए हैं।  महिला फुटबॉल टीम की कप्तान रही सोना चौधरी ने अपनी किताब ‘गेम इन गेम’ में इस पक्ष का रहस्य खोलती हैं। सोना ने लिखा है, ‘कोच और सेक्रेटरी महिला खिलाडिय़ों को कम्प्रोमाइज के लिए मजबूर करते हैं। जिस कमरे में महिला खिलाड़ी रुकती थीं उसी कमरे में कोच और सेक्रेटरी भी रुकते थे। फुटबॉल की दुनिया की जानी-मानी स्टार रही सोना भले ही मेडल, ट्रॉफी, नाम और शोहरत अपनी झोली में डाल चुकी हों पर वह इस बात पर यकीन जताती हैं कि महिला खिलाडिय़ों को मैदान पर कड़ी मेहनत के बाद भी मैदान से बाहर कई समझौते करने पड़ते हैं। केरल के अलपुझा साईं सेंटर में यौन उत्पीडऩ से तंग चार खिलाडिय़ों के जहर खाने की घटना ने सुर्खियां हासिल की थीं। झारखंड की ताइक्वांडो खिलाड़ी माया मोदक ने कोच संजय शर्मा पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी भी दर्ज कराई थी।
खेल की दुनिया में यह कहा जाता है कि जब तक क्रिकेट रहेगा, दूसरे खेल को पनपने नहीं देगा। खिलाडिय़ों का यह भी मानना है कि जब तक खेल संघों पर हुक्मरान और नेता काबिज रहेंगे, तब तक खेल से खेल होता रहेगा, तब तब रियो में बेटियों की कामयाबी पर झूम रहे देश को शर्मसार होना पड़ेगा, तब तक प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा और तब तक उम्र के किसी न किसी पड़ाव पर हर खिलाड़ी को पछताना पड़ेगा।  
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


 

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