सम्पूर्ण न्यायतंत्र के प्रजातंत्रीकरण की जरूरत

एच एल दुसाध : न्यायधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोलेजियम व्यवस्था को बदलकर 'न्यायिक नियुक्ति आयोग 'बनाने के विधेयक पर राज्यसभा में भी मुहर लग गई। इसे स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मोदी सरकार के एक ऐतिहासिक तोहफे के रूप देखा जाना चाहिए। इसे लेकर जहां अवाम में खुशी की लहर दौड़ गई है, वहीं न्यायपालिका पर हावी न्यायधीशों में भारी निराशा है।...

एच.एल. दुसाध
एच.एल. दुसाध

न्यायधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोलेजियम व्यवस्था को बदलकर 'न्यायिक नियुक्ति आयोग 'बनाने के विधेयक पर राज्यसभा में भी मुहर लग गई। इसे स्वाधीनता दिवस के अवसर पर मोदी सरकार के एक ऐतिहासिक तोहफे के रूप देखा जाना चाहिए। इसे लेकर जहां अवाम में खुशी की लहर दौड़ गई है, वहीं न्यायपालिका पर हावी न्यायधीशों में भारी निराशा है। वे नहीं चाहते थे कि  बीस सालों से चले आ रही कोलेजियम व्यवस्था टूटे। उनकी निराशा का अनुमान  सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश आरएम लोधा के हालिया टिप्पणी में देखा जा सकता है।
इसे महज संयोग नहीं मानना चाहिए कि जिस दिन लोकसभा में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014Ó पेश किया गया, उसी दिन एक जनहित याचिका पर टिप्पणी करते हुए आरएम लोढ़ा ने कहा था-'यदि जनता की आँखों में न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए कोई अभियान चलाया जा रहा है तो आप लोकतंत्र को बड़ा नुकसान पहुंचा रहे है। न्यायपालिका से लोगों के विश्वास को न हिलाएं। ईश्व के लिए न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश नहीं करें।Ó उन्होंने यह भी कहा था कि यदि कोलेजियम व्यवस्था गलत है तो हम भी गलत हैं। उनका इशारा शायद प्रेस काउन्सिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष तथा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश  मार्कण्डेय काटजू की ओर था जिन्होंने हाल के दिनों में एक से एक खुलासा कर न्यायपालिका की साख पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया था। उनके हिसाब से सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीशों ने भ्रष्ट छवि अथवा कथित तौर पर भ्रष्टाचार में लिप्त न्यायाधीशों के खिलाफ वैसी कार्रवाई नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी।  बहरहाल कोलेजियम व्यवस्था को लेकर चहुंओर असंतोष था। असंतोष के पीछे एक कारण यह भी था कि  इसके कारण कई योग्य न्यायधीशों का सुप्रीम कोर्ट में चयन नहीं हो पाया। यह व्यवस्था अपारदर्शी है क्योंकि इसमें एक तरह से न्यायधीश ही न्यायधीशों  का चयन करते हैं। न्यायपालिका के शीर्ष पदों अर्थात् सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति और स्थानान्तरण का निर्धारण करने वाली कोलेजियम व्यवस्था पूरी दुनिया में सिर्फ भारत में है। ऐसी व्यवस्था किसी भी अन्य लोकतान्त्रिक देश में नहीं है। ऐसे में इस व्यवस्था को खत्म करने का सपना राष्ट्र बहुत पहले से देख रहा था जो अब जाकर मोदी सरकार के शासन में मूर्त रूप लिया है।
न्यायपालिका में न्यायधीशों की नियुक्ति सम्बन्धी कोलेजियम व्यवस्था को समाप्त करने की इच्छुक केंद्र सरकार ने 11 अगस्त को लोकसभा में संविधान संशोधक विधेयक पेश किया। संविधान संशोधन विधेयक के अतिरिक्त एक और सम्बन्धित विधेयक 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक पेश किया। विधेयक 2014 जहां प्रस्तावित आयोग और इसकी पूरी संरचना को संविधान में निहित करता है, वहीं दूसरा विधेयक उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित इकाई द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया तय करता है। इसमें न्यायधीशों के तबादले तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायधीशों तथा अन्य न्यायधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में भी प्रावधान किए गए हैं। प्रस्ताव के मुताबिक राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के प्रमुख भारत  के प्रधान न्यायाधीश होंगे। उनके आलावा न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व सुप्रीम कोर्ट के ही दो वरिष्ठ न्यायधीशों द्वारा किया जायेगा। दो प्रतिष्ठित हस्तियां तथा कानून मंत्री प्रस्तावित इकाई के अन्य सदस्य होंगे। न्यायपालिका की आशंकाओं को दूर करने के लिए आयोग की संरचना को संवैधानिक दर्जा दिया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में कोई भी सरकार किसी साधारण विधेयक के द्वारा इसकी संरचना को क्षति न पहुंचा सके। इकाई में शामिल दो प्रतिष्ठित हस्तियों का चुनाव भारत के प्रधान न्यायधीश, प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता या निचले सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता के कोलेजियम द्वारा किया जायेगा। इसमें एक मशहूर हस्ती को अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक या महिला वर्ग से सम्बन्धित वर्ग से नामित किया जायेगा। दो जानी मानी हस्तियों का कार्यकाल तीन साल के लिए होगा। उसमें यह प्रावधान होगा कि उन्हें पुन: नामित नहीं किया जा सकता।
 कोलेजियम व्यवस्था को खत्म करने वाला विधेयक लोकसभा में बड़ी आसानी से 13 अगस्त को पास हो गया। उसी दिन राजसभा, में भी इस पर चर्चा शुरू हो गई। सर्वसम्मति बनाने के लिए सरकार पक्ष ने विपक्ष के उस संशोधन को भी मान लिया जिसमें  राष्ट्रपति द्वारा मामला पुनर्विचार के लिए भेजे जाने की स्थिति में आयोग की सर्वसम्मति जरूरी नहीं होगी। लोकसभा में सरकार की  सहयोगी 'अपना दलÓ की अनुप्रिया पटेल ने दो प्रख्यात हस्ती आरक्षित वर्गों से रखने की मांग की, जिसे स्वीकृति नहीं मिली। लोकसभा की भांति ही यह विधेयक स्वाधीनता दिवस की पूर्व संध्या के समय राज्यसभा में भी आसानी से पारित हो गया। राज्यसभा में न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक का आसानी से पास होना बतलाता है कि  कोलेजियम व्यवस्था खत्म करने के प्रति राष्ट्र कितना लालायित था। अगर ऐसा नहीं होता तो राज्यसभा में बहुमत रखने वाला विपक्ष इसे सहजता से पास नहीं होने देता।
बहरहाल न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक पास होना निश्चय ही एक ऐतिहासिक घटना है। किन्तु यदि न्यायिक सुधार का लक्ष्य पीडि़त लोगों को न्याय दिलाना है तो निश्चय ही इसकी तुलना खारे समुद्र में कुछ बाल्टी मीठा पानी डालने से की जा सकती है। यदि सरकार की मंशा अन्याय के शिकार लोगों को न्याय दिलाने की है तो निम्न से लेकर उच्चतम न्यायालय के सम्पूर्ण न्यायतंत्र के प्रजातंत्रीकरण  करने का कठिन काम अंजाम देना होगा। इसके लिए निम्न से लेकर उच्चतम अदालतों में जज ही नहीं पेशकार, रीडर, अहमद, सरकारी वकील इत्यादि पदों पर विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा। भारत जैसे नख से शिख तक जाति पंक में डूबे देश में न्यायपालिका जैसी अत्यंत शक्तिशाली संस्था के विभिन्न पदों पर  परम्परागत सुविधासंपन्न व विशेषाधिकारयुक्त   तबके का शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धार्मिक व सांस्कृतिक स्रोतों की भांति  ही 80-85 प्रतिशत कब्जा है। न्यायपालिका में वर्चस्वशाली वर्ग का यह दबदबा लोकतंत्र व मानवता के लिए बेहद घातक  है। क्योंकि विश्व का एकमात्र जाति समाज भारत ऐसे असंख्य जातीय समूहों से मिलकर गठित है जिसमें प्रेम-प्रीती नहीं, परस्पर के प्रति घृणा और द्वेष का बोलबाला है। यहां बड़े से बड़े साधू-संत, राजा-महाराजा, लेखक-चिन्तक-कलाकार इत्यादि तक  समग्र वर्ग की चेतना से दरिद्र रहे। जब सभी समग्र वर्ग की चेतना से कंगाल रहे तो यह मान लेना कि न्याय-तंत्र से जुड़े लोग इसके अपवाद होंगे, सही नहीं होगा। बल्कि व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मेरा दावा है कि अन्य पेशों के मुकाबले स्व-जाति सोच वाले लोगों की सबसे ज्यादा भरमार न्यायपालिका में ही है। यही कारण है भारत के न्यायिक व्यवस्था से प्राय: बहिष्कृत दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों से ही भारत के जेल आबाद हैं। फांसी जैसी कठोर सजा पाए लोग इन्ही वंचित वर्गों से है। अन्याय के शिकार इन वर्गों से भारत के जेल इसलिए अंटे पड़े हैं क्योंकि इंसाफ के मंदिर में इनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है। ऐसे में समग्र वर्ग की चेतना के कंगाल देश की न्यायिक व्यवस्था को सचमुच इंसाफ के मंदिर का रूप देना है तो सरकार इसके लोकतंत्रीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाएं। अभी कल ही बीजेपी के अपने एक शुभचिंतक नेता से बात हो रही थी। उन्होंने कहा, 'भाई साहब देश  को एक ऐसा पीएम मिला है जो चरित्र से बेहद बलिष्ठ तथा भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त है। उनकी एक ही चाह है, राष्ट्र सेवा के माध्यम से अपार यशÓ। मैं मोदी का बहुत बड़ा प्रशंसक न होने के बावजूद इतना मानता हूं कि उनमें कुछ कर गुजरने की चाह है। ऐसे मोदी यदि सचमुच कुछ ऐतिहासिक काम की संतुष्टि इंज्वाय करना चाहते हंै तो न्यायिक संस्था ही नहीं, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक-सांस्कृतिक इत्यादि से जुड़ी हर संस्था के प्रजातंत्रीकरण का बलिष्ठ उपाय करें। क्योंकि समग्र वर्ग की चेतना से दरिद्र इस देश को दुरुस्त करने का और कोई उपाय नहीं।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

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