यह प्रधानमंत्री मोदी की अग्नि परीक्षा का समय है

एल.एस. हरदेनिया : यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अग्नि परीक्षा का समय है। चुनाव प्रचार के दौरान और उसके पूर्व भी नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान और कश्मीर के मामलों पर अत्यधिक आक्रामक भाषा में अपने विचार प्रकट करते थे।...

एल.एस. हरदेनिया

यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अग्नि परीक्षा का समय है। चुनाव प्रचार के दौरान और उसके पूर्व भी नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान और कश्मीर के मामलों पर अत्यधिक आक्रामक भाषा में अपने विचार प्रकट करते थे। आम जनता को ऐसा लगता था कि जिस दिन नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे पाकिस्तान और कश्मीर से संबंधित सभी समस्याएं चुटकी बजाते ही हल हो जाएंगी।
नरेन्द्र मोदी गुजरात में चुनाव प्रचार करते हुए भी पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति का नाम बार-बार लेते थे। वे उन्हें मियां मुशर्रफ  कहकर याद करते थे। इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी राजनैतिक नेता को बहुत ही सोच-समझकर बात करना चाहिए। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि जब नेता प्रतिपक्ष में रहता है तो डींगे हाकता है कि मेरे हाथ में सत्ता आते ही मैं ये कर दूंगा, मैं वो कर दूंगा। इसी तरह के आश्वासन नरेन्द्र मोदी ने भी दिए थे-मैं लाखों युवकों को काम दूंगा, कीमतों को नियंत्रित कर दूंगा और देश की सीमाओं को पूरी तरह से सुरक्षित कर दूंगा।  
इस तरह बढ़-चढक़र बातें वोट कबाडऩे के लिए की जाती हैं। अब देखना यह है कि नरेन्द्र मोदी कश्मीर में हुई ताजी  घटनाओं से कैसे निपटते हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारा पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान न तो खुद चैन से रहता है और ना ही हमें चैन से रहने देता है। पाकिस्तान में भले ही लोकतांत्रिक सरकार हो परंतु इसके बावजूद वहां की असली सत्ता सेना के हाथों में है। कम से कम विदेशी मामलों का संचालन तो सैन्य अधिकारी ही करते हैं। यह बात मुझे पाकिस्तान के प्रवास के दौरान वहां के अनेक जिम्मेदार नागरिकों एवं पत्रकारों ने बताई थी। ये सभी लोग यह चाहते हैं कि भारत और पाक के संबंध शांतिपूर्ण हों और हम एक अच्छे पड़ोसी की तरह मिल-जुलकर रहें।
परंतु यकायक परिस्थितियां गंभीर हो गई हैं और उनसे निपटने के लिए बहुत ही गंभीर रणनीति की आवश्यकता है। पाकिस्तान और हमारे बीच में कई बार युद्ध जैसी स्थितियां निर्मित हो गई थीं। सबसे पहले वर्ष 1947 में पाकिस्तान ने कबालियों के रूप में कश्मीर पर हमला बोला था, जिसे विफल कर दिया गया था। उसके बाद वर्ष 1965 में एक बड़ा युद्ध हुआ। उस समय लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे। उन्होंने बिना युद्धोन्माद पैदा किए युद्ध जैसी परिस्थितियों का सामना किया था। युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति वार्ताएं हुईं थीं। शांति वार्ता तत्कालीन सोवियत संघ के नगर ताशकंद में हुई थी। वार्ताओं के दौरान ही श्री शास्त्री जी की दु:खद मृत्यु हो गई थी। वार्ताओं में रूस के तत्कालीन नेताओं ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी। उसके ठीक छ: वर्ष बाद पुन: युद्ध जैसी स्थितियां पैदा हो गई थीं। उन स्थितियों का मुकाबला  इंदिरा गांधी ने अपनी अद्भुत कूटनीतिक क्षमता और सैनिक ताकत से किया था। उस समय सारी दुनिया में पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया था, क्योंकि पाकिस्तान के शासकों ने पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर अंतहीन ज्यादतियां शुरू कर दी थीं। पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों ने बहुमत से अवामी लीग के नेता मुजिबुर्रहमान को सत्ता सौंप दी थी और पाकिस्तान की असेम्बली में उन्हें बहुमत प्राप्त हो गया था। इसके बावजूद पाकिस्तान के शासकों ने उन्हें सत्ता नहीं सौंपी। इसके साथ ही पूर्वी पाकिस्तान के नागरिक उर्दू को उनकी भाषा के रूप में स्वीकारने के लिए तैयार नहीं थे। इस तरह पाकिस्तान में विद्रोह की स्थितियां निर्मित हो गई थीं।
इन बातों के मद्देनजर हमने मानवीय आधार पर पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों की सहायता की थी और उन्हें पाकिस्तान के सैनिक शासकों की ज्यादतियों से बचाने की कोशिश की थी। इस तरह वर्ष 1971 की स्थितियां पूर्णत: अलग थीं। उस समय विश्व में दो शक्तिशाली गुट थे-एक गुट का नेता अमरीका था और दूसरे गुट का नेता सोवियत संघ। अमरीका ने उस समय पाकिस्तान का साथ दिया था और सोवियत संघ ने हमारा। जब अमरीका ने घोषणा की थी कि उनका सातवां जहाजी बेड़ा पूर्वी पाकिस्तान के लिए रवाना हो गया है तो सोवियत संघ की तरफ  से घोषणा की गई थी कि इसी तरह का बेड़ा हम भी शीघ्र ही रवाना करेंगे। उसके पूर्व भी वर्ष 1947 से लेकर आज तक अमरीका ने पाकिस्तान का ही साथ दिया। जब भी कश्मीर का मुद्दा सुरक्षा परिषद में उठाया जाता था अमरीका अपने वीटो का उपयोग कर पाकिस्तान को समर्थन देता था।  आज अमरीका क्या करेगा यह कहना मुश्किल है। सच पूछा जाए तो इस समय अमरीका के रवैये की भी अग्नि परीक्षा है। अभी भी ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं जिनके चलते अमरीका पूरी तरह से पाकिस्तान का साथ छोड़ दे। परंतु देखना यह है कि क्या वह हमारी इस संकट की घड़ी में हमारा साथ देगा? परंतु इस प्रश्न पर भी विचार करना आवश्यक है कि पाकिस्तान के वर्तमान रवैये से कैसे निपटा जाए। शायद युद्ध इसका एकमात्र हल नहीं है। यहां यह स्मरण रखना आवश्यक है कि पाकिस्तान के पास अणु बम है। यह कहना बहुत मुश्किल है कि पाकिस्तान में अणु बम पर किसका नियंत्रण है-चुने हुए प्रधानमंत्री का या वहां की फौज का? वैसे तो हमारे पास भी अणु बम है परंतु हमारे यहां अणु बम पर चुने शासकों का अधिकार है। हमारे देश की सैन्य शक्ति का सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति होता है। वह आर्मी, नेवी और एयरफोर्स का मिलाजुला कमांडर-इन-चीफ  है। इसलिए हमारे यहां अणु बम का उपयोग करने का अधिकार सिर्फ  देश की चुनी हुई सरकार को है। यदि हमारी तरफ  से आक्रमण की पहल होती है तो इस बात की क्या गारंटी है कि पाकिस्तान की सैन्य शक्ति अणु बम का दुरूपयोग न करे। इसलिए हमको सैन्य शक्ति से ज्यादा कूटनीतिक रास्ता अपनाना चाहिए।
बांग्लादेश की समस्या के दौरान प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने स्वयं दुनिया के अनेक देशों का भ्रमण किया था और वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों को वास्तविक स्थिति से परिचित कराया था। इसी तरह की पहल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को करनी चाहिए। एक बात की और आवश्यकता है कि हमारे देश के राजनीतिक दल और अन्य संगठन टीवी चैनल, समाचारपत्र युद्ध का उन्माद न फैलाएं और केंद्रीय शासकों के ऊपर अनावश्यक दबाव न बनाएं। आम लोगों को चाहिए कि वे बिना किसी दबाव के प्रधानमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद को सभी परिस्थितियों के मद्देनजर रणनीति बनाने का अवसर दें। इसके साथ ही इस बात की भी आवश्यकता है कि कश्मीर के भीतर शीघ्र शांति स्थापित की जाए और वहां के निवासियों का दिल जीतने का प्रयास किया जाए।
हमारा पिछला अनुभव बताता है कि जब भी देश पर कोई मुसीबत आई है तो जनता ने अद्भुत एकजुटता दिखाई है। इस तरह की एकजुटता का अपना ही महत्व है। जहां हम अपने देश के भीतर युद्धोन्माद पैदा करने से बचें वहीं हम पाकिस्तान की जनता से भी अपील करें कि वह भी अपने शासकों के ऊपर शांति और वार्ता का रास्ता अपनाने का दबाव बनाए। पिछले वर्षों में हमने रक्षा पर, हमारे बजट का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च किया था। यदि यह हिस्सा इतने वर्षों तक बचा रहता तो दोनों देशों की बुनियादी समस्याओं को हल करने में निर्णायक सफलता हासिल होती। हम विश्व के देशों से भी अपील करते हैं कि वे तब तक पाकिस्तान का बहिष्कार करें जब तक वह अपनी हिंसक गतिविधियों से बाज  नहीं आता। विश्वव्यापी बहिष्कार के चलते विश्व की अनेक समस्याओं का हल निकला है। जैसे वर्षों तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का बहिष्कार किया गया और इस बहिष्कार के कारण भी वहां की आततायी गोरी सरकार ने वहां के मूल निवासियों के हाथ में सत्ता सौंप दी थी। इसलिए जवाबी हिंसा से ज्यादा कूटनीतिक रणनीति और विश्व जनमत को अपनी तरफ आकर्षित करना ही ज्यादा शक्तिशाली सिद्ध होगा।


 

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