राजनीति और काले धन का खेल

शेष नारायण सिंह : उत्तराखंड विधानसभा में शक्ति परीक्षण और वहां की सरकार का रहना न रहना अब गौण हो गया है लेकिन वहां चल रहा काले धन का खेल राजनीति में काले धन की ताकत को एक बार फिर से रेखांकित कर देता है।...

शेष नारायण सिंह

उत्तराखंड विधानसभा में शक्ति परीक्षण और वहां की सरकार का रहना न रहना अब गौण हो गया है लेकिन वहां चल रहा काले धन का खेल राजनीति में काले धन की ताकत को एक बार फिर से रेखांकित कर देता है। विधायकों की मंडी लगी है, कोई खरीद रहा है और कोई बिकने को तैयार है। काले धन सुर राजनीति में उसके वर्चस्व ने जितना नुकसान देश और समाज का किया है, उतना किसी भी एक बुराई ने नहीं किया। उत्तराखंड के अलावा अन्य राज्यों में भी यही हाल है। समाज का हर व्यक्ति जो जल्दी जल्दी धनी बन जाना चाहता है उसको राजनीति सबसे आसान तरीका लगता है। इसलिए ग्रामीण इलाकों में गुंडई, बदमाशी करने वाले बेकार लोग पूरे देश में नेताओं के यहां चक्कर काटना शुरु कर देते हैं और अगर किसी विधानसभा आदि में चुन लिए गए तो तब तो अपने आप धन का प्रवाह उनकी तरफ मुड़ जाता है लेकिन अगर न भी चुने गए तो नेताओं के आस-पास रहकर विकास के लिए आबंटित रकम की जारी लूट में हिस्सा लेते हैं। पिछले दिनों एक और ट्रेंड न•ार आया है। संपन्न लोग भी सत्ता पर काबू करने और ज्यादा से ज्यादा धन इकट्ठा  कर लेने के चक्कर में राजनीति में संसद तक पंहुचने की $िफराक में रहते हैं। किंगफिशर वाले विजय माल्या इस वर्ग के खास उदाहरण हैं। कुछ लोगों के सपने पूरे नहीं हो पाते लेकिन कई बार उन सपनों की तलाश में वे सब कुछ गंवा  बैठते हैं। नोएडा  के एक बिल्डर की यही कहानी है। आईएएस की नौकरी छोडक़र बिल्डर बने, अरबों कमाया और लोकसभा का चुनाव लड़ गए। जिस पार्टी से लडऩे गए उसके बड़े नेता ने उनसे अच्छी खासी रकम ऐंठी। चुनाव हार कर बिल्डर महोदय घर आए। फिर राज्यसभा के चक्कर में भी खूब पैसा दिया। सफल नहीं हुए। आजकल दिल्ली के आसपास उनके दिवालिया होने की चर्चा है और जिन लोगों को घर का सपना दिखा कर उन्होंने अकूत धन इकठ्ठा किया था, वे उनके खिलाफ जुलूस निकाल रहे हैं।  
मुराद यह है सत्ता के खेल में हर जगह काले धन और उसके गलत इस्तेमाल को लेकर उठा-पटक मची है। यहां गौर करने की बात यह है कि इस खेल में हर पार्टी के बन्दे शामिल हैं और सत्ता हासिल करने के लिए कुछ भी करने पर आमादा हैं। सत्ता के प्रति इस दीवानगी की उम्मीद संविधान निर्माताओं को नहीं थी वरना शायद इसका भी कुछ इंतजाम कर दिया गया होता। आ•ाादी के बाद जब सरदार पटेल अपने गांव गए, तो कुछ महीनों तक वहीं रह कर आराम करना चाहते थे लेकिन नहीं रह सके क्योंकि जवाहर लाल नेहरू को मालूम था कि देश की एकता का काम सरदार के बिना पूरा नहीं हो सकता। इस तरह के बहुत सारे नेता थे जो सत्ता के निकट भी नहीं जाना चाहते थे। 1952 के चुनाव में ऐसे बहुत सारे मामले हैं जहां कांग्रेस ने लोगों को टिकट दे दिया और वे लोग भाग खड़े हुए, कहीं रिश्तेदारी में जाकर छुप गए और टिकट किसी और को देना पड़ा, लेकिन वह सब अब सपना है। अब वैसा नहीं होता। 60 के दशक तक चुनाव लडऩे के लिए टिकट मांगना अपमान समझा जाता था। पार्टी जिसको ठीक समझती थी, टिकट दे देती थी। 70 के दशक में उस वक्त की प्रतिष्ठित पत्रिका दिनमान ने जब टिकट याचकों को टिकटार्थी नाम दिया तो बहुत सारे लोग इस संबोधन से अपमानित महसूस करते थे। लेकिन 80 के दशक तक तो टिकिटार्थी सर्व स्वीकार्य विशेषण हो गया। लोग खुलेआम टिकट मांगने लगे, जुगाड़बाजी का तंत्र शुरु हो गया। इन हालात को जनतंत्र के लिए बहुत ही खराब माना जाता था लेकिन अब हालात बहुत बिगड़ गए हैं। जुगाड़ करके टिकट मांगने वालों की तुलना आज के टिकट याचकों से की जाए तो लगेगा कि वे लोग तो महात्मा थे क्योंकि आजकल टिकट की कीमत लाखों रुपये होती है। दिल्ली के कई पड़ोसी राज्यों में तो एक पार्टी ने नियम ही बना रखा है कि करीब 10 लाख जमा करने के बाद कोई भी व्यक्ति टिकट के लिए पार्टी के नेताओं के पास हाजिर हो सकता है। उसके बाद इंटरव्यू होता है जिसके बाद टिकट दिया जाता है यानी टिकट की नीलामी होती है। जाहिर है इन तरीकों से टिकट ले कर विधायक बने लोग लूटपाट करते हैं और अपना खर्च निकालते हैं। इसी खर्च निकालने के लिए सत्ता के इस संघर्ष में सभी पार्टियों के नेता तरह-तरह के रूप में शामिल होते हैं। सरकारी पैसे को लूट कर अपने तिजोरियां भरते हैं और जनता मुंह ताकती रहती है। अजीब बात यह है कि दिल्ली में बैठे बड़े नेताओं को इन लोगों की चोरी -बेईमानी की खबरों का पता नहीं लगता जबकि सारी दुनिया को मालूम रहता है।
इसी लूट की वजह से सत्ता का संघर्ष चलता रहता है। सत्ता के केंद्र में बैठा व्यक्ति हजारों करोड़ रुपये सरकारी खजाने से निकाल कर अपने कब्जे में करता रहता है। और जब बाकी मंत्रियों को वह ईमानदारी का पाठ पढ़ाने लगता है तो लोग नाराज हो जाते हैं और मुख्यमंत्री को हटाने की बात करने लगते हैं।
सवाल पैदा होता है कि यह नेता लोग जनता के पैसे को जब इतने खुलेआम लूट रहे होते हैं तो उनको रोके कौन? क्योंकि आजकल तो लूट का सिलसिला ऊपर से ही शुरु होता है क्योंकि अगर ऊपर बैठे लोग पाक साफ हों और वे अपनी अपनी पार्टी के उन चोरों को, जो विकास के लिए निर्धारित जनता के धन को लूट रहे हैं, समझा दें कि जनता का पैसा लूटने वालों को पार्टी से निकाल दिया जाएगा। लेकिन यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यह सारे नेताओं को सब कुछ पता रहता है और यह लोग भ्रष्ट लोगों को सजा देने की बात तो खैर सोचते ही नहीं, उनको बचाने की पूरी कोशिश करते हैं। हां, अगर बात खुल गयी और पब्लिक ओपीनियन के खराब होने का डर लगा तो उसे पद से हटा देते हैं। सजा देने की तो यह लोग सोचते ही नहीं, अपने लोगों को बचाने की ही कोशिश में जुट जाते हैं। यह अपने देश के लिए बहुत ही अशुभ संकेत हैं। जब राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भ्रष्टाचार को उत्साहित करने लगें तो देश के लिए बहुत ही बुरी बात है। लेकिन अगर भारत को एक रहना है तो इस प्रथा को खत्म करना होगा। हम जानते हैं कि यह बड़े नेता अपने लोगों को तभी हटाते हैं जबकि पब्लिक ओपीनियन इनके खिलाफ हो जाए। यानी अभी आशा की एक किरण बची हुई है और वह है बड़े नेताओं के बीच पब्लिक ओपीनियन का डर। इसलिए सभ्य समाज और देशप्रेमी लोगों की जमात का फर्ज है कि वह पब्लिक ओपीनियन को सच्चाई के साथ खड़े होने की तमीज सिखाएं और उसकी प्रेरणा दें। लेकिन पब्लिक ओपीनियन तो तब बनेंगे जब राजनीति और राजनेताओं के आचरण के बारे में देश की जनता को जानकारी मिले। जानकारी के चलते ही 1920 के बाद महात्मा गांधी ने ताकतवर ब्रितानी साम्राज्यवाद को चुनौती दी और अंग्रेजों का बोरिया बिस्तर बंध गया। एक कम्युनिकेटर के रूप में महात्मा गांधी की यह बहुत बड़ी सफलता थी। आज कोई गांधी नहीं है लेकिन देश के गली-कूचों तक इन सत्ताधारी बेईमानों के कारनामों को पहुंचाना जरूरी है। क्योंकि अगर हर आदमी चौकन्ना न हुआ तो देश और जनता का सारा पैसा यह नेता लूट ले जायेंगे।
इस माहौल में यह बहुत जरूरी है कि जनता तक सबकी खबर पहुंचाने का काम मीडिया के लोग करें। यह वास्तव में मीडिया के लिए एक अवसर है कि वह अपने कर्तव्य का पालन करके देश को इन भ्रष्ट और बेईमान नेताओं के चंगुल से बचाए रखने में मदद करें। लेकिन आजकल एक अजीब प्रवृत्ति देखने में आ रही है। राजनीति के भ्रष्टाचार के खेल में मीडिया के कुछ लोग भी शामिल हो रहे हैं लेकिन अभी उनकी संख्या बहुत कम है। अब कोई महात्मा गांधी तो पैदा होंगे नहीं, उनका जो सबसे बड़ा हथियार कम्युनिकेशन का था, उसी को इस्तेमाल करके देश में जवाबदेह लोकशाही की स्थापना की जा सकती है। गांधी युग में भी कहा गया था कि जब ‘तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’। अखबार निकाले गए और ब्रितानी साम्राज्य की तोपें हमेशा के लिए शांत कर दी गईं। इसलिए मीडिया पर लाजिम है कि वह जनजागरण का काम पूरी शिद्दत से शुरू कर दे और जनता अपनी सत्ता को लूट रहे इन भ्रष्ट नेताओं-अफसरों से अपना देश बचाने के लिए आगे आए।


 

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