लीक बदल कर लकीर पीटने से मुक्ति

योगेश मिश्र : उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए तमाम अनिवार्य और ऐच्छिक योग्यता के साथ यह भी जिक्र होता है कि यदि कोई भी व्यक्ति उस विषय का प्रवीण विद्वान हो तो उसे भी बिना किसी चयन समिति के प्रोफेसर बनाया जा सकता है। ...

योगेश मिश्र

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए तमाम अनिवार्य और ऐच्छिक योग्यता के साथ यह भी जिक्र होता है कि यदि कोई भी व्यक्ति उस विषय का प्रवीण विद्वान हो तो उसे भी बिना किसी चयन समिति के प्रोफेसर बनाया जा सकता है। कभी जब पंडित मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी तब और अंशत: शांति निकेतन में प्रोफेसरों के चयन में इस नियम का पालन किया गया था। पर बीते दो-तीन दशकों में शायद ही कोई विशिष्टता प्राप्त प्रवीण से प्रवीण विद्वान इस तरह से प्रोफेसर नियुक्त हुआ हो। कुछ यही वजह रही कि विशिष्टता और प्रवीणता दर्शाने के लिए सर्टिफिकेट्स का सहारा लिया गया। कागज आदमी की प्रवीणता और बौद्धिकता से भारी हो गया, इसे प्रमाणित करने लगा। नि:संदेह यही वजह रही होगी कि हमारे कृषि स्नातक के दिमाग में यह धारणा घर कर गई हो गई कि वह खेतों की फसल फाइलों पर उगाए और अपनी दस्तखत से काट ले।
 बीते लोकसभा चुनाव से कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान में जुटे नरेंद्र मोदी के फैसले यह बताते हैं कि वह इस तरह की रीति और नीति, कथा-वृतांत और अवधारणाएं बदलना चाहते हैं। वह लीक पर चलने को तैयार नहीं हैं। वह सारी अवधारणाएं और कथाएं जो अब तक प्रचलित थीं, उसे बदलना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने जनसंवाद का एक फोरम खोला है जो माई जीओवी डाट काम के तौर पर काम करता है। इस पर कोई विचार डालिए तो सरकारी महकमा इस पर काम शुरु करता है। देखता- परखता है, जांचता है। देश-समाज हित में हुआ तो क्रियान्वित भी करता है। बीते 16 जून से 21 राज्यों के 2200 राज्यों में लागू की गई विद्यांजलि योजना अवधारणाएं बदलने की प्रक्रिया की नई बानगी है। इसमें कोई नामचीन या सामान्य आदमी अगर किसी भी क्षेत्र में दक्षता का एहसास करता है तो आनलाइन आवेदन कर हाल-फिलहाल देश के 2200 स्कूलों में जाकर बच्चों के बीच अपने हुनर-दक्षता बांट सकता है। अगली पीढ़ी को अपने विशेषण से लाभान्वित कर सकता है। इस शुरुआत की तारीफ होनी चाहिए। आलोचना भी हो सकती है। होनी भी चाहिए। क्यों इसे सिर्फ 2200 स्कूलों तक सीमित रखा गया है। बचाव में इसे पायलट प्रोजेक्ट कहा जा सकता है। प्रयोग कह सकते हैं। एक ऐसे देश में जहां 60-70 की आबादी 8.7 फीसदी है। भारत की कुल आबादी करीब 128 करोड़ है। वर्ष 2050 तक यह आयु वर्ग देश का 20 फीसदी होगा। हर साल 40 लाख लोग रिटायर हो रहे हैं। 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में भारत में औसत आयु अब 66.21 साल हो चुकी है। इसमें इजाफा हुआ है। यही नहीं, आदमी की कार्यशील उम्र भी बढ़ी है। इसकी वजह शहर से लेकर गांव तक खुद को सक्रिय रखने के तमाम नुस्खे। खुद का ख्याल रखने की बढ़ती मनोवृत्ति और फिट देखने की चेतना है। अगर ऐसा सच नहीं होता तो नरेंद्र मोदी का योग दिवस भारत समेत पूरी दुनिया में लोकप्रियता का आयाम नहीं हासिल करता। सौन्दर्य प्रसाधनों का बाजार निरंतर 17 से 23 फीसदी नहीं बढ़ता। अंतरराष्ट्रीय कंपनिया आदमी को फिट रखने के नुस्खे बेच कर अकूत कमाई नहीं कर पाती है। और तो और ऐसी वेबसाइट बाजार में है जो बाकायदा रिटायरमेंट ले चुके लोगों, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) हासिल कर चुके लोगों और 55 साल से ऊपर के लोगों को फिर से नौकरी दिलाती है। ये वेबसाइटें बाजार में काफी लोकप्रिय भी हैं।
कार्यशील उम्र बढऩे का नतीजा है कि सरकार को सेवानिवृत्ति की उम्र 58 से 60 और फिर 62 साल करनी पड़ी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग फिट रहने पर 70 साल की उम्र तक काम करने देने पर विचार करता है। पर इन सबको दरकिनार करते हुए हम 60 साल में आदमी को घर पर बैठा देते हैं। 60 की उम्र के बाद एक आदमी हमारे लिए राष्ट्रीय आय में योगदान करने के लायक नहीं रह जाता। हालांकि तब तक अपने क्षेत्र में अनुभव का विराट संसार खड़ा कर चुका रहता है। लेकिन इस अनुभव का लाभ पाने की जगह हम उसे मिसफिट मान लेते हैं। विद्यांजलि योजना हालांकि ऐसे कुछ लोगों के अवसर के द्वार खोल देगी। पर यह मु_ी भर लोगों के लिए ही यह मौका देती है। एक ऐसे देश में जहां संसद और विधानसभाओं के अलावा किसी भी जगह पर पूरी सीट भरी नहीं हैं। जहां तमाम विभागों के असंख्य पद रिक्त हैं। इस देश में प्राथमिक विद्यालयों में 12 लाख शिक्षक कम हैं। वहीं देश के सरकारी 13 लाख स्कूलों में 11 फीसदी प्राथमिक विद्यालय एकल शिक्षक पर चल रहे हैं। यानी पूरे स्कूल में सिर्फ एक ही टीचर हैं। सरकारी स्कूलों में 70 हजार माध्यमिक टीचरों की कमी है। वहीं सीबीएसई के सरकारी स्कूलों में 6 लाख टीचरों की कमी है। इस देश में 5.23 लाख पद सेना में रिक्त हैं।
अगर हम 60 से 70 की उम्र के फिट लोगों को इन जगहों पर लगा सकें तो यह उनका राष्ट्र के प्रति योगदान ही नहीं होगा, उनकी रोजी रोटी ही नहीं चलेगी, बल्कि इससे कार्यशील उम्र भी बढ़ा सकते हैं। सेवानिवृत्त होने के बाद आम तौर पर आदमी की दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। उसके लिए मुश्किल हो जाता है कि वह क्यों तैयार हों, क्यों जल्दी उठें। उसके पास बहाना हो जाता है- आफिस तो जाना नहीं है, कोई काम तो है नहीं। पर अगर इन लोगों से पूछकर इन्हें प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षण का कार्य दिया जाय तो यह नए और सीधी भर्ती के अध्यापकों से अधिक रुचि और श्रम के साथ अध्यापन करेंगे। क्योंकि उम्र के इस पड़ाव तक जिंदगी की जिम्मेदारियां खत्म हो चुकी रहती हैं। बच्चों की अपनी दुनिया हो जाती है। स्त्री-पुरुष नितांत अकेले हो जाते हैं। अकेलापन उन्हें सालता है। काम न होने की वजह से धीरे-धीरे शरीर और मन थकने लगता। रुक जाता है। इन लोगों के थक रहे हाथों को अगर हम काम दे सकें तो देश के विकास और समृद्धि में योगदान का नया अध्याय भी खोला जा सकता है। विद्यांजलि योजना कुछ लोगों का स्कूलों तक पहुंचने के लिए मार्ग प्रशस्त करती है। पर हमें इससे आगे बढऩा है। सभी काम करने के इच्छुक लोगों को उनके रुचि के क्षेत्रों में काम देने का मार्ग भी खोलना होगा।
साठ के बाद की आबादी के लिए उन्हीं कामों को करने का भुगतान भी वह नहीं करना होगा जो नए और सीधी भर्ती के लोगों को करना पड़ता है। देश में बीस साल तक बच्चा मां-बाप पर आश्रित रहता है। 60 के बाद आदमी काम बंद कर देता है। भारत के विकास एवं समृद्धि की गाथा 68 साल की औसत उम्र वाले व्यक्ति के सिर्फ 40 साल के योगदान से लिखी जा रही है। अगर हम कार्यशील संसाधन में 60 से अधिक उम्र के फिट लोगों के जोड़ सकें तो नि:संदेह विकास की गति रफ्तार पकड़ लेगी।  
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


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