सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए वाटर लू साबित होगा

एच.एल. दुसाध : बिहार विधानसभा उपचुनाव: पूरे देश में सामाजिक न्याय के समर्थक बिहार विधानसभा उपचुनाव से भारी उम्मीद लगाए हुए हैं। उनकी धारणा है कि जिस तरह उत्तराखंड विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी तीनों सीटें हार गई, कुछ वैसा ही परिणाम बिहार में सामने आयेगा। ऐसा सोचने के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि वोट का गणित भाजपा गठबंधन के खिलाफ है। नीतीश-लालू और कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव में जितना वोट मिला था, अगर यह गठबंधन उसे बरकरार रख पाता है तो बीजेपी की गहरी शिकस्त अवधारित है।...

एच.एल. दुसाध

बिहार विधानसभा उपचुनाव
पूरे देश में सामाजिक न्याय के समर्थक बिहार विधानसभा उपचुनाव से भारी उम्मीद लगाए हुए हैं। उनकी धारणा  है कि जिस तरह उत्तराखंड विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी तीनों सीटें हार गई, कुछ वैसा ही परिणाम बिहार में सामने आयेगा। ऐसा सोचने के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि वोट का गणित भाजपा गठबंधन के खिलाफ है। नीतीश-लालू और कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव में जितना वोट मिला था, अगर यह गठबंधन उसे बरकरार रख पाता है तो बीजेपी की गहरी शिकस्त अवधारित है। चुनाव से बीजेपी विरोधियों को इसलिए भी अतिरिक्त उम्मीद हो गई है क्योंकि बिहार में सामाजिक न्याय के दो सबसे बड़े योद्धा, लालूप्रसाद यादव और नीतीश कुमार कथित साम्प्रदायिक बीजेपी को हराने के लिए दो दशक बाद एक साथ मैदान में उतर आए हैं। किन्तु तमाम अनुकूल  कारणों  के बावजूद लगता नहीं है कि लालू-नीतीश इच्छित परिणाम दे पाएंगे। ऐसी निराशा जाहिर करने पीछे हाजीपुर में उनके मिलन समारोह में जुटी निहायत ही कम भीड़ कोई एकमेव कारण नहीं है। निराशाजनक परिणाम आने की सबसे बड़ी सम्भावना इस आधार पर जाहिर कर रहा हूं क्योंकि ये एक ऐसे मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं जिसे अपने पक्ष में करने में बीजेपी को मास्टरी हासिल है। हां, आपने सही अनुमान लगाया, साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर ही लड़ रहे हैं। जबकि उम्मीद किसी अन्य मुद्दे पर लडऩे की थी।
गठजोड़ की घोषणा के पूर्व लालूजी ने सदम्भ घोषणा किया था कि मंडल की काट कमंडल ही हो सकता है। सिर्फ कहा ही नहीं, इसे व्यवहारिक रूप देने के लिए उन्होंने निजी-क्षेत्र सहित ठेकों में एससी/एसटी,ओबीसी,अल्पसंख्यकों के लिए 60 प्रतिशत आरक्षण की मांग उठाने के साथ अपने समर्थकों को इसके लिए सड़कों पर उतरने का ऐलान तक कर दिया था। ऐसा करने के बाद लगा कि बिहार सरकार से यह मांग लागू करवाने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में बहुजनों को भागीदारी दिलाने के मुद्दे पर उनका गठबंधन उपचुनाव लड़ेगा। पर निजी-क्षेत्र और ठेकों में बहुजनों के आरक्षण के लिए राजद के लोग एक दिन भी सड़कों पर नहीं उतरे। इससे बहुतों को विश्वास हो चला कि लालू ने क्षणिक आवेग में आकर ठेकों इत्यादि में 60 प्रतिशत आरक्षण का शिगूफा छेड़ दिया था। किन्तु कुछ लोग ऐसे भी थे जिनके मन के किसी कोने में उम्मीद की लौ झिलमिला रही थी कि लालू कमंडल की काट के लिए मंडल के हथियार का नाटकीय रूप से इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे लोगों को इंतजार था स्वाधीनता दिवस का। वे सोच रहे थे स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर जीतन सरकार द्वारा ठेकों में आरक्षण की घोषणा करवा कर वे मंडल के एक नये फेज का आगाज करेंगे। किन्तु  स्वाधीनता दिवस का ऐतिहासिक अवसर भी खत्म हो गया, पर मंडल के नए चरण का आगाज नहीं हो सका। अब दावे के साथ कहा जा सकता है कि मीडिया की थोड़ी सुर्खियां बटोरने के लिए ही उन्होंने मंडल बनाम कमंडल का शिगूफा छेड़ा था। यही कारण है बिहार से आ रही खबरों के मुताबिक वहां सेकुलर मोर्चा ठेकों इत्यादि में आरक्षण नहीं, धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहा है।
कहना न होगा धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता जैसा आत्मघाती मुद्दा बीजेपी को बड़ी सफलता दिलवाने में सहायक बनेगा। कारण पूर्व पंक्तियों में बताया गया है कि भाजपा को ऐसे मुद्दे को अपने पक्ष में करने की महारत हासिल है। बहरहाल अगर वहां भाजपा गठबंधन जीत जाता है तो यह सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए वाटर लू साबित होगा। इस हार के बाद नेपोलियन की भांति सामाजिक न्याय के योद्धाओं का ऐसा पतन होगा कि लम्बे समय राजनीतिक निर्वासन की स्थिति में चले जायेंगे। बहरहाल बिहार विधानसभा उपचुनाव में लालू-नीतीश का रंग-ढंग देखकर लगता है कि वे वाटर लू के पराजित योद्धा नेपोलियन बनने की राह पर चल पड़े हैं। ऐसे में सामाजिक न्याय के समर्थक एक बड़ा आघात सहने के लिए अभी से मानसिक प्रस्तुति ले लें तो बेहतर होगा।

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