रायसीना रोड की राजनीति ने फिर जबरदस्त करवट ली

शेष नारायण सिंह : प्रधानमंत्री इस बात से बहुत चिंतित हैं कि सरकार के बारे में देश में अच्छी राय नहीं हैं.. 'फील गुड फैक्टरÓ गायब है। उन्होंने तीन कैबिनेट मंत्रियों, अनंत कुमार, जेपी नड्डा और नरेंद्र सिंह तोमर की अगुवाई में एक समिति बनाई है जो बीजेपी के सभी सांसदों से नियमित रूप से संपर्क रखेगी और विकास की गतिविधियों को चर्चा में रखेगी।...

शेष नारायण सिंह

प्रधानमंत्री इस बात से बहुत चिंतित हैं कि सरकार के बारे में देश में अच्छी राय नहीं हैं..
'फील गुड फैक्टर' गायब है। उन्होंने तीन कैबिनेट मंत्रियों, अनंत कुमार, जेपी नड्डा और नरेंद्र सिंह तोमर की अगुवाई में एक समिति बनाई है जो बीजेपी के सभी सांसदों से नियमित रूप से संपर्क रखेगी और विकास की गतिविधियों को चर्चा में रखेगी। इस काम के लिए एक स्थाई व्यवस्था की जायेगी। मंत्री लोग सांसदों से मिलेगें, मीटिंग के मिनट्स रखे जायेंगे और सरकार के काम में सांसदों और उनके ज़रिये जनता को भागीदार बनाए रखने की कोशिश की जायेगी। इस घटनाक्रम को नरेंद्र मोदी सरकार की उन गतिविधियों में माना जा रहा है जिसके ज़रिये वे सरकार के कामकाज में आबादी के बड़े हिस्से को शामिल करना चाहते हैं।  मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने गुजरात में इस काम को सफलता पूर्वक किया था। जिस लोकप्रिय जनादेश से वे केंद्र में सरकार बनाने आये थे, उम्मीद की  जा रही थी कि उनको सरकार के मुखिया के रूप में देश में सम्मान मिलेगा, लेकिन जो शुरुआती सम्मान यहां मिला था वह धीरे धीरे गायब हो रहा है। यूपीए की सरकार के कथित भ्रष्टाचार की कहानियों के ज़रिये बनाए गए राजनीतिक माहौल के बाद सत्ता में आई सरकार के काम ऐसे नहीं  हैं कि उस सरकार के प्रति  'फील गुडÓ   का भाव बन सके। चुनाव के पहले और चुनाव के बाद बीजेपी और नरेंद्र मोदी के समर्थकों की बहुत बड़ी संख्या हुआ करती थी लेकिन पिछले 19 महीने में वह संख्या धीरे धीरे कम हो रही है। फील गुड का भाव ख़तम हो रहा है।  पेट्रोल की कीमतें पूरी दुनिया में घट गयी हैं लेकिन घटी हुयी कीमतों का लाभ भारत के उपभोक्ता को उस हिसाब से नहीं मिल रहा है।  जिन मंत्रालयों के अच्छे काम के कारण अर्थव्यवस्था को व्यवस्थित करने की बात की गयी थी , वे सब डावांडोल हैं ।  सबसे बड़ी निराशा तो रेल मंत्रालय से हुयी है।  डेढ़ साल में दो बार किराए बढ़ा लिए गए, तत्काल आदि की बुकिंग में कई  गुना की बढ़ोतरी की गयी जबकि डीज़ल और कच्चे तेल के आयात की कीमत में भारी कमी आयी है ।  उम्मीद की गयी थी कि रेल के ज़रिये सरकार के अच्छे काम का सन्देश आम आदमी तक , देश के हर कोने तक पहुंचेगा और सरकार की छवि में सुधार होगा लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। जो सन्देश गांव गांव जा रहा है, वह सरकार को नुकसान पंहुचा रहा है। सन्देश यह जा रहा  है कि रेल की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गयी है और उसके सुधार की कोई संभावना  नहीं है । किसी भी ट्रेन में कहीं भी चले जाइए ,लोग पिछली सरकार से तुलना करते मिल जाएंगे और लगभग एक राय से मौजूदा व्यवस्था को घटिया बताएंंगे। अगर इस बात की सूचना प्रधानमंत्री तक पहुंची है तो निश्चित रूप से उनको निराशा हो रही होगी क्योंकि एक सहयोगी दल से नाराजगी मोल लेकर उन्होंने अपनी सरकार का रेल मंत्री तैनात किया था और उम्मीद की थी कि उस काबिल मंत्री के काम से सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन रेल का इंतज़ाम पहले से बहुत कमज़ोर है और यह बात सारी दुनिया को मालूम है। आर्थिक नीतियों में सुधार के ज़रिये महंगाई और बेरोजगारी को ख़त्म करने के वायदे के साथ मई 2014 में केंद्र सरकार ने शपथ ली थी।  उम्मीद की गयी थी कि ऐसे कानूनों को बनाया जाएगा जिससे आर्थिक  विकास को मदद मिले। सरकार ने औद्योगीकरण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में भारी बदलाव का संकल्प लिया था, और नई लोकसभा के पहले ही सत्र में कांग्रेसी राज में 2013 में बनाये गए भूमि अधिग्रहण कानून को संशोधित करने वाला बिल पेश कर दिया था। इस नए बिल को विपक्ष ने ठंडे बस्ते में डालने के लिए सरकार को मजबूर कर दिया। आज कोई नहीं बता सकता कि वह बिल पास भी हो पायेगा कि नहीं।  यही हाल जीएसटी बिल  का है।  देश के औद्योगिक विकास में वर्तमान कर प्रणाली एक बड़ी बाधा है। विदेशों से आकर जो लोग देश में पूंजी लगाना चाहते हैं, वे यहां की टैक्स व्यवस्था से घबरा  जाते हैं । अर्थशास्त्र के विद्वान पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह बात मालूम थी, शायद इसीलिये उन्होंने कर प्रणाली को दुरुस्त और पूंजीपति की पक्षधर बनाने के लिए जीएसटीबिल संसद में पेश  किया था लेकिन उसको पास नहीं करवा सके। उनकी सरकार गठबंधन की सरकार थी और उनके पास ज़रूरी बहुमत नहीं था। शीतकालीन सत्र के पहले कांग्रेस से बातचीत हो गयी थी और उम्मीद बन गयी थी कि शायद बात बन जाये लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि कांग्रेस वाले नाराज़ हो गए। नेशनल हेराल्ड केस की सुनवाई में कुछ ऐसी पेंच आ गयी कि कांग्रेस ने सरकार की एक न चलने दी और आर्थिक और औद्योगिक विकास का एक बड़ा मौक़ा बीजेपी सरकार के हाथ से खिसकता नजऱ आ रहा  है ।  संसद के शीतकालीन सत्र में अगर बिल नहीं पास हो सका है इसका मतलब यह हुआ कि 2015-16 में कर प्रणाली में सुधार नहीं किया जा सकता। यानी मोदी सरकार के तीन साल बिना जीएसटीबिल कानून के बीत जाएंगे। ज़ाहिर है तब  तक सरकार की उपलब्धियों का लेखा जोखा शुरू हो चुका होगा। देश अगले चुनाव के लिए तैयार हो रहा होगा। आर्थिक सुधार के लिए ज़रूरी क़ानून उपलब्ध न करा पाने के लिए सरकार में कई स्तरों पर चिंता की उपस्थिति साफ़ तौर पर बताई जाती है।
डा.ॅ मनमोहन सिंह की सरकार के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ चले कई आंदोलनों के बाद  केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में यह अवधारणा है कि वे निजी तौर पर कतई भ्रष्ट नहीं हैं ,  लेकिन उनके वित्तमंत्री को भ्रष्टाचार के झंझावात में दिल्ली की राजनीति ने लपेट लिया है।   वित्तमंत्री अरुण जेटली के कथित भ्रष्टाचार की कहानियां  देश में आम बातचीत का विषय बनती जा रही हैं । केंद्र सरकार के सबसे महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री के रूप में तो उनके ऊपर अभी तक आर्थिक बेईमानी के आरोप नहीं लगे हैं लेकिन दिल्ली में क्रिकेट की एक संस्था में उनके कार्यकाल में हुए काम के ज़रिये उनको भ्रष्टाचार के दायरे में ले  लिया गया है।  पिछले 15 वर्षों से अरुण जेटली देश के एक मज़बूत राजनेता के रूप में पहचाने जाते रहे  हैं ।  इस प्रक्रिया में देश की और बीजेपी की राजनीति में उनके बहुत ही ताक़तवर दुश्मन भी हैं।  कई दिनों से लगने लगा है कि वे सभी दुश्मन उनको कमज़ोर करने के  लिए कमर कस चुके हैं । दिल्ली की एक क्रिकेट संस्था में कुछ लोगों को आर्थिक लाभ पंहुचाने का आरोप अरुण जेटली के ऊपर लगता रहा है । बीजेपी के सांसद कीर्ति आज़ाद कई वर्षों से उनके ऊपर यह आरोप लगाते रहे हैं लेकिन आज़ाद की बात को किसी ने बहुत गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अब बात गंभीर हो गयी है । नरेंद्र मोदी और बीजेपी के विरोध की राजनीति के उभरते नए सितारे, अरविन्द केजरीवाल ने भी अरुण जेटली के भ्रष्टाचार को मुद्दा बना लिया है । अटल-अडवानी युग के बीजेपी के भारी नेता, राम जेठमलानी  करीब 15 साल से अरुण जेटली के खिलाफ तलवार भंज रहे हैं, उनको मौके की तलाश थी।  उन्होंने अरुण जेटली के उस मुक़दमे में अरविन्द केजरीवाल का वकील बनने का फैसला कर लिया जिसमें वित्त मंत्री ने दावा किया है कि उनकी मानहानि हुयी है और उनको उसकी भरपाई के लिए दस करोड़ रुपये चाहिए। ध्यान देने की बात यह है कि राम जेठमलानी ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की पैरवी उस दौर में करना शुरू कर दिया था जब लालकृष्ण आडवानी और बीजेपी में उनके सहयोगी  नरेंद्र  मोदी को आगे  करने के पक्ष में नहीं थे । अरुण जेटली के लिए सबसे अधिक  चिंता का विषय यह है कि अब कीर्ति आज़ाद बनाम अरुण जेटली विवाद में सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कीर्ति आज़ाद का साथ देने का संकेत दे दिया है।  वित्त मंत्री के रूप में उनकी असफलताओं को आरएसएस और बीजेपी के पुराने बड़े सहयोगी, अरुण शोरी भी मुद्दा बनाने की कोशिश कर चुके हैं।  बीजेपी के अध्यक्ष पद से जिस तरह से नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह को कभी हटाया गया था, वह भी दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में अरुण जेटली की ताक़त से मिलाकर देखा जाता है। यह दोनों भी अरुण जेटली से आम तौर पर नाराज़ बताये जाते हैं।  नाराज़ भाजपाइयों का नया ठिकाना आजकल वह घर बन गया है जहां कभी अटल बिहारी वाजपेयी रहा करते थे।  रायसीना रोड की सात नंबर की यह कोठी अब प्रो. मुरली मनोहर जोशी के पास है।  नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ यहीं बैठकर लालकृष्ण आडवानी और उनकी मंडली ने पहला गोला दागा था, बिहार चुनाव में पराजय हुयी थी।  कीर्ति आज़ाद के मुद्दे पर भी इन लोगों ने यहीं बैठकर कुछ चिंतन किया है ।  इससे साफ़ लग रहा  है कि नरेंद्र मोदी की सरकार को मोरारजी देसाई की सरकार बनाने की कोशिश अन्दर से शुरू हो गयी है,  लेकिन अभी निशाना सीधे प्रधानमंत्री पर नहीं है। अभी अरुण जेटली के कथित और शायद काल्पनिक भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सरकार को घेरे में  लेने की कोशिश दिल्ली के राजनीतिक अमीर उमरा कर रहे हैं,  लेकिन लगता है कि प्रधानमंत्री वह ग़लती नहीं करने वाले हैं  जो मोरारजी देसाई ने किया था। उन्होंने अरुण जेटली को साफ़ संकेत दे दिया है कि अपने को पाक साफ़ साबित करने के लिए जेटली साहब को  खुद ही कोशिश करनी पड़ेगी।  उन्होंने साफ़ बता दिया है कि जैन हवाला काण्ड में नाम आने के  बाद जब लालकृष्ण आडवानी के ऊपर उस दौर के ताक़तवर लोगों ने हमला बोला तो उन्होंने इस्तीफा देकर अपने आपको  राजनीतिक ईमानदारी के पक्षधर के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। बीजेपी सांसदों के साथ हुयी बैठक में प्रधानमंत्री, मोदी ने अरुण जेटली को आडवानी का अनुसरण करने का संकेत देकर मामले को ख़ासा पेचीदा बना दिया है।  जो भी हो आने वाले समय में  रायसीना की पहाडिय़ों की राजनीति बहुत ही दिलचस्प होने वाली है।  क्योंकि अगर राजनीति सही ढर्रे पर न चली तो कोई जीते या हारे, भारत का नुकसान तो होता ही है।  उम्मीद की जानी चाहिए कि भ्रष्टाचार के समूल नष्ट करने के  वायदे के साथ सत्ता में आये लोग देश को कुछ  राहत दे पाएंगे।  
sheshji@gmail.com


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