सरकार से जवाब पाना हमारा अधिकार

सीताराम येचुरी : देश को स्वतंत्र हुए अड़सठ बरस हो गए। पर इस मौके पर मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर कैसी-कैसी चीजें हैं—नैतिक दारोगाई, ड्रैस कोड थोपना, लोगों के खान-पान पर पाबंदियां लगाना, सोशल मीडिया पर अभिव्यक्तियों पर अंकुश लगाना (जो उसकी विनोदहीनता को भी प्रदर्शित करता है),...

सीताराम येचुरी

देश को स्वतंत्र हुए अड़सठ बरस हो गए। पर इस मौके पर मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर कैसी-कैसी चीजें हैं—नैतिक दारोगाई, ड्रैस कोड थोपना, लोगों के खान-पान पर पाबंदियां लगाना, सोशल मीडिया पर अभिव्यक्तियों पर अंकुश लगाना (जो उसकी विनोदहीनता को भी प्रदर्शित करता है), चुनिंदा तरीके से इंटरनैट तक पहुंच को बाधित करना और एकदम हाल की चीजे टेलीविजन नैटवर्क रूल्स की कार्यक्रम संहिता का सहारा लेकर, प्रमुख टेलीविजन चैनलों को कारण बताओ नोटिस पकड़ाना कि ''राष्टï्रपति तथा न्यायपालिका की प्रतिष्ठïा को धूमिल करने के लिएÓÓ उनके खिलाफकार्रवाई क्यों न की जाएÓÓ आदि।
आखिरी पहलू याकूब मेनन की फांसी रोकने की दया याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट तथा राष्टï्रपति के स्तर पर हुए विचार पर टेलीविजन चर्चाओं में आई टिप्पणियों के सिलसिले में सामने आया है। हमारे देश के कानून में मौत की सजा रहनी चाहिए या नहीं, इस सवाल पर लोग विभाजित हैं। यह विभाजन ठीक इसी मुद्दे पर भावपूर्ण अंतरराष्टï्रीय बहस-मुबाहिसे को भी दिखाता है, जिसके बाद पूरे 97 देशों ने अपने कानून से मौत की सजा को खत्म कर दिया है। हमारे देश में इस तरह की बहस पर अंकुश लगाने की कोशिश करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही हमला करना है। इससे भी बदतर यह कि इस तरह का अंकुश, एक खास धार्मिक समुदाय के प्रति पहले से ही पूर्वाग्रहपूर्ण हो चुके रवैये को ही और पुख्ता करता है। वास्तव में खांटी आरएसएस के एजेंडा को ही प्रतिबिंबित करता है, जो आतंंकवाद के खिलाफ लडऩे के नाम पर एक खास धर्म के खिलाफ घृणा फैलाना चाहता है।
बेशक, आतंकवाद के खिलाफ लडऩे के सवाल पर कोई समझौता नहीं हो सकता है। यह मुद्दा हरेक लेन-देन से ऊपर है। लेकिन, भारत में आतंकवाद कभी भी धर्म, क्षेत्र या ऐसी ही किसी अन्य सीमाओं में बंधकर नहीं रहा। आखिरकार, महात्मा गांधी की हत्या एक हिंदू कट्टïरपंथी की गोली से हुई थी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या एक सिख अतिवादी ने की थी, जबकि राजीव गांधी की हत्या लिट्टïे के उग्रवादी ने। हाल की जांचों में भांति-भांति के आतंकवादी गुटों की करतूतें सामने आई हैं जिनमें इस्लामवादी, हिंदुत्ववादी तथा दूसरे गुट भी शामिल हैं। इसके अलावा, इस पर तो कोई विवाद हो ही नहीं सकता है कि सीमा पार से आतंकवाद पर फौरन अंकुश लगाना जरूरी है।
कूटनीति और विदेश नीति के सर्वमान्य सिद्घांत में किसी भी देश की जनता की सुरक्षा और खुशहाली को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी सतर्कता में कभी कमी नहीं होने दें और हमारी खुफिया व्यवस्था की कारगरता में लगातार सुधार किया जाए। लेकिन, यह काम सिर्फ अंधराष्टï्रवादी बयानबाजी से और 'छप्पन इंच की छातीÓ के दावों से तो पूरा होने से रहा। पिछले ही दिनों भारत के सुरक्षा सलाहकार ने ऐलान किया कि भारत, 'अपनी ताकत से हल्का प्रहार करता आया है। हमें अपने प्रहार को वजनी बनाना होगा।Ó अविचारपूर्ण पौरुष-प्रदर्शन निरर्थक साबित हो सकता है। वास्तव में इस तरह हम भारत को पाकिस्तान के बराबर में ही खड़ा कर रहे होते हैं और इस तरह उसकी अंतरराष्ट्रीय हैसियत को ही गिरा रहे होते हैं।
इस तरह के दावे एक और कारण से भी निरर्थक हैं। भारतीय गणराज्य की खास पहचान, जिसकी गारंटी हमारा संविधान भी करता है, सभी नागरिकों के लिए  ''जाति, विश्वास तथा लिंग से ऊपर उठकर समानताÓÓ मुहैया कराना है। स्वतंत्रता के सड़सठ साल बाद भी आर्थिक व सामाजिक पहलुओं से यह वादा कहीं पूरा होने के आस-पास भी दिखाई नहीं देता है। चहुंदिश फैले नकार के  इस वातावरण के बीच, राहत की जो भी उम्मीद है, न्यायपालिका से ही है। बेशक, बहुत से लोगों को यह उम्मीद भी झूठी लग सकती है, फिर भी कम से कम न्यायपालिका से यह उम्मीद की जाती है कि वह बिना किसी दुराव या पूर्वाग्रह के न्याय करेगी। जब न्यायिक प्रणाली पर भी संदेह की परछांई पडऩे लगे, तो यह जनतंत्र के लिए सत्यानाशी ही होगा।
याकूब मेमन की फांसी को इस संदर्भ में रखकर देखिए। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद 1992 के दिसंबर तथा 1993 की जनवरी में मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों और 1993 के मार्च में हुए मुंबई के बम विस्फोटों की जांच के लिए, न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण जांच आयोग का गठन किया गया था। उसके विचार के विषयों में एक विषय यह भी शामिल था कि क्या बंबई के सांप्रदायिक दंगों और बम विस्फोटों के बीच, उन्हें आपस में जोडऩे वाली कोई कड़ी भी थी (विचार विषय-7)। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण अपनी जांच में इस नतीजे पर पहुंचे थे कि, ''पहले वाला (बंबई का दंगा) बाद वाले (बंबई बम विस्फोट) का कारण लगता है। दो दंगों और शृंखलाबद्घ बम विस्फोट के बीच कारण और कार्य का रिश्ता लगता है।ÓÓ पुन: आयोग की रिपोर्ट कहती है: 'विक्षुब्ध, कुंठित तथा बौखलाए हुए मुलसमानों का एक बड़ा अरूप सा समूह था, जो अपने ऊपर या अपने समुदाय के अन्य लोगों के ऊपर हुए अत्याचारों तथा उनके साथ हुए अन्याय का बदला लेने के लिए उत्सुक था और बदले की इसी भावना ने शृंखलाबद्घ विस्फोटों के षडय़ंत्र को हवा दी थी।ÓÓ और यह भी कि, ''इसी ने वह आधार मुहैया कराया जिस पर  राष्टï्रविरोधी तथा अपराधी तत्व शृंखलाबद्घ बम विस्फोट की अपनी साजिश खड़ी करने में कामयाब हो गए।ÓÓ
बहरहाल, श्रीकृष्ण आयोग ने मुंबई के सांप्रदायिक दंगों के लिए जिम्मेदार जिन दोषियों की निशानदेही की थी, उनके खिलाफ कोई खास कार्रवाई ही नहीं की गयी। 2002 के गुजरात के सांप्रदायिक नरसंहार से जुड़े अब भी चल रहे मामलों में, अब तक न्याय नहीं दिलाया जा सका है। ऐसा ही किस्सा 1984 के सिखविरोधी दंगों का और दूसरे दंगों का भी है।
क्या हमारी न्याय व्यवस्था की इन प्रकट अपर्याप्तताओं पर सवाल उठाने को राज्य के खिलाफ 'राजद्रोहÓ माना जा सकता है? क्या इस तरह की बहस का गला दबाना हमारे जनतंत्र को मजबूत करेगा या हमारी जनता के लिए धार्मिक संबद्घताओं से ऊपर उठकर बराबरी की संवैधानिक गारंटी को लागू कराने के लिए जोर लगाना, जनतंत्र को मजबूत करेगा? आखिर, मीडिया में इस तरह की खबरें क्यों आ रही हैं कि भाजपा की मौजूदा सरकार, सरकारी एजेंसियों से कह रही है कि ऐसे प्रकरणों में जिनमें हिंदुत्ववादी गुटों की आतंकवादी करतूतें प्रमाणित भी हो चुकी हैं, अपनी रफ्तार धीमी कर दें? आखिर, क्या वजह है कि जांच में निर्दोष पाए जाने के बावजूद, बड़ी संख्या में मुसलमान युवा अब भी जेलों में बंद हैं?
यह हमारा सर्वोच्च राष्टï्रीय कर्तव्य है कि उन कारणों को खत्म करने का प्रयास करें, जो हमारी न्याय प्रणाली में ऐसा अन्याय होने देने के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक बहस किसी प्रणाली को 'बदनाम करनाÓ तो दूर, वास्तव में हमारे जनतंत्र की आंतरिक गतिकी को मजबूत ही करेगी। ऐसी बहसें सार्वजनिक दबाव के जरिए, शासन को इसकी ओर धकेलती हैं कि ''जाति, धर्म या लिंग के भेद से ऊपर उठकर बराबरीÓ का जो लक्ष्य अब तक हासिल नहीं किया जा सका है, उसे हासिल किया जाए।
इसे नकारकर मौजूदा भाजपा सरकार यही साबित कर रही है कि इसका एजेंडा न तो सुशासन है और न जनता की खुशहाली। इसका एजेंडा एक ही है, धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक भारतीय गणराज्य को आरएसएस की कल्पना के 'हिंदू राष्टï्रÓ में तब्दील करने के उसके एजेंडा को आगे बढ़ाना।


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