विश्व अर्थव्यवस्था का भविष्य

गिरीश मिश्र : कुछ सप्ताह पहले मर्विन किंग की एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसमें वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डाला है। ...

डॉ. गिरीश मिश्र

कुछ सप्ताह पहले मर्विन किंग की एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसमें वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रकाश डाला है। किंग वर्ष 2003 से 2013 तक बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर थे और अभी अमेरिका और इंग्लैंड में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। किंग की पुस्तक का नाम है ‘दी एंड ऑफ अलकेमी : मनी, बैंकिंग एंड द फ्यूचर ऑफ द ग्लोबल इकॉनामी।
किंग के अनुसार, पिछले बीस वर्षों के दौरान विश्व अर्थव्यवस्था ने अच्छे-बुरे दोनों समय देखे हैं। आरंभ में संवृद्धि और स्थिरता का दौर चला और कई लोग मुगालते में आ गए कि अब भविष्य में अस्थिरता नहीं आएगी किन्तु उनकी खुशफहमी जल्द ही खत्म हो गई और औद्योगिक विश्व का बड़ा आर्थिक  संकट आरंभ हो गया। अगस्त 2007 और अक्टूबर 2008 के दौरान कई बड़े बैंक धराशायी हो गए। 1930 के बाद की सबसे बड़ी मंदी आ गई। इस मंदी के आने के पीछे क्या कारण थे? ज्यादातर अर्थशास्त्री संकट के मूल कारणों के विश्लेषण के बदले उसके लक्षणों में ही उलझे दीखते हैं। अठारहवीं सदी के उत्तराद्र्ध में औद्योगिक क्रांति आई और आधुनिक अर्थव्यवस्था की आधारशिला के तौर पर मुद्रा और बैंकिंग का महत्व बढ़ा। हमारी वित्तीय एवं आर्थिक प्रणाली की गंभीर समस्याओं के रूप में बढ़ती ऋणग्रस्तता देखने में आई। बैंक धराशायी होने लगे तथा मंदी का दौर आरंभ हुआ। कहना न होगा कि ये सब हमारी वित्तीय एवं आर्थिक व्यवस्था को इंगित करती थीं। यदि हम इनका ठीक ढंग से विश्लेषण नहीं कर पाएतो हम यह नहीं समझ पाएंगे कि हमारी अर्थव्यवस्था में बार-बार उतार-चढ़ाव क्यों आता है। क्या यह व्यक्तियों, संस्थानों अथवा विचारों की विफलता का परिणाम था? रोजगार के अवसरों और उत्पादन में गिरावट की दृष्टि से लोगों को काफी परेशानियां झेलनी पड़ीं।
इनको रोकने के लिए हम क्या कुछ कर सकते हैं? किंग का दावा है कि नीति-निर्धारकों अथवा बैंकरों को अक्षम और लालची बनाने के बदले हमें अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना होगा। यह समझना होगा कि हमारी अर्थव्यवस्था कैसे काम करती है। याद रहे कि अर्थशास्त्री कितने भी सुयोग्य क्यों न हो भविष्य के बारे में ठीक-ठीक नहीं बतला सकते। समय के साथ-साथ आर्थिक संकट भी बढ़े हैं। आधुनिक मुद्रा और बैंकिंग ने हमें सामंती व्यवस्था के बाहर निकाला है। उसने गतिशील बाजार व्यवस्था को जन्म दिया है जिस कारण एक संवर्धनशील अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालीन निवेश की आवश्यकता को रेखांकित किया जाता है। अठारहवीं सदी में औद्योगिक क्रांति ने सोना एवं अन्य मूल्यवान धातुओं के स्थान पर कागजी मुद्रा को लाकर इतना परिवर्तन ला दिया कि हम उस समय उसके परिणामों की कल्पना नहीं कर सकते थे। उसने साथ ही मुद्रास्फीति में भारी वृद्धि के साथ-साथ बैंकों के धराशायी होने का रास्ता भी खोल दिया। बीसवीं सदी के दौरान आई मंदी, अति मुद्रास्फीति तथा दो विश्व युद्धों ने आम लोगों केन्द्रीय बैंकों और सरकारों के अर्थव्यवस्था के प्रति रुख में भारी परिवर्तन ला दिया। वर्ष 2007-09 का वित्तीय संकट किसी एक व्यक्ति की लापरवाही या बदइंतजामी का परिणाम नहीं था बल्कि मुद्रा और बैंकिंग की बदइंतजामी के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। दरअसल पूंजीवाद के अंतर्गत पंूजीपति मजदूरों को काम पर लगाता है और उनको मजदूरी देने तथा अन्य सामग्रियों को जुटाने के लिए बैंकों और वित्तीय बाजारों से पैसे उधार लेता है। पश्चिमी देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को खड़ा करने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं जैसे कानून की व्यवस्था के जरिए निजी कारों तथा संपत्ति संबंधी अधिकारों की गारंटी की गई है।
व्यक्तिगत आ•ाादी को बढ़ावा दिया गया है जिससे लोग बेरोकटोक नए विचारों  को जन्म दें, प्रतिद्वंद्विता को बढ़ाएं और एकाधिकार को बढऩे से रोकें और शिक्षा, परिवहन की सुविधाओं, जल प्रबंधन, बिजली दूरसंचार आदि को बढ़ावा दें जिससे उन्नत बाजार अर्थव्यवस्था पनपे। पिछली दो शताब्दियों से हमने आर्थिक संवृद्धि को अटल सत्य मान लिया है।  यह आधुनिक अर्थशास्त्र के जन्मदाता एडम स्मिथ की देन है। एडम स्मिथ ने श्रम विभाजन और विशेषीकरण पर जोर दिया था। उन्होंने मुद्रा और बैंक की भूमिका को रेखांकित किया। परिणामस्वरूप उत्पादकता में वृद्धि होने लगी। कालक्रम में गांवों से लोग शहरों में जाने लगे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक अस्तित्व में आए और उन्होंने ध्वस्त हुई अर्थ व्यवस्थाओं को खड़ा करने में अहम् भूमिका अदा की। मुद्रा स्फीति की दर को कम से कम रखा गया मगर 1960 के आखिरी वर्षों के दौरान मुद्रास्फीति की दरों में कहीं अधिक तो कहीं कम वृद्धि हुई। 1970-71 तक ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ध्वस्त हो गई और परिवर्तनशील विनिमय दर की व्यवस्था उभरी। बाजार में विदेशी मुद्रा की मांग और संवृद्धि के आधार पर विभिन्न करेंसियों की विनिमय दर निर्धारित होने लगी। 1970 के दशक के दौरान तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई और ईरान की क्रांति ने पश्चिमी दुनिया को तेल के संभरण में बाधा डाल दी जिससे तेल की कीमतें बढ़ीं। संयुक्त राज्य अमेरिका में तेल की कीमतें 13 प्रतिशत और ब्रिटेन में 27 प्रतिशत बढ़ गर्ईं।
1970 के दशक के बाद पश्चिमी देशों ने तीन कदम उठाए जिनके कारण मुद्रा, विनिमय दर और बैंकिंग व्यवस्था के प्रबंधन की बेहतर शुरूआत हुई। सबसे पहले केन्द्रीय बैंकों को मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के अधिकार दिए गए जिससे राष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में स्थिरता लाई जा सके। दूसरा कदम था देशों के बीच पूंजी के आने-जाने पर लगी पाबंदी को हटा दिया जाना। तीसरा कदम था: बैंकिंग और वित्तीय व्यवस्थाओं की गतिविधियों को सीमित करने की कार्रवाईयों को समाप्त करना जिससे बैंकों के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़े और नए क्षेत्रों और वस्तुओं के उत्पादन में जा सकें। परिणामस्वरूप 1990 और 2007 के बीच उत्पादन और मुद्रास्फीति में काफी स्थिरता देखी गई। यही कारण है कि इस काल को ‘महान स्थिरता’ (ग्रेट स्टैबिलिटी) का नाम दिया गया। यह स्थिति 1986 से 2006 तक स्पष्ट रूप से दिखी किन्तु इसका कुपरिणाम भी हुआ।
वर्ष 1933 में बैंकों के वाणिज्यिक और निवेश की गतिविधयों को अलग कर दिया गया था किन्तु 1999 में इसे नजरअंदाज किया जाने लगा परिणामस्वरूप बैंक शेयर बाजार में घुसने लगे और अपने संसाधनों पर निर्भर रहने के बदले कर्ज लेकर शेयरों और बांडों में निवेश करने लगे। परिणामस्वरूप वर्ष 2008 आते-आते बैंक संकटग्रस्त होने लगे। अमेरिका और यूरोप में कई नामी-गिरामी बैंक धराशायी हो गए। 1930 के दशक के बाद ऐसा पहली बार देखने में आया।
इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ में कहा गया कि आर्थिक संवृद्धि और जनतंत्र साथ-साथ रहेंगे। आधुनिक पूंजीवाद में सतत् वर्धमान व्यापार, मुक्त बाजार और प्रतिद्वंद्विता तथा विश्वव्यापी बैंक व्यवस्था को एक प्रकार से स्थायी बना दिया है मगर 2008 आते-आते यह व्यवस्था धराशायी हो गई।  अगर हम पीछे मुडक़र देखें तो पाएंगे कि भूतपूर्व सोवियत संघ, चीन और भारत जैसे देशों द्वारा समाजवाद को छोडक़र पूंजीवादी मार्ग अपनाना संकट का तत्काल बड़ा कारण बना। लाखों-लाख मजदूर उत्पादन की पूंजीवादी गतिविधियों में शामिल हो गए और विश्व बाजार में अपने उत्पादों को भेजने लगे। केवल चीन में वर्तमान शताब्दी के दौरान सात करोड़ रोजगार के अवसर विनिर्माण के क्षेत्र में पनपे जो अमेरिका और यूरोप में सृजित रोजगार के अवसरों से कहीं अधिक थे। कहना न होगा कि विश्व बाजार में पहले की अपेक्षा तिगुना माल आ गया। सस्ती उपभोक्ता वस्तुएं लोगों को मिलने लगीं।
तीसरी दुनिया के नवोदित देशों ने जापान और कोरिया का अनुसरण किया जिनका जोर निर्यातोन्मुख विकास पर था। वे देश के आंतरिक बाजार से बाहर निकले। निर्यात को बढ़ाने के लिए अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तीसरी दुनिया के देशों ने अपना विनिमय कम किया जिससे विदेश में उनकी वस्तुओं की मांग बढ़ सके। चीन ने इसका भरपूर लाभ उठाया। चीन का उदाहरण लें तो पाएंगे कि विश्व निर्यात में उसका हिस्सा 1990 में मात्र दो प्रतिशत था जो 2013 में बढक़र 12 प्रतिशत हो गया। चीन ही नहीं, बल्कि अन्य देशों ने अपना उत्पादन बढ़ाकर विश्व बाजार में रखा। पिछले कुछ दशकों के दौरान पूंजी प्रवाह में काफी परिवर्तन हुआ है। पहले जहां विकसित देशों से पूंजी अल्प विकसित देशों में जाती थी अब स्थिति बदल गई है अब उदीयमान देशों से पूंजी का प्रवाह विकसित देशों की ओर हो रहा है। पूंजी प्रवाह की दिशा बदल गई है। ऐसा कैसे हुआ है उस पर विचार करने की आवश्यकता है।
सोवियत संघ के धराशायी होने के बाद सारा विश्व कमोबेश पूंजीवाद के अंतर्गत आ गया है इसलिए इसको देखने के लिए नया नजरिया अपनाना होगा।


 

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