हंगामा है क्यों बरपा?

शेष नारायण सिंह : संसद का एक और सत्र हंगामाखेज हो गया है। लगता है कि इस बार भी कोई खास काम नहीं हो पायेगा। हालांकि अध्यक्ष सुमित्रा महाजन पूरी कोशिश है कि हंगामे के बावजूद सारे कामकाज चलते रहे लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस की राय के बिना कोई भी संविधान संशोधन नहीं किया जा सकता और न ही कोई महत्वपूर्ण बिल पास हो सकता।...

शेष नारायण सिंह

संसद का एक और सत्र हंगामाखेज हो गया है। लगता है कि इस बार भी कोई खास काम नहीं हो पायेगा। हालांकि अध्यक्ष सुमित्रा महाजन पूरी  कोशिश है कि हंगामे के बावजूद सारे कामकाज चलते रहे लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस की राय के बिना कोई भी संविधान संशोधन नहीं किया जा सकता और न ही कोई महत्वपूर्ण बिल पास हो सकता। पिछला सत्र भी बिना किसी खास काम के बीत गया था और मौजूदा सत्र भी अनुत्पादकता के खतरे का  सामना कर रहा है। सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन सोनिया और राहुल गांधी के नेशनल हेराल्ड केस में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर शुरू हो गया। विपक्ष, खासकर कांग्रेस, हल्ला करके अपनी बात को जनता तक पंहुचाने की कोशिश कर रहा है। उधर पता नहीं कि किन कारणों से संसद सत्र के दौरान सीबीआई ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के प्रमुख सचिव के भ्रष्टाचार की जांच के उद्देश्य से मुख्यमंत्री कार्यालय में ही छापा मार दिया। नतीजा यह हुआ कि विपक्ष की कई महत्वपूर्ण पार्टियों ने इसको ही मुद्दा बना दिया। बीजेपी का आरोप है कि आम आदमी पार्टी के नेता लोग एक भ्रष्ट अफसर को बचाने के लिए अभियान चला।  लुब्बो लुवाब यह है कि  लोकसभा का समय ऐसे कामों में लग रहा है जिसका संसद की बहस से कोई लेना देना नहीं है।
लेकिन देश में बहस  शुरु हो गई है कि क्या यह तरीका ठीक है। हो सकता है आज का विपक्ष उसी को सही मानता हो, लेकिन इसी लोकसभा में विपक्ष ने ऐसे-ऐसे काम किये हैं कि दुनिया की कोई भी संसद उनसे प्रेरणा ले सकती है। 1971 के लोकसभा चुनावों के बाद इंदिरा गांधी की सरकार बनी थी।  उनके पास बहुत ही मजबूत बहुमत था। दो तिहाई से ज्यादा बहुमत वाली सरकारें कुछ भी कर सकती हैं, संविधान में संशोधन तक कर सकती हैं लेकिन पांचवीं लोकसभा के कुछ सदस्यों ने इंदिरा गांधी की सरकार को सदन में हमेशा घेर कर रखा। इन छ: सदस्यों के काम के तरीके को आने वाली पीढिय़ों को प्रेरणा के रूप में लेना चाहिए। इनमें से अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा अब कोई जीवित नहीं हैं लेकिन माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ज्योतिर्मय बसु, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के मधु लिमये और मधु दंडवते, जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय लोक दल के पीलू मोदी, कम्युनिस्ट पार्टी के इन्द्रजीत गुप्त और कांग्रेस (ओ) के श्याम नंदन मिश्र की मौजूदगी में इंदिरा गांधी की सरकार का हर वह फैसला चुनौती के रास्ते से गुजरता था जिसे इन सदस्यों ने जनहित की अनदेखी का फैसला माना।
संसद के सदस्य के रूप में नेताओं के पास ऐसे बहुत सारे साधन हैं कि वे सरकार को किसी भी फैसले में मनमानी से रोक सकते हैं। संसद के सदस्य के रूप में नेताओं के पास जो अवसर उपलब्ध हैं उन पर एक न•ार डालना दिलचस्प होगा।
सबसे महत्वपूर्ण तो प्रश्न काल ही है। लोकसभा की कार्यवाही के लिए जो नियम बनाए गए हैं उनमें नियम 32 से लेकर 54 तक प्रश्नों के बारे में हैं। सदन की कार्यवाही का पहला घंटा प्रश्नकाल के रूप में जाना जाता है और इसमें हर तरह के सवाल कर सकते हैं।  कुछ सवाल तो मौखिक उत्तर के लिए होते हैं सदन के अंदर सम्बंधित मंत्री को सदस्यों के सवालों का जवाब देना पड़ता है। मंत्री से बाकायदा पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं, हर सदस्य किसी भी सवाल पर स्पष्टीकरण मांग सकता है और सरकार के सामने गोलमोल जवाब देने के विकल्प बहुत कम होते हैं। मौखिक प्रश्नों के अलावा बहुत सारे प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका जवाब लिखित रूप में सरकार की तरफ से दिया जाता है। अगर सरकार की ओर से लिखित जवाब में कोई बात स्पष्ट नहीं होती तो सदस्य के पास नियम 55 के तहत आधे घंटे की चर्चा के लिए नोटिस देने का अधिकार होता है। अध्यक्ष महोदय की अनुमति से आधे घंटे की चर्चा में सरकार से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। सरकार की नीयत पर लगाम लगाए रखने के लिए विपक्ष के पास नियम 56 से 63 के तहत काम रोको प्रस्ताव का रास्ता खुला होता है। अगर कोई मामला अर्जेंट है और जनहित में है तो अध्यक्ष महोदय की अनुमति से काम रोको प्रस्ताव लाया जा सकता है। इस प्रस्ताव पर बहस के बाद वोट डाले जाते हैं और अगर सरकार के खिलाफ काम रोको प्रस्ताव पास हो जाता है तो इसे सरकार के खिलाफ निंदा का प्रस्ताव माना जाता है। देखा यह गया है कि सरकारें काम रोको प्रस्ताव से बचना चाहती हैं इसलिए इस प्रस्ताव के रास्ते में बहुत सारी अड़चन रहती है। बहरहाल सरकार के कामकाज पर न•ार रखने के लिए काम रोको प्रस्ताव विपक्ष के हाथ में सबसे मजबूत हथियार है। इसके अलावा नियम 171 के तहत सदन के विचार के लिए एक प्रस्ताव लाया जा सकता है जो सदस्य की राय हो सकती है, कोई सुझाव हो सकता है या सरकार की किसी नीति या किसी काम की आलोचना हो सकती है। इसके जरिये सरकार को सही काम करने के लिए सुझाव दिया जा सकता है, उस से आग्रह किया जा सकता है। ध्यान आकर्षण करने लिए बनाए गए लोकसभा के नियम 170 से 183 के अंतर्गत जनहित के लगभग सभी मामले उठाये जा सकते हैं।
विपक्ष के हाथ में लोकसभा के नियम 184 से लेकर 192 तक की ताकत भी है। इन नियमों के अनुसार कोई भी सदस्य किसी राष्ट्रीय हित के मसले पर सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पेश कर सकता है। नियम 186 में उन मुद्दों का विस्तार से वर्णन किया गया है जो बहस के लिए उठाये जा सकते हैं। इन नियमों के तहत होने वाली चर्चा के अंत में वोट डाले जाते हैं इसलिए यह सरकार के लिए खासी मुश्किल पैदा कर सकते हैं। इसके अलावा लोकसभा के नियम 193 से 196 के तहत जनहित के किसी मुद्दे पर लघु अवधि की चर्चा की नोटिस दी जा सकती है। इस नियम के तहत होने वाली बहस के बाद वोट नहीं डाले जाते लेकिन जब सब कुछ पूरा देश टेलिविजन के जरिये लाइव देख रहा है तो सरकार और सांसदों की मंशा तो जनता की अदालत में साफ न•ार आती ही रहती है। नियम 197 के अंतर्गत संसद सदस्य, सरकार या किसी मंत्री का ध्यान आकर्षित करने के लिए ध्यानाकर्षण प्रस्ताव ला सकते हैं। विपक्ष के पास लोकसभा में सबसे बड़ा हथियार नियम 198 के तहत सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव है। इस प्रस्ताव के तहत सरकारें गिराई जा सकती हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार इसी प्रस्ताव के बाद गिरी थी। इस तरह से हम देखते हैं कि संसद सदस्यों के पास सरकार से जनहित और राष्ट्रहित के काम करवाने के लिए बहुत सारे तरीके उपलब्ध हैं लेकिन उसके बाद भी जब इस देश की एक अरब से ज़्यादा आबादी के प्रतिनिधि शोरगुल के जरिये अपनी ड्यूटी करने को प्राथमिकता देते हैं तो निराशा होती है।

sheshji@gmail.com


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