लौटना होगा कांशीराम के भागीदारी दर्शन की ओर

एच एल दुसाध : सोलहवीं लोकसभा चुनाव मोदी की विस्मयकारी सफलता ने स्वाधीन भारत के चुनावी इतिहास में कई नए अध्याय जोड़ दिए हैं ...

एच.एल. दुसाध

सोलहवीं लोकसभा चुनाव मोदी की विस्मयकारी सफलता ने स्वाधीन भारत के चुनावी इतिहास में कई नए अध्याय जोड़ दिए हैं जिनमें सुनामी में तब्दील हुई उनकी आंधी में क्षत्रपों का सफाया एक खास अध्याय है। वैसे तो उनकी सुनामी में वाम मोर्चा के साथ महाराष्ट्र में शरद यादव, तमिलनाडु में करुणानिधि, बिहार में लालू-नीतीश  जैसे अन्य कई क्षेत्रीय दलों और क्षत्रपों का कमोबेश सफाया हो गया है, किन्तु जिस यूपी से होकर रास्ता दिल्ली की तख्त की ओर जाता है वहां मुलायम सिंह यादव, अजित सिंह, मायावती जैसे सामाजिक न्याय के नायक/नायिकाओं की हार चर्चा का खास विषय बन गई है। यूपी में जो काम भाजपा राम नाम के सहारे नहीं कर पाई, वह काम 'नमो जापÓ से हो गया। वर्ष 1977 की 'जनता पार्टीÓ की लहर और वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु से उठी सहानुभूति की लहर को छोड़ दिया जाय तो पहली बार यहां किसी पार्टी को 71 सीटें मिली हैं। इनमें 'अपना दलÓ की दो सीटें जोड़ दी जाएं तो इस बार उसकी सीटें 73 हो गई हैं।  इसके पहले पार्टी को 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में क्रमश: 51, 52, 57, 29, 10 और 10 सीटें मिलीं थीं।
मोदी की सुनामी में यदि सबसे अधिक किसी को नुकसान पहुंचा है तो वह बसपा है। उसकी नुमाइंदगी के लिए एक भी व्यक्ति संसद में नहीं पहुंचा है। इससे पूर्व संसद में  1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में उसके क्रमश: 02, 01, 06, 04, 14, 19 और 20 सदस्य रहे। सांसदों की संख्या शून्य छूने के साथ ही इस बार उसके वोट प्रतिशत में भी भारी गिरावट आई है। 2009 के 27.42 के मुकाबले इस बार उसका वोट प्रतिशत 20 के लगभग रह गया है। जाहिर है मोदी की सुनामी ने उसे 18 वर्ष पूर्व की स्थिति में धकेल दिया है, जब 1996 में उसे 20.61 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2009 में अनुष्ठित 15 वीं लोकसभा तक लगातार बढ़ता रहा। उसकी सबसे शर्मनाक हार तो उत्तर प्रदेश की 17 आरक्षित सीटों पर हुई है जो सभी भाजपा की झोली में चली गई हैं।
बसपा की करारी शिकस्त से जहां जातिवाद से त्रस्त बुद्धिजीवी भारतीय राजनीति में  जातिवाद के अंत की शुरुआत मानकर आह्लादित हैं, वहीं सामाजिक न्याय के पक्षधर काफी सदमे में हैं।  कारण, यही वह पार्टी है जिसने जातिवाद का ऐसा गेम खेला जो भारत में सामाजिक बदलाव का बड़ा कारण बन सकता था। स्मरण रहे वर्ण-व्यवस्था के अर्थशास्त्र के तहत शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक-से बहिष्कृत कर अशक्त बनाई गई जातियों की बेहतरी के लिए कुछ करना/कहना भारत के मुख्यधारा के लोगों द्वारा जातिवाद के रूप में निन्दित रहा है। दूसरे शब्दों में, शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर सामाजिक अन्याय का शिकार बनाए गए सामाजिक समूहों को न्याय दिलाने प्रयास जातिवाद के रूप में चिन्हित होता रहा है। वर्ण-व्यवस्था के वंचितों के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई की शुरुआत 19 वीं सदी में शूद्र समाज में जन्मे फुले ने की जो परवर्तीकाल में शाहूजी महाराज, पेरियार इत्यादि से होते हुए बाबा साहेब आंबेडकर प्रयत्नों से बुलंदी की ओर पहुंची। आंबेडकर के बाद लोहिया ने इस लड़ाई को आगे बढ़ाते हुए राजनीति, व्यापार, पलटन और ऊंची सरकारी नौकरियों में 90 प्रतिशत शोषितों के लिए 60 सैकड़ा स्थान सुरक्षित करने की मांग उठाई। पर, बिहार के जगदेव प्रसाद ने लोहिया से भी आगे बढ़कर सार्वजनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में 90 प्रतिशत शोषितों के लिए 90 प्रतिशत स्थान सुरक्षित करने का अभियान चलाया। किन्तु बाद में कांशीराम ने सामाजिक न्याय का भिन्न दर्शन प्रस्तुत किया। वह थी जिसकी 'जितनी संख्या भारी-उसकी उतनी भागीदारी। वास्तव में बामसेफ, डीएस-4 के बाद सभी सामाजिक समूहों के मध्य शासन-प्रशासन तथा समस्त आर्थिक गतिविधियों का वाजिब बंटवारा कराने के लिए ही कांशीराम ने 'बीएसपी की स्थान की थी।
बहरहाल, परवर्तीकाल में लोहिया, जगदेव प्रसाद, कांशीराम जैसे सामाजिक न्याय के महानायकों का योग्य अनुसरणकारी बनकर रामविलास पासवान, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और मायावती ने हिंदी पट्टी में अपनी जबरदस्त उपस्थित दर्ज कराई। किन्तु इस लड़ाई को लम्बे समय तक जारी न रख सके। 2009 का चुनाव आते-आते वे जाति-मुक्त दिखने का प्रयास करने लगे। परिणामस्वरूप 2009 में ही गहरी पराजय मिली और वे पतन के कगार पर पहुंच गए, पर उस हार से कोई सबक नहीं लिए। अंतत: सोलहवी लोकसभा में उनका निर्णायक तौर पर पतन हो गया।
15 वीं लोकसभा चुनाव में जातिवादी कहलाने से बचने के लिए लोहिया और कांशीराम के अनुसरणकारियों ने भारी तैयारी के साथ चुनावी मैदान में कदम रखा था। इसलिए रामविलास पासवान, लालूप्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे सामाजिक न्याय के सूरमाओं ने न तो एक बार भी सामाजिक न्याय शब्द का उल्लेख किया और न ही 90 प्रतिशत पिछड़े वर्गों के लिए 90 प्रतिशत हिस्सेदारी की मांग ही उठाई। हालांकि इन तीन लोहियावादियों से अम्बेडकरवादी कभी कोई विशेष उम्मीद नहीं पाले।किन्तु जिनसे आंबेडकरवादी ही नहीं, लोहियावादी और दूसरे समाज परिवर्तनकामी बड़ी उम्मीद पाल रखे थे, वह मायावती अपनी जातिवादी की छवि मिटाने के लिए कुछ ज्यादा ही प्रयासरत रहीं। इसके लिए उन्होंने 2005 से अपनी पार्टी को बहुजन से सर्वजनवादी में तब्दील करने का प्रयास शुरू कर दिया। इस दौरान दलित बुद्धिजीवियों के प्रयास से दलित-बहुजनों  में नौकरयों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार इत्यादि हर क्षेत्र में ही संख्यानुपात में भागीदारी की चाह बढऩे लगी। किन्तु बसपा सुप्रीमो ने उनकी चाह की उपेक्षा करने के साथ ही कांशीराम के भागीदारी दर्शन, जिसकी जितनी संख्या भारी को पलटकर 'जिसकी जितनी तैयारी-उसकी उतनी हिस्सेदारीÓ में तब्दील कर दिया। मतलब साफ था बसपा सुप्रीमो ने 2009 में ही कांशीराम के भागीदारी दर्शन को सर के बल खड़ा कर दिया था। उनकी चिंता के दायरे में बहुजनों की सर्वत्र भागीदारी नहीं, गरीब सवर्णों का आरक्षण आ गया था। भागीदारी दर्शन से विचलन का 15 वीं लोकसभा चुनाव में फल यह मिला कि मायावती का प्रधानमंत्री बनने का सपना ऐसे दु:स्वप्न में परिणत हो गया कि उन्हें 2014 में अपने समर्थकों को प्रधानमंत्री का नारा बुलंद करने से मना करने के लिए बाध्य होना पड़ा। किन्तु 2009 में सपना टूटने से उन्होंने जरा भी सबक नहीं लिया और 2014 में भी अपनी चुनावी राजनीति पुराने ढर्रे पर कायम रखा, जिसके फलस्वरूप इस बार उन्हें शून्य पर आ जाना पड़ा।
बहरहाल, 2009 की हार से उन्होंने एक सबक लेते हुए हर प्रकार के सरकारी ठेकों में दलित-आदिवासियों के लिए 23 प्रतिशत हिस्सेदारी सुनिश्चित किया। किन्तु इससे बहुजन समाज के बाकी अंश, पिछड़े और अल्पसंख्यकों को वंचित रखा। यदि वह ठेकों सहित अन्य आर्थिक सभी गतिविधियों में दलितों के साथ पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी दिलाने का मुद्दा लेकर चुनाव में उतरतीं, सीटों के मामले में वह मोदी की सुनामी में भी ममता और जय ललिता से होड़ लगातीं। किन्तु तमाम कमियों के बावजूद बसपा के साथ सुखद बात है कि कुल राष्ट्रीय वोट का 4.1 प्रतिशत पाने के कारण यह भाजपा और कांग्रेस के बाद देश की तीसरी बड़ी पार्टी है और देश के हर प्रान्त में ही इसके समर्थक हैं। ऐसे में मायावती के लिए शून्य से शिखर को छूना मुमकिन है। लेकिन इसके लिए उन्हें दो काम करने होंगे। पहला, सर्वजन से मोह-मुक्त होकर कांशीराम के भागीदारी दर्शन को नए सिरे अडॉप्ट करना होगा। और दूसरा, उन्हें अपनी पार्टी की विचारधारा को फैलाने के लिए मोदी से कम से कम डेढ़ गुना मेहनत करनी होगी जो उन्होंने मिशन-272 को पाने के लिए किया।
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)  

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