सियासत में कहां खो गया है विकास..

योगेश मिश्र : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी रथयात्रा को जब विकास से विजय का नाम दे रहे थे तब शायद उन्हें इस बात का अंदेशा नहीं रहा होगा कि सियासी तजुर्बेकार उनके पिता मुलायम सिंह यादव इस पर आपत्ति करेंगे। ...

योगेश मिश्र
योगेश मिश्र

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी रथयात्रा को जब विकास से विजय का नाम दे रहे थे तब शायद उन्हें इस बात का अंदेशा नहीं रहा होगा कि सियासी तजुर्बेकार उनके पिता मुलायम सिंह यादव इस पर आपत्ति करेंगे। उन्होंने अखिलेश की इस कोशिश को सिर्फ विजय यात्रा नाम देने की नसीहत दी। इसे उत्तर प्रदेश की सियासत का दुर्भाग्य कह सकते हैं कि यहां विकास कभी चुनावी एजेंडा नहीं बन पाया। सुशासन ने जीत की इबारत नहीं लिखी है। यही वजह है कि जब अपने-अपने कार्यकाल में राजनीतिक दल इसे उत्तम प्रदेश, अतिउत्तम प्रदेश सरीखे अन्य विशेषणों से नवाजते हैं तो वह महज खानापूरी लगता है।
यहां बीते बीस साल में जिसने भी सरकार बनाई उसकी वजह उसका कामकाज कभी नहीं रहा। यही वजह है कि किसी राजनीतिक दल को दोबारा सत्ता पाने का मौका नहीं मिला। राजनीतिक दलों ने दूसरे की कमी से अपनी सफलता की इबारत लिखी है। सुशासन के नाम पर सूबे में 1991 की कल्याण सिंह की सरकार मील का पत्थर हैं। इसके बाद की सरकारों ने जरूरी काम तो किए पर विकास का कोई खाका नहीं खड़ा किया। सूबे की अगले एक दो दशक की संभावनाओँ को देखते हुए विकास का काम करने वाले अंतिम मुख्यमंत्री के रूप में नारायणदत्त तिवारी का नाम लिया जा सकता है। उसके बाद औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की दिशा में कुछ उल्लेखनीय नहीं हुआ। उद्योग जरूर लगे पर औद्योगिकीकरण नहीं हुआ।
दुर्भाग्य यह है कि आज जब राज्य चुनाव के मुहाने पर खड़ा है तब भी सारे राजनीतिक दल अपनी पुरानी रणनीति बदलने को तैयार नहीं है। विकास उनका कागजी सियासी एजेंडा है। मेट्रो और आगरा एक्सप्रेस वे को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रहे अखिलेश यादव की चुनाव की रणनीति का अंदरूनी पैबस्त जातीय समीकरण है। राजनेताओं ने ही लोकतंत्र की खोह से जातियां खोजी हैं। उन्हें लगता है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा रोको अभियान के वह और उनकी पार्टी केंद्र बनने में कामयाब होंगे। यही उनकी दोबारा जीत का सबब होगा। लैपटाप, कन्या विद्याधन, समाजवादी पेंशन योजना, समाजवादी आवास योजना सरीखे तमाम सरकारी योजनाओं से लाभान्वित लोगों की तादाद तकरीबन डेढ़-दो करोड़ बैठती है। अगर इतने लोग भी पार्टी के साथ खड़े हो जाएं तो सरकार बनने की उम्मीद जगना स्वाभाविक हो जाएगा। लेकिन अगर कोई भी सर्वे निष्पक्ष तौर पर किया जाय तो इस सरकार के दोबारा आने की निष्पति फिलहाल उसमें अंतर्निहित नहीं दिखती। ऐसे में सवाल उठता है कि उपकृत लोग क्यों मुंह मोड़ रहे है।
बसपा सुप्रीमो मायावती भी अपने कार्यकाल के विकास को गिनाने के जगह एक बार फिर दलित ब्राह्मण समीकरण की काठ की हांडी को दोबारा चुनावी आंच पर चढ़ाना चाहती है। उन्हें उम्मीद है कि आपस की लड़ाई से त्रस्त सपा से मुस्लिम मोहभंग होगा और वे सब हाथी पर सवार हो जाएंगे। यह होता दिख नहीं रहा है, क्योंकि यह प्रयोग डा. भीमराव अंबेडकर ने भी किया था। वे असफल रहे थे तो उन्होंने लिखा था कि ये दोनों कौमें खान-पान नहीं बदलेंगी तब तक एकता संभव नहीं है। पर मायावती इसे न•ारअंदाज कर नई उम्मीद पाले बैठी हैं। हालांकि यह असंभव संभव हो जाय तो सचमुच मायावती के सपने साकार हो जाएंगे। लेकिन यह भी सच्चाई है कि मुसलमान मुलायम सिंह से एक साथ मुंह नहीं मोड़ सकता।
रणनीतिकार प्रशांत किशोर के सहारे चुनाव में उतर रही कांग्रेस के पास भी विकास का कोई सपना नहीं है। उसने जिस शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश का चेहरा बनाया है उसकी वजह उनका विकास नहीं उनका ब्राह्मण होना है। प्रशांत किशोर पांडेय को लगता है कि ब्राह्मण अभी विभ्रम की स्थिति में हैं, ठौर तलाश रहे हैं। उन्हें लुभाया जा सकता है। वर्ष 2007 के चुनाव में जब ब्राह्मण बसपा के साथ गया तो उसने वोटबैंक की शक्ल अख्तियार की और यह साबित किया कि वह जिधर जाएगा उधर स्पष्ट बहुमत की सरकार बनेगी।
मुठ्ठी भर ब्राह्मणों को उपकृत करने के मायावती के फैसले के खिलाफ मायावती से मुंह मोड़े ब्राह्मणों ने मुलायम की ओर कदम यह कहते हुए बढ़ाये कि यहां सम्मान मिल ही जाएगा। प्रोन्नति में आरक्षण विरोध के मुलायम के स्टैंड ने सवर्ण जातियों को उनकी ओर आने के लिए मजबूत मौका दिया।  लोकसभा में अपनी समूची जमीन गवां चुकी कांग्रेस के पास एजेंडा भी नहीं, चेहरा भी नहीं है। उसकी उम्मीद की किरण प्रियंका गांधी हैं, उसकी उम्मीद की किरण यह है कि मोदी का रथ रोकने की कोशिश में बनने वाले गठबंधन का हिस्सा उसके शामिल हुए बिना पूर्ण नहीं हो सकता। यह खुशफहमी उसे सत्ता की चाभी अपने पास होने का भरोसा दिलाती है।
नरेंद्र मोदी के नाम उनकी केंद्र सरकार के काम की जगह भारतीय जनता पार्टी भी सूबे में जातीय समीकरण बिठाने में ज्यादा मशगूल दिख रही है। बौद्ध भिक्षुओं की यात्रा से वह यह उम्मीद पाल बैठी है कि दलित उसे वोट देगा। लोकसभा में ऐसा उत्तर प्रदेश में हुआ था। पर तब मायावती केंद्र की कुर्सी की हकदार नहीं थी। उत्तर प्रदेश की कुर्सी की मायावती मजबूत दावेदारों में से एक है। ऐसे में कोई सियासी हुनरमंद यह गफलत पाल ले तो दलित वोटों में सेंध लगा लेगा तो यह जगते हुए सपना देखना है।
जिस सूबे में अगड़ी जातियों की तादाद 22-25 फीसदी बैठती हो, मोहभंग की स्थिति में अगड़ी जातियां हों उन्हें नए ठौर की तलाश हो तब भाजपा जिले-जिले, विधानसभा-विधानसभा, पिछड़ा सम्मेलन कर रही है। सरकार अपने पूर्व मुख्यमंत्री की उपलब्धि में अपनी पार्टी के कल्याण सिंह का नाम ले रही है, राजनाथ सिंह को भुला  दे रही है। तब जबकि उनके कार्यकाल में भी सरकार ने कई काम किए थे।  वह असमंजस में कोई चेहरा पेश करने की स्थिति में न हो। उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जहां अब तक ब्राह्मणों की राजनीति के लिए शुद्ध सात्विक ब्राह्मण जरूरी रही है। मिश्रित उपजातियां ब्राह्मण जाति की राजनीति का चेहरा नहीं बनी है। भाजपा इस मान्यता को भी पलटना चाहती है। जिस तरह भाजपा दूसरे दलों के लोगों को खुद में समाहित करा रही है उससे यह भी साफ हो रहा है कि विचारधारा का दावा बेमानी हो रहा है। उसे भी केंद्र सरकार के काम की जगह अखिलेश यादव की विफलताओं से सफलता का समीकरण ज्यादा सुहा रहा है। वह भी तब जब नरेंद्र मोदी की सरकार ही नहीं खुद नरेंद्र मोदी भी लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं।
 सपा, बसपा हो या फिर भाजपा-कांग्रेस सभी की कोशिश अपने किए पर इतराने से अधिक दूसरे के किए से लाभ उठाने से है। जब सभी राजनीतिक दल सियासी मूड पर आ गए हों, रोज उनके सुप्रीमो कुछ न कुछ कहने से बाज न आते हों तब अगर इन दलों की गतिविधियों पर न•ार डाली जाय तो यह पुष्ट होता है कि इनकी कोशिश सरकार बनाने और चलाने की रही है। कोई यह नहीं कहता दिख रहा है कि उसका प्रदेश को उत्तम प्रदेश, सर्वोत्तम प्रदेश बनाने का ब्लूप्रिंट क्या है। कोई यह नहीं बता और जता रहा है कि उसकी पूर्ववर्ती सरकार ने कौन से काम अधूरे छोड़ें है उसे पूरा करना प्रदेश के हित में है इसलिए वह पूरा किया जा रहा है। सपा बसपा के बीच तो यह खेल इतना घृणित ढंग से खेला जाता है कि मायावती सपा के हर फैसले पलट देती है। भले ही वह विकास से जुड़े ही क्यों न हों। उनका विकास स्मारकों तक सीमित है। उन स्मारकों को आज देखने जाइये तो पत्थर खिर रहे हंै। दीवारें गिर रही हैं। पांच साल की उम्र पूरी नहीं कर पा रहे हैं, यह स्मारक।
इन दोनों दलों के बीच तो सियासत प्रतिशोध का सबब बन गई है। हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस परंपरा पर अपनी ओर से विराम लगाने की कोशिश की है। भाजपा और कांग्रेस राष्ट्रीय दल हैं पर उत्तर प्रदेश में इनकी दृष्टि क्षेत्रीय दलों से ज्यादा कमजोर है। मायावती तो कम से कम दलितों की नाक का सवाल पूरा करती हैं।  मुलायम सिंह यादवों के पेट का सवाल पूरा करते हंै पर भाजपा नाक और पेट दोनों के सवाल की जगह दिमाग के सवाल खड़े कर मैदान मारना चाहती है।
यह दुर्भाग्य नहीं है तो क्या कि जिस राज्य में सबसे अधिक राष्ट्रीय नेता हों वह राज्य विकास में राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे हो। राहुल और सोनिया का विकास यूपी में अमेठी और रायबरेली से बाहर नहीं निकल पाता। मोदी का विकास बनारस की सरहद में घिर कर रह गया है। चंद्रशेखर के संसदीय क्षेत्र बलिया का विकास इसलिए नहीं हो पाता कि वह इस गर्वोक्ति पर अमल करते थे कि वह बलिया के नहीं देश के नेता हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह का संसदीय क्षेत्र व जिला पीछे छूट जाने का गवाह है। डॉक्टर लोहिया का कन्नौज, दीनदयाल उपाध्याय का जौनपुर विकास का कोई मानदंड ठीक से पूरा नहीं करता है। उनके दलों की सरकारों ने भी इस पर गौर नहीं फरमाया। लोहिया का अपना घर अंबेडकरनगर में कब्जा हो गया। उनके गृहजनपद का नाम उनके नाम पर नहीं रखा जा सका। दीनदयाल उपाध्याय का गांव विकास को तरस रहा है। घर किसी संग्रहालय में तब्दील होने का इंतजार कर रहा है। किसी भी सरकार ने किसी भी गांव को पूरी तरह संतृप्त नहीं किया है। सिर्फ सैफई और बादलपुर को छोडक़र।
लोकतंत्र के उत्सव की फिर से शुरूआत के समय में हमें यह तो उम्मीद करनी ही चाहिए कि राजनेता, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल पाछे की बिसार कर विकास की सुध लेंगे क्योंकि उत्तर प्रदेश के विकास के बिना देश के विकास के दावे अधूरे हैं, बेमानी हैं।      
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


 

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख