रूस के खिलाफ कोई नई पाबंदी नहीं लगवा पाया अमेरिका

शेष नारायण सिंह : अ मेरिका की विदेश नीति की एक और बड़ी असफलता सामने आई है। उनकी रूस नीति की जर्मनी के शहर गार्मिश पारतेंनकिरचन के एक रिजार्ट में हुए जी-7 शिखर सम्मलेन में एक बार फिर धज्जियां उड़ गई हैं। शिखर सम्मलेन के दौरान और उसके पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस बात पर लगे रहे कि यूक्रेन के मामले में रूस को दबाने के लिए उसके ऊपर और पाबंदियां लगाना जरूरी है,...

शेष नारायण सिंह

अमेरिका की विदेश नीति की एक और बड़ी असफलता सामने आई है। उनकी रूस नीति की जर्मनी के शहर गार्मिश पारतेंनकिरचन के एक रिजार्ट में हुए जी-7 शिखर सम्मलेन में एक बार फिर धज्जियां उड़ गई हैं। शिखर सम्मलेन के दौरान और उसके पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस बात पर लगे रहे कि यूक्रेन के मामले में रूस को दबाने के लिए उसके ऊपर और पाबंदियां लगाना जरूरी है, लेकिन ऐसा कोई फैसला करवाने में नाकाम रहे। यह अलग बात है कि जर्मनी के बावरिया में एक खूबसूरत रिजार्ट में इकट्ठा हुए दुनिया के सबसे ज़्यादा संपन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों को इस बात पर राजी जरूर कर लिया कि अमेरिका के प्रस्तावों का खुलकर विरोध न किया जाए। बराक ओबामा पक्के तौर पर मन बनाकर आये थे कि रूस को जी-7 में घेर लिया जाएगा, लेकिन जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने बाकी और मुद्दों पर बहस को जिंदा रखा। यह अलग बात है कि मीडिया में रूस के प्रति अमेरिकी रुख की खबरें ही प्रमुखता से नकार आईं, लेकिन अन्य मुद्दों पर भी बात हुई। और अहम् फैसले लिए गए। जी-7 के यूरोपीय सदस्यों, ब्रिटेन, इटली और फ्रांस ने कहा कि अभी रूस के खिलाफ ताजा पाबंदियों की जरूरत नहीं है। जब यूरोपियन यूनियन की बैठक इस महीने के अंत में होगी, तो उसमें वे लोग रूस के खिलाफ जो भी कदम उठाये जाने हैं, उस पर विचार करेंगे। रूस के खिलाफ यूरोपियन यूनियन की भी पाबंदियां हैं और इन देशों ने कहा कि उसी के जरिये रूस पर बात की जाएगी।
जाहिर है अपने मन की बात न मनवा पाने से बराक ओबामा खासे दु:खी थे। शायद इसीलिये उन्होंने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन पर अब तक का अपना सबसे सख्त भाषण दिया, जबरदस्त मौखिक हमला किया। उन्होंने कहा कि पुतिन अपने देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर रहे हैं। उन्होंने सवाल किया कि क्या पुतिन के दिमाग में कहीं से यह समा गया है कि वे सोवियत साम्राज्य के वैभव को फिर से वापस ला सकंेगे? बराक ओबामा के प्रयासों के कारण रूस पर एकता का माहौल तो बना रहा, लेकिन नई तरह की पाबंदियों की अमेरिकी योजना धरी की धरी रह गई। जर्मनी ने कहा कि ‘अगर’ हालात और बिगड़े तो पाबंदियों को सख्त किया जाएगा, लेकिन एंजेला मर्केल को भरोसा है कि उसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। हालात अपने आप ठीक हो जाएंगे।
दुनिया के सबसे सम्पन्न देशों का यह संगठन पहले जी-8 हुआ करता था, लेकिन अब अमेरिकी प्रयासों से रूस को निकाला जा चुका है और संगठन का नाम भी बदल दिया गया है। अब इस संगठन में अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, कनाडा और जापान ही सदस्य हैं। अमेरिका की कोशिश थी कि रूस और उसके राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया जाए कि रूस यूक्रेन और क्रीमिया के मामले में अमेरिका की बात मान ले। अमेरिका चाहता है कि रूस को उसी तरह से घेर लिया जाए जिस तरह से शीतयुद्ध के दौरान सोवियत यूनियन को घेरा जाता था, लेकिन बात अब बदल चुकी है। एक साल पहले बराक ओबामा ने अपने साथियों को एकजुट कर लिया था और रूस को दण्डित करने की योजना को अमलीजामा पहना दिया था, लेकिन आज साल भर बाद यह बिलकुल साफ हो गया है कि वे लोग जिस तरह के नतीजों की उम्मीद कर रहे थे वह हाथ नहीं आया है। ओबामा और उनके साथियों को उम्मीद थी कि जब रूस की आर्थिक नाकेबंदी कर दी जाएगी तो रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन उनकी बात मान लेंगे और क्रीमिया को छोड़ देंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उल्टे रूस ने क्रीमिया को बाकायदा अपने देश का हिस्सा बना लिया। और अब पुतिन इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप के धनी देशों के बीच जो दोस्ती है, उसमें कुछ दरारें आयें तो वे अपनी स्थिति को और मजबूत करें। उन्होंने देखा है कि जब फ्रांस ने रूस को जी-8 से निकालने की बात की थी, तो जी-8 की सदस्य जर्मन चांसलर एंजेलिना मर्केल फ्रांस के वक्तव्य पर अपनी असहमति जताते हुए रूस को जी-8 का सदस्य बनाये रखने की बात की थी। चीन और भारत पूरे मामले पर शांत हैं और ब्रिक्स के रास्त्रे रूस के पक्ष में दिख रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली घटना है, जब रूस ने किसी देश के किसी प्रान्त को अपनी सीमा में मिलाने का प्रयत्न किया है। क्रीमिया के विवाद पर अब विश्व दो धड़ों में बंटता दिख रहा है, जो पूर्व सोवियत युग की याद दिलाता है। अमेरिका इस कूटनीतिक मामले में उतना ही उलझ गया है, जितना सोवियत युग में हुआ करता था। रूस को सजा देने के साथ-साथ अमेरिका रूस को राजी करने की कोशिश भी कर रहा है। अभी कुछ दिन पहले अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी काला सागर के तट पर स्थित नगर सोची में जाकर ब्लादिमीर पुतिन से मिले थे। अजीब बात है, क्योंकि इस यात्रा का विरोध अमेरिकी सरकार में भी हुआ और रूस ने इसको अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में बाकी दुनिया के सामने पेश किया।
इस ऊहापोह भरी कूटनीतिक भूल-भुलैया के बीच बराक ओबामा जी-7 शिखर सम्मलेन में भाग लेने जर्मनी पंहुचे थे। उनके एजेंडे में सबसे ऊपर रूस को घेरने की रणनीति को और मजबूत करना था, जबकि जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल जलवायु परिवर्तन को मुद्दा बनाना चाहती थीं, लेकिन रूस को मुख्य मुद्दा बनाए रखने में बराक ओबामा सफल रहे। एंजेला मर्केल ने औद्योगिक देशों की ओर से गरीब देशों को जलवायु की रक्षा में शामिल करने के लिए जो 100 अरब डॉलर देने का कोपेनहेगन में वादा किया गया था, उसको तुरंत लागू करने की मांग की। एंजेला मर्केल अफ्रीकी देशों और इराक से जो बात हुई है, उसके आधार पर आतंकवाद का मुकाबला करने पर सहमति बनी है। यह भी तय किया गया कि ईंधन के रूप में कोयला आदि के इस्तेमाल को धीरे-धीरे खत्म करने पर भी चर्चा हुई। जी-7 ने तय किया कि 2050 तक भयानक गरीबी को खत्म कर दिया जाएगा।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैमरून जी-7 के सदस्य राज प्रमुखों ने यह अपील की कि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन के बीच होने वाले समझौते ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एवं इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप (टीटीआईपी) को अंतिम रूप दें। करीब 700 दिन तक इस समझौते पर बातचीत होती रही है, लेकिन अभी तक कोई भी सहमति नहीं बनी है। इसके अलावा ब्रिटिश प्रधानमंत्री कैमरून भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने की बात भी की। उनका मानना है कि फुटबॉल की राजनीति में जिस तरह से भ्रष्टाचार का बोलबाला है, वह माफी लायक नहीं है। उनका विश्वास है कि भ्रष्टाचार लोकतंत्र के लिए कैंसर की तरह खतरनाक है। इबोला के खिलाफ दुनिया भर में अभियान चलाने के लिए भी धन का बंदोबस्त करना आज के एजेंडे में था। यूरो से यूनान के अलग होने के खतरे पर भी बात होने वाली है। अमेरिका ने इराक के प्रधानमंत्री हैदर अल-आब्दी को भी तलब कर लिया था, जिन्होंने इराक और सीरिया में हमलावर बने आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के बारे में मुकामी जानकारी दी।
बावरिया के उस गांव में जहां यह सम्मलेन हो रहा है, वहां पूरे यूरोप से सामाजिक और न्याय के पक्षधर कार्यकर्ता जमा हो गए हैं। वे ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एवं इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप (टीटीआईपी) का हर हाल में विरोध कर रहे थे। उनका आरोप है कि ट्रांस अटलांटिक ट्रेड एवं इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप (टीटीआईपी) से पूंजीपतियों, धन्नासेठों और बैंकों को ही फायदा होने वाला है, इसलिए इसका पूरी ताकत से विरोध होना चाहिए। इस समझौते के हो जाने के बाद पर्यावरण और मजदूरों के अधिकारों का भारी नुकसान होगा। इसके बाद लोकतंत्रीय संस्थाओं का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यह विरोध प्रदर्शन सम्मलेन शुरू होने के पहले से ही चल रहा था। पुलिस ने प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी और फोर्स का इस्तेमाल करके विरोधियों को खास सफल नहीं होने दिया।
बराक ओबामा की सारी कोशिशों के बावजूद भी जी-7 से कोई सख्त बयान नहीं आया। रूस के सरकारी प्रवक्ता ने मास्को में एक बयान जारी करके कहा कि जी-7 से नई पाबंदियों का खतरा तो था, लेकिन कोई नई बात सामने नहीं आई। रूसी प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने दावा किया कि जी-7 के नेताओं में अमेरिका की बात पर सहमति नहीं है और वह इस बार भी नहीं बन पाई। बराक ओबामा ने सारी ताकत लगा दी, लेकिन रूस के खिलाफ कोई नया ठोस कदम नहीं उठाया जा सका। बस इस बात पर सहमति बनी कि आगे विचार करेंगे। यह जी-7 का शिखर सम्मलेन इस बात का सबूत है कि अब इस तरह के मंचों पर अमेरिका की मनमानी नहीं चलती।


 

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