वैश्विक चेतना तथा भारतीय संस्कृति

प्रो. महावीर सरन जैन : भारतीय संस्कृति और चिन्तन सहिष्णु, उदार एवं गुणग्राही रहा है। गुरुदेव टैगोर ने इसे तथा भारतीय जनमानस को महामानव सागर की संज्ञा दी थी। भारतीय संस्कृति और चिन्तन की सबसे बड़ी विशेषता विविधताओं को अपनाना, उनकी मान्यता और स्वीकृति है। ...

प्रो. महावीर सरन जैन

प्रो. महावीर सरन जैन
भारतीय संस्कृति और चिन्तन सहिष्णु, उदार एवं गुणग्राही रहा है। गुरुदेव टैगोर ने इसे तथा भारतीय जनमानस को महामानव सागर की संज्ञा दी थी। भारतीय संस्कृति और चिन्तन की सबसे बड़ी विशेषता विविधताओं को अपनाना, उनकी मान्यता और स्वीकृति है। भारतीय संस्कृति भी भारतीय जनमानस की भांति महासागर है जिसमें अनेक सांस्कृतिक धाराएं समय-समय पर विभिन्न स्रोतों से आती रही हैं और भारतीय संस्कृति रूपी महासागर में विलीन होती रही हैं। एकता में अनेकता तथा अनेकता में एकता के कारण एकता का धागा विभिन्न प्रकार और रंगों के फूलों को गूंथकर माला का आकार देता रहा है। इस विशाल भारत देश के हम भारतवासी अनेक भाषाएं बोलते हैं। इस विशाल भारत देश के हम भारतवासी अनेक धर्मों के उपासक हैं। इस विशाल भारत देश के हम भारतवासी अनेक उपासना पद्धतियों की पूजा करते हैं। इस्लाम तथा ईसाई धर्मों के आने के पहले भी हमारे यहां 6 प्रकार के भिन्न-भिन्न तथाकथित आस्तिक दर्शन धाराएं रही हैं। इन तथाकथित 6 भिन्न आस्तिक दर्शनों के अलावा जैन, बौद्ध, चार्वाक आदि आदि अनेक ऐसे दर्शन और धर्म रहे हैं जिनको वैदिक ऋषियों ने नास्तिक उपाधि से नवाजा। इनको नास्तिक कहने का मूल कारण यह था कि इन दर्शनों एवं धर्मों का स्रोत वैदिक धारा नहीं अपितु श्रमण धारा थी। श्रमण संस्कृति की अनेक मान्यताओं और विश्वासों को भारत की संस्कृति की प्रत्येक दर्शन और धर्म ने ग्रहण किया है। उदाहरण के लिए वैदिक संस्कृति में पूजा नहीं थी। वहां पूजा के स्थान पर केवल यज्ञ होते थे। आज भी हिन्दू धर्म के सनातनी लोग पूजा करते हैं तथा आर्यसमाजी यज्ञ करते हैं। आज के विचारकों को आग्रहविहीन एवं तटस्थ भावमना यह विचार करना चाहिए कि भारतीय संस्कृति की जिस परम्परा ने वर्णाश्रम व्यवस्था एवं श्रोतस्मार्त धर्म को अंगीकार किया, उसका मूल क्या है। इसी प्रकार भारतीय संस्कृति की जिस परम्परा को नास्तिक कहा गया, उसका मूल क्या है। इन दो परम्पराओं में एक को वैदिक अथवा ब्राह्मण तथा दूसरी को समण अथवा श्रमण नाम से अभिहित किया गया है।
प्राकृत समण शब्द के संस्कृत में तीन रूप मिलते हैं- 1. श्रमण 2. समन 3. शमन। श्रमण का अर्थ परिश्रम करना। यह अर्थ इस परम्परा की इस मान्यता को प्रकट करता है कि कोई अन्य हमारा भाग्य विधाता नहीं है। व्यक्ति अपना विकास अपने परिश्रम से स्वयं ही कर सकता है। व्यक्ति ही अपने सुख का कर्ता है। व्यक्ति ही अपने दुख का कर्ता है। समन का अर्थ है- समता भाव। सभी को आत्मवत् समझना। सबके साथ आत्मवत् आचरण करना। समाज के प्रत्येक सदस्य को समान मानना। किसी को श्रेष्ठ तथा किसी को हीन न मानना। जाति तथा वर्ण व्यवस्था में विश्वास न करना। शमन का अर्थ है अपनी वृत्तियों को संयमित करना। परिग्रह की सीमा का निर्धारण करना। इसका शास्त्रीय शब्द है- परिग्रहपरिमाणव्रत का पालन करना।
वैदिक अथवा ब्राह्मण के भी तीन परिच्छेदक अभिलक्षण हैं। 1. यज्ञ करना जिसका आधुनिक नाम हवन करना है। 2. कर्ता रूप में ईश्वर की मान्यता। सब कुछ ईश्वर के ही आधीन है। 3. नियति अथवा भाग्यवाद में विश्वास करना।
समन एवं वैदिक परम्पराओं के अभिलक्षण अब घुलमिल गए हैं। व्यक्ति हवन भी करता है तथा मंदिर में जाकर पूजा भी करता है। कर्मवाद को भी मानता है और भाग्यवाद को भी मानता है। यह इसका प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति उदार, गुणग्राही, समन्वयशील रही है।  
आज हम आतंकवाद और कट्टरवाद के तीव्र और भयानक झंझावात से गुजर रहे हैं। आज हम ऐसे मोड़ पर खड़े हैं कि एक ओर विश्व संस्कृति के प्रसार के कारण बाजार की शक्तियां देशों की सीमाओं को समाप्त कर रही हैं तथा इनके कारण राष्ट्रवाद के स्थान पर अन्तरराष्ट्रीय चेतना का विकास हो रहा है, वहीं दूसरी ओर धर्म, मजहब अथवा रिलीजन के नाम पर अजीब तरह का खूनी आतंकवाद और कट्टरवाद पनप रहा है। इस खूनी आतंकवाद और कट्टरवाद का धर्म अथवा मजहब अथवा रिलीजन से दूर-दूर तक कोई सम्बंध नहीं है। मगर यह कैसी अजीब, अचरजकारी और विचित्र बात है कि आतंक और कट्टरवाद का सारा खूनी खेल धर्म अथवा मजहब अथवा रिलीजन के ही नाम पर हो रहा है।
आधुनिक चिन्तन ने ब्रह्माण्ड की परिकल्पना एक विराट मशीन के रूप में की है। जीवन की प्रगति और विकास के लिए, मशीनों के द्वारा अधिक उत्पादन करने को अनिवार्य मान लिया गया है। प्रत्येक देश की सरकार अपने नागरिकों को इस विकास का झुनझुना दिखाने और पकड़ाने का खेल खेल रही है। सरकारों का सारा विकास 24 घंटे बिजली की उपलब्धता और चमचमाती सड़कों का जाल बिछाने के प्रयासों तक सिमटकर रह गया है। औद्योगिक घरानों के हितों को सम्पादित करने में सरकारें व्यस्त हैं। सारे के सारे देश मशीनों के द्वारा अधिक से अधिक उत्पादन करने, मशीनों के द्वारा उत्पादित सामान की खपत के लिए मंडियों की तलाश करने, अधिक से अधिक पूंजी जुटाने की दौड़ में शामिल हैं। इसके लिए प्रकृति का निर्मम दोहन किया जा रहा है। कारखानों का जहरीला धुआं हवा को जहरीली बना रहा है। कारखानों से निकला जहर हमारी नदियों के पानी को जहरीला बना रहा है। कारखानों से उत्पादित रसायनिक खाद ने हमारी जमीन को जहरीला बना दिया है। ऐसे विकास से क्या लाभ जिसके कारण आदमी न तो साफ हवा में सांस ले सके, न साफ पानी पी सकता है और न स्वस्थ रोटी तथा सब्जी खा सकता है। बाजारवाद और तथाकथित विकास ने हाथ मिलाकर हवा, पानी, जमीन को जहरीला बना दिया है।
इसके समाधान का रास्ता क्या है। विश्व की समस्त सरकारों और शक्तियों को आने वाली पीढिय़ों की जिन्दगी के लिए आतंकवाद और कट्टरवाद का खूनी खेल खेलना छोडऩा होगा। विश्व की समस्त सरकारों और शक्तियों को विश्व की कल्पना एक विराट मशीन के रूप में करने की विचारधारा को छोडऩा होगा। परस्पर सहयोग एवं अन्योन्याश्रित व्यवस्था की भावना को अंगीकार करना होगा। जियो और जीने दो का मूल मंत्र जपना होगा। विश्व की कल्पना एक परिवार के रूप में करनी होगी। यह मानना होगा कि हम सब इस विश्व रूपी जहाज पर सवार सहयात्री हैं। संसार एक परिवार है। हम सबको मिल-जुलकर रहना होगा। हम सबको मिल-बांटकर खाना होगा। नया अर्थशास्त्र बनाना होगा। केवल अधिक पूंजी जोडऩे वाले विकास के मॉडल को तिलांजलि देनी होगी। समावेशी विकास और मर्यादित उपभोग के मॉडल का वरण करना होगा। उपभोग की अमर्यादित लालसा कभी भी तृप्त नहीं हो सकती। इसका कारण यह है कि कामनाओं और इच्छाओं का कोई अन्त नहीं हैं। वे आकाश के समान अनन्त हैं। अमर्यादित उपभोग विनाश का मार्ग है। यदि इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तथा यदि मनुष्य नें अपने उपभोग की सीमा का निर्धारण नहीं किया और अपनी कामनाओं पर संयम की लगाम नहीं लगाई तो विकास और उन्नति तथा प्रगति का तो सवाल ही नहीं उठता, हमारा तथा आपका अर्थात् मानव मात्र तथा जीवमात्र के अस्तित्व के लिए भी भयानक खतरा बन जाएगा। सह-अस्तित्व की भावना की स्वीकृति तथा तदनुरूप आचरण से ही हमारी पृथ्वी स्वर्ग बन सकती है।


 

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