मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियां

सीताराम येचुरी नई दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली एक किसान की दु:खद मौत से, हमारे देश के कृषि क्षेत्र को जकड़े बैठे गहरे कृषि संकट का असली चेहरा खुलकर सामने आ गया है। बेशक, हम पहले भी समय-समय पर भारतीय कृषि के इस गहराते संकट को रेखांकित करते आए हैं और इसकी ओर ध्यान खींचते आए हैं कि आम तौर पर भारत के लिए और खासतौर पर ग्रामीण भारत के लिए इस संकट का क्या अर्थ है। फिर भी उक्त रैली में किसान की आत्महत्या ने इस संकट को बहुत ही गाढ़े रंग से रेखांकित कर दिया है।...

सीताराम येचुरी

नई दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली एक किसान की दु:खद मौत से, हमारे देश के कृषि क्षेत्र को जकड़े बैठे गहरे कृषि संकट का असली चेहरा खुलकर सामने आ गया है। बेशक, हम पहले भी समय-समय पर भारतीय कृषि के इस गहराते संकट को रेखांकित करते आए हैं और इसकी ओर ध्यान खींचते आए हैं कि आम तौर पर भारत के लिए और खासतौर पर ग्रामीण भारत के लिए इस संकट का क्या अर्थ है। फिर भी उक्त रैली में किसान की आत्महत्या ने इस संकट को बहुत ही गाढ़े रंग से रेखांकित कर दिया है। वैसे खुद सरकारी रिकार्डों के अनुसार, पिछले दो दशकों के दौरान देश भर में करीब तीन लाख किसान इसी संकट के चलते हताश होकर आत्महत्या कर चुके हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि वास्तविक आंकड़ा, इस सरकारी आंकड़े से कहीं बहुत ज्यादा बैठेगा।
भारतीय कृषि की दशा के संबंध में इस तरह की खतरे की घंटियां, जिनकी आवाज पिछले कुछ वर्षों में तेज से तेज ही होती गयी है, अब तक आई सरकारों द्वारा अनसुनी ही की जाती रही हैं। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू कराने पर वामपंथी पाॢटयों के आग्रह का ही नतीजा था कि यूपीए-प्रथम के शासन के आखिरी वर्ष में आखिरकार यह व्यवस्था चालू हो गई। बेशक, इससे एक हद तक राहत मिल रही है। लेकिन, इससे भारतीय कृषि के  संकट की बुनियादी सच्चाइयां तो बदल नहीं सकती हैं।
हाल के दौर में, मोदी सरकार आने के बाद पहले सूखे के जैसे हालात बने थे जिसके चलते स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार, खेती के कुल रकबे में ही शुद्घ गिरावट दर्ज की गई। लेकिन, सरकार ने खरीफसे सीजन से मिली इस चेतावनी को अनदेखा ही करने की कोशिश की और यह कहकर मुद्दे को टालने की कोशिश की कि यह तो मानसून के कमजोर होने से पैदा हुई इसी बार की समस्या है। लेकिन, वास्तव में यह समस्या एक कहीं गहरे संकट की ओर इशारा कर रही थी। यह संकट किसानों के खेती के काम से विमुख होने का है और किसानों की बढ़ती संख्या खेती से इसलिए हाथ खींच रही है कि खेती अब उन्हें न्यूनतम भरण-पोषण भी मुहैया नहीं करा पा रही है।
सूखे की मार से किसानों को जो थोड़ी बहुत राहत मिल सकती थी, उसमें भी मोदी सरकार ने देरी लगा दी। और अंतत: जब तक यह राहत किसानों को मिलनी शुरू हो पाती, बेमौसमी बारिश और ओलों की आफत टूट पड़ी। इस आपदा ने सबसे बढ़कर उत्तरी भारत में 18 करोड़ हैक्टेयर से ज्यादा की खड़ी फसल को बर्बाद कर दिया। इस आपदा से हुई किसानों की बर्बादी ने कर्ज के उस फंदे को और भी कस दिया है, जिसकी घुटन किसानों की लगातार बढ़ती संख्या को हताशा में आत्महत्या करने के रास्ते पर धकेलती आ रही है।
मोदी सरकार मुसीबत के मारे किसानों को कोई राहत पैकेज देने का फैसला तक नहीं कर पाई है। किसानों को जिंदा रखने के लिए जरूरी न्यूनतम सहायता तक किसी उल्लेखनीय पैमाने पर नहीं दी गई है। और अंतत: जब तक इस सब के सिलसिले में इस तरह की कोई सहायता मुसीबत के मारे किसानों तक पहुंचेगी, तब तक जैसी कि मौसम विभाग ने पहले ही भविष्यवाणी कर दी है, हमारे देश के किसानों के विशाल हिस्से के सिर पर कमजोर मानसून की मुसीबत आ पड़ी होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे कृषि संकट बहुत बढ़ जाने वाला है।
आ•ाादी के छ: दशक बाद भी हमारे देश में 65 फीसद खेती, बारिश के ही भरोसे है। पिछले कुछ दशकों में और खासतौर पर देश में विकास का नवउदारवादी रास्ता अपनाए जाने के बाद से, कृषि क्षेत्र की ओर से ध्यान लगातार हटता गया है और इसमें निवेश के लिए सार्वजनिक खर्च कम से कम ही किया जाता रहा है। कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश, जो एक जमाने में देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद के एक-तिहाई से आधे के बीच हुआ करता था, पिछले साल तक घटते-घटते सकल घरेलू उत्पाद के 14.7 फीसद के बराबर ही रह गया था। इसे वास्तव में आपराधिक विडंबना ही कहा जाएगा कि हमारे देश में एक ओर तो खेती के सीजन में सिंचाई के लिए पानी की कमी होती है और दूसरी ओर हर साल आने वाली बाढ़ में लाखों लोग अपनी आजीविका गंवा बैठते हैं। लघु सिंचाई की तमाम परियोजनाएं तैयार किए जाने के बावजूद, अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका है, जिसे उल्लेखनीय कहा जा सके।
इस स्थिति के और भी बदतरीन होने का खतरा है। यूपीए-2 सरकार के अंतिम तीन वर्षों के दौरान तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री ने संसद में यह स्वीकार किया था कि हालांकि यूपीए सरकार हमारे किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में निरंतर बढ़ोतरी करती रही है, लेकिन राष्टï्रीय कृषि लागत तथा मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा की जानेवाली गणना के अनुसार उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी की दर से यह बढ़ोतरी कम ही रहती है। साफ है कि किसान जनता को अपनी दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो रहा था। इसके अलावा अपने कृषि कार्यों को संचालित करते रहने के लिए जो कर्ज वे लेते हंै, वह कभी अदा नहीं हो पाता क्योंकि कृषि से उनकी आय इतनी कम होती है कि उनके अपने जिंदा रहने के लिए भी कम पड़ती है। इसलिए इसमें अचरज की कोई बात नहीं कि बदहाली में की जानेवाली आत्महत्याओं की दर तेज हो गई।
इसी पृष्ठïभूमि में भाजपा, संसद में यह मांग करते हुए अक्सर ही वामपंथी पार्टियों का समर्थन करते हुए दिखाई देती रही थी कि किसानों की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में अच्छी-खासी बढ़ोतरी की जाए। उस समय भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में यूपीए सरकार पर वामपंथी पार्टियों के इस हमले में अपना सुर मिलाती दिखाई देती थी कि वह स्वामीनाथन कमेटी की उन सिफारिशों को लागू नहीं कर रही है जिनमें उत्पादन लागत की आधिकारिक रूप से की गई गणना से कम से कम 50 फीसद ज्यादा देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की बात कही गई है। वास्तव में तो भाजपा के 2014 के चुनाव घोषणापत्र में ही यह कहा गया था कि ''कृषि भारत की अर्थव्यवस्था के विकास का इंजन है और सबसे बड़ा रोजगारदाता है और भाजपा कृषि विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देने, किसानों की आय में इजाफा करने और ग्रामीण विकास के लिए प्रतिबद्घ है।ÓÓ इसमें आगे ''उत्पादन लागत के ऊपर न्यूनतम 50 फीसद मुनाफा सुनिश्चित करने के जरिए कृषि में लाभकरता को बढ़ाने के कदम उठाने, सस्ती कृषि लागतें तथा ऋण मुहैया कराने, कृषि के लिए नवीनतम तकनीक तथा ऊंची पैदावार देनेवाले बीज मुहैया कराने और कृषि को मनरेगा से जोडऩेÓÓ का वादा किया गया था।
लेकिन यह वादे वोट हासिल करने के लिए लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए ही किए गए थे, यह तब स्पष्टï हो गया जब वर्ष 2014-15 और 2015-16 दोनों ही वर्षों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की गई बढ़ोतरी पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा की गई बढ़ोतरी से भी कम रही। इतना ही नहीं, मोदी सरकार तो और आगे निकल गई। राज्य सरकारों को भेजे गए अपने आरंभिक निर्देशों में से एक में उनसे यह कहा गया था कि वे गेहूं तथा धान के लिए केंद्र द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा समर्थन मूल्य की पेशकश करने की प्रथा को बंद करें क्योंकि इससे ''बाजारÓÓ बिगड़ता है। वर्ष 2015 के कृषि बजट आबंटन में पिछले वर्ष के मुकाबले 10.4 फीसद की कमी कर दी गई। पशुपालन, बड़ी तथा मध्यम आकार की सिंचाई परियोजनाओं की मद में भी यही प्रवृत्ति देखने में आई। उर्वरक, डीजल जैसे कृषि कार्यों की विभिन्न मदों के तहत किसानों को मिलने वाली सब्सिडियों में भी अच्छी-खासी कमी कर दी गई। केंद्रीय रूप से प्रायोजित राष्टï्रीय कृषि विकास योजना के लिए भी केंद्र सरकार ने 5500 करोड़ रुपए कम आबंटित किए। कृषि के प्रति मोदी सरकार का रुख इस संकट को और गहरा करने वाला और कृषिगत बदहाली को और सघन बनाने वाला ही रहा है।
जहां तक मनरेगा का सवाल है, हाल के एक सर्वे ने दिखाया है कि 2014-15 में इसके तहत सृजित काम पिछले दो वर्षों के मुकाबले कम रहा है। चालू वित्तीय वर्ष के पहले तीन महीनों में तो यह स्थिति और बदतरीन हो गई। उदाहरण के लिए जनवरी-मार्च 2015 में 34 करोड़ 70 लाख कार्यदिवस का काम मुहैया कराया गया जो वर्ष 2014 में इसी अवधि के दौरान मुहैया कराए गए काम से आधा है और 2013 में इसी अवधि के दौरान मुहैया कराए गए काम से 60 फीसद से भी ज्यादा कम है। मोदी सरकार के 2015-16 के लिए पेश पहले पूर्ण बजट में इस योजना के लिए बजटीय आबंटन में भारी कटौती कर दी गई।
और यह सब ऐसे वक्त हो रहा है जब भारत के लिए विश्व बैंक के निदेशक ने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि मनरेगा ''भारत के पास अकेली बीमा (योजना) है।ÓÓ वेतन और जितने दिनों के लिए काम की पेशकश की जा रही है, उन पर तमाम विवादों के बावजूद जमीन पर वास्तविक स्थिति यह है कि मोदी सरकार वास्तव में ग्रामीण रोजगार की इस गारंटी को खत्म कर रही है।
इन सबके ऊपर से अब बौखलाहट भरी हड़बड़ी सामने आई है जिसके साथ मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण संबंधी भाजपा का नया कानून बनवाने के लिए भारतीय संसद को ही धौंस में लेने पर आमादा है। यह मुद्दा न सिर्फ किसानविरोधी है बल्कि भारतविरोधी भी है। यह नया विधेयक, चाहे इसे किसी भी कोण से देखिए, केवल भारतीय कृषि को तबाह ही करेगा और भारतीय किसान की पीड़ा और व्यथा को और बढ़ा देगा। संसद में तकरीबन सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियां इस नए भूमि अधिग्रहण विधेयक को करीब-करीब ठुकरा ही चुकी हंै। फिर भी यह मोदी सरकार इस विधेयक को पारित कराने को बेहद उत्सुक है। अगर यह विधेयक पारित हो गया तो इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि हमारी जनता का एक व्यापक तबका खेती का काम छोड़ देगा और हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच की खाई और ज्यादा बढ़ जाएगी।
जब तक इस तरह की नीतियों को पलटा नहीं जाता तब तक न तो हम अपने किसानों-अपने अन्नदाताओं-की रोजी-रोटी की रक्षा कर सकते हैं और न ही अपने देश के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं। इस तरह के प्रतिगामी नए कानूनों को रोकने के लिए हमारे देश की जनता को और ज्यादा उत्साह तथा जोश के साथ उठ खड़ा होना होगा, जिन्हें यह मोदी सरकार पास कराने पर तुली हुई है और जो अगर पास हो गए तो भारतीय कृषि को और तबाह कर देंगे।

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख

क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?