सुनियोजित जनसंहार का शिकार रोहिंग्या और सू की

सुभाष गाताड़े : म्यांमार अर्थात् बर्मा-जहां नवम्बर माह में राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव हो रहे हैं-और जिस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को अमेरिका ने हटा दिया है, वहां से आ रही कुछ खबरें बेचैन कर देने वाली हैं। ...

सुभाष गाताड़े

म्यांमार अर्थात् बर्मा-जहां नवम्बर माह में राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव हो रहे हैं-और जिस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को अमेरिका ने हटा दिया है, वहां से आ रही कुछ खबरें बेचैन कर देने वाली हैं। नए अध्ययन सामने आए है जो फिर इस बात को पुष्ट कर रहे हैं कि वहां की दस लाख से अधिक रोहिंग्या मुसलमानों की आबादी राज्य द्वारा प्रायोजित जनसंहार की शिकार हो रही हैं। देश के अन्दर मौजूद उग्रवादी बौद्ध समूहों के माध्यम से और सरकारी तंत्र की परोक्ष-अपरोक्ष सक्रियता के जरिए इस काम को अंजाम दिया जा रहा है। लंदन के क्वीन्स मेरी यूनिवर्सिटी के इण्टरनेशनल स्टेट क्राइम इनिशिएटिव द्वारा किए इस ताजे अध्ययन का निष्कर्ष है कि ‘रोहिंग्या जनसंहार के अंतिम चरण में हैं।’
जनसंहार विशेषज्ञ डैनियल फायरस्टाइन द्वारा विकसित जनसंहार के छह चरणों के फ्रेमवर्क के आधार पर स्टेट क्राइम इनिशिएटिव ने यह निष्कर्ष निकाला है, जिसकी रूपरेखा उन्होंने 2014 में प्रकाशित अपनी किताब ‘जीनोसाइड एज सोशल प्रैक्टिस’ में प्रस्तुत की थी। टाईम डॉट कॉम पर इस संबंध में प्रकाशित लेख के मुताबिक अध्ययन को दोनों तरफ के स्टेकहोल्डर्स से लिए गए साक्षात्कारों के आधार पर अंजाम दिया गया है तथा इसके लिए गोपनीय सरकारी दस्तावेजों और मीडिया रिपोर्टों पर भी गौर किया गया है।  रिपोर्ट बताती है कि किस तरह रोहिंग्या समुदाय के लोग जनसंहार के प्रारंभिक चार चरणों का शिकार हुए हैं, जिनमें शामिल हैं- अमानवीकरण; उत्पीडऩ, हिंसा और आतंक, अलगाव तथा पार्थक्य; सुनियोजित ढंग से कमजोर करना और अब व्यापक पैमाने पर नष्ट होने के कगार पर हैं। छठवीं अवस्था जिसमें ‘पीडि़त समूह को सामूहिक इतिहास से भी अलग किया जाता है’ कई संदर्भों में आज ही कार्यान्वित होती दिख रही है।
मालूम हो कि रोहिंग्या मुसलमानों के साथ योजनाबद्ध भेदभाव की खबरें पहली दफा नहीं आ रही है। अभी पिछले ही साल रोहिंग्या मुसलमानों का मामला अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में रहा जब अन्डमान द्वीपसमूहों के पास फैले विशाल सागर के जल में उन दिनों चल रहे ‘तैरते ताबूतों’ की खबरें आईं थीं। और उसी वक्त यह स्पष्ट हुआ था कि म्यांमार अर्थात् बर्मा के राखिन सूबे से सरकारी उत्पीडऩ एवं नस्लीय शुद्धिकरण की मुहिम से बच कर किसी तरह निकले रोहिंग्या मुसलमानों का कोई पुरसाहाल नहीं है।
उन्हीं दिनों एक स्थूल अनुमान के हिसाब से पता चला था कि कम से कम आठ हजार रोहिंग्या मुसलमान उन जहाजों पर सवार होकर समुद्र में ही पड़े थे क्योंकि कोई भी देश उन्हें शरण देने के लिए तैयार नहीं था। संयुक्त राष्ट्रसंघ के शरणार्थियों के लिए बने आयोग के मुताबिक लगभग तीन हजार रोहिंग्या किसी तरह इंडोनेशिया, थाइलैण्ड और मलेशिया के किनारे पहुंच गए थे और वहां की स्थानीय आबादी उन्हें अन्न, वस्त्र एवं अस्थायी तौर पर रहने का इन्तजाम कर रही थी, मगर स्थायी समाधान नहीं निकला था। संयुक्त राष्ट्रसंघ की सलाह के बावजूद भूखे-प्यासे और सहारे की तलाश में घूम रहे उनके जहाजों को अपनी सीमा पर पहुंचने से खदेड़ा जा रहा था। उन्हीं दिनों कहा गया था कि थाईलैण्ड, इंडोनेशिया और मलेशिया की यह आधिकारिक नीति है कि कोई अगर उनके किनारे की अन्तरराष्ट्रीय सीमा लांघ कर कोई घुसे तो उसे अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं के अन्दर पहुंचा दो। समाचार यह भी आए थे कि अन्न और पानी की कमी से जूझ रहे इन शरणार्थियों में से दस लोगों की मौत भी हो चुकी है। बीबीसी के संवाददाता ने एक ऐसे ही ‘तैरते ताबूत’ की यात्रा की और बताया कि लोग किस बदहवासी में हैं।
दुनिया के सबसे उत्पीडि़त अल्पसंख्यक के तौर पर शुमार किए जाते रोहिंग्या की बद से बदतर होती जा रही हालात को लेकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर इसके पहले भी आवाज उठी है। और बर्मा की छह करोड़ आबादी का चार फीसदी मुसलमानों की रक्षा करने की नाकामी को लेकर सरकार की तीखी आलोचना हुई है। ध्यान रहे कि वर्ष 2012 में म्यांमार/बर्मा के पश्चिमी राखिन सूबे में बौद्धों और मुसलमानों के बीच वहां साम्प्रदायिक हिंसा का सिलसिला शुरू हुआ था जिसमें सैकड़ों मारे गए थे- जिनका बहुलांश अल्पसंख्यक मुसलमानों का था और डेढ़ लाख के करीब लोग, जिनका बहुमत इन्हीं तबकों से है, उन्हें अपने घरों से बेदखल कर दिया गया था। तीन साल पहले यह हिंसा देश के अन्य हिस्सों में भी फैली है। मालूम हो कि बर्मा के अन्दर रोहिंग्या मुसलमानों पर जगह-जगह जो हमले रहे थे, जिसमें पुलिस की संलिप्तता दिखी थी जिन्होंने कार्रवाई करने से परहेज किया था। बर्मा में मानवाधिकारों को लेकर संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्पेशल रेपोर्टियर टोमास ओजा क्विन्टाना ने बताया था कि किस तरह ‘राखिन प्रांत जबरदस्त संकट’ के दौर से गुजर रहा है और किस तरह उसने शेष बर्मा में भी मुस्लिमविरोधी भावनाएं फैलाई हैं। (इंडियन एक्स्प्रेस, 8 नवम्बर 2013)
भले ही रोहिंग्या लोग आठवीं सदी में ही इस इलाके में पहुंचे हैं, तत्कालीन राष्ट्रपति थाइन सीन ने कहा था कि उनकी 8,00,000 आबादी शिविरों में रहे और वहीं से उन्हें सरहद पार बंगलादेश भेज दिया जाए। दरअसल 1982 का संविधान जिस तरह बना है, उसमें रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति अवैध प्रवासियों की तरह बना दी गई है।
बर्मा के अन्दर बौद्ध अतिवादियों द्वारा मुसलमानों पर किए जा रहे हमलों को लेकर अन्तरराष्ट्रीय मीडिया में अपने आप को ‘बर्मा का बिन लादेन’ कहलाने वाले विराथू नामक बौद्ध भिक्षु के बारे में भी काफी कुछ छपता रहा है, जिसके 25,000 से अधिक अनुयायी हैं और जिसके भडक़ाऊ भाषणों के बाद कई स्थानों पर नस्ली हिंसा के समाचार छपे हैं। 2003 में बर्मा की तानाशाही सरकार ने उसे इसी के चलते जेल में बन्द किया था, सार्वजनिक माफी की योजना के अन्तर्गत कुछ साल पहले वह भी रिहा हो गया है।
रोहिंग्या मुसलमानों को राज्यविहीन बनाने की, उन्हें खदेड़ देने की म्यांमार सरकार की एवं वहां के अतिवादी समूहों की खुल्लमखुल्ला कोशिशों को लेकर जहां दुनिया में छिटपुट विरोध की आवाज उठ रही है, संयुक्त राष्ट्रसंघ को हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, वहीं इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया भर में तानाशाही के खिलाफ अपने ऐतिहासिक संघर्ष के लिए जानी गई आंग सान सू, जो फिलवक्त म्यांमार की विदेश मंत्री हैं तथा स्टेट कौन्सिलर के पद पर विराजमान हैं, का मौन सबसे अधिक परेशान करने वाला रहा है, जो इन दिनों म्यांमार की सर्वोच्च नेत्री हैं और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। यहां तक कि अप्रैल में सत्तारोहण के बाद जब जून माह में संयुक्त राष्ट्रसंघ के स्पेशल रेपोर्टियर आन ह्यूमन राइट्स ने उनसे इस मसले पर मुलाकात की थी तो उन्होंने यह भी बताया था कि उनकी सरकार ‘रोहिंग्या’ शब्द के इस्तेमाल से भी परहेज करेगी।
मालूम हो कि म्यांमार के अन्दर बौद्ध बहुसंख्यकवादी समूहों की तरफ से भी इसी किस्म की बातें कही जाती रही हैं और वहां सदियों से रहने के बावजूद उन्हें ‘बंगाली’ के तौर पर वह संबोधित करते रहे हैं। कुछ समय पहले जब वहां जनगणना हो रही थी तो तत्कालीन हुकूमत ने इस बात पर जोर दिया था कि अगर कोई अपने आप को ‘रोहिंग्या’ कह कर दर्ज करना चाहता है, तो उसे जनगणना की गिनती से भी बाहर रखा जाएगा और एक तरह से उसके ‘अनागरिक अर्थात नानसिटीजन’ होने पर मुहर लगा दी जाएगी। अगर वह व्यक्ति अपने आप को बंगाली कह कर जनगणना में नाम दर्ज करना चाहे तो उसका नाम दर्ज कर दिया जाएगा।
विडम्बना यह थी कि दो दशक से अधिक अपनी कारावास के बाद जब वह पहली बार ब्रिटेन पहुंची थी तो उन्होंने उन समूहों से मिलना भी गंवारा नहीं किया जिन्होंने उनकी रिहाई के लिए चले अन्तरराष्ट्रीय अभियान में पहल की थी। ऐसा नहीं था कि 2015 के राष्ट्रपति के चुनावों में अपनी किस्मत आजमाने की कोशिशों में मुब्तिला आंग सान सू की के पास वक्त की कमी थी क्योंकि उन्होंने लन्दन स्थित सैण्डहस्र्ट मिलिटरी एकेडेमी में जाकर वहां का कामकाज देखा और वहां वक्त गुजारा। इसकी वजह यही थी कि यह समूह उन दिनों रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकार को लेकर जनमत तैयार कर रहे थे।
इतना ही नहीं, उपरोक्त यात्रा में एक साक्षात्कार में आंग सान सू की ने रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जो कुछ हो रहा है, इसकी कड़े शब्दों में भत्र्सना करने से परहेज किया था। दरअसल उन्होंने इस नस्लीय हिंसा की अलग व्याख्या की। उनका कहना था कि इस समस्या की जड़ में दोनों समुदायों में एक-दूसरे को लेकर व्याप्त डर की भावना है। उनका कहना था कि यह कहना उचित नहीं होगा कि सिर्फ मुसलमानों पर हमले हुए हैं बल्कि बौद्धों पर भी हमले हुए हैं... इसके लिए उन्होंने वैश्विक मुस्लिम शक्ति के बलशाली होने को जिम्मेदार ठहराते हुए अप्रत्यक्ष ढंग से यही कहा कि रोहिंग्या उनके प्रभाव में आए हैं। उन्हें जब अपने साक्षात्कार में विराथू की हरकतों की भत्र्सना करने के लिए कहा गया तो उन्होंने सीधे जवाब देने के बजाय ‘हर किस्म की नफरत की निन्दा की।’


 

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