मोदी सरकार का नया त्रिशूल

सीताराम येचुरी : नरेंद्र मोदी की सरकार तमाम संसदीय प्रक्रियाओं तथा नियमों को ताक पर रखकर, संसद में अपनी मनमानी चलाने की कोशिश कर रही है। यह एक खतरनाक लक्षण है और वास्तव में यह मोदी के राज में सामने आ रहे जनविरोधी एजेंडा में एक तीसरा पहलू जोड़ता है।अब तक इतना तो साफ हो चुका है कि मोदी सरकार, डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार से भी ज्यादा आक्रामक तरीके से नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को लगातार आगे बढ़ाने में लगी हुई है। ...

सीताराम येचुरी

नरेंद्र मोदी की सरकार तमाम संसदीय प्रक्रियाओं तथा नियमों को ताक  पर रखकर, संसद में अपनी मनमानी चलाने की कोशिश कर रही है। यह एक खतरनाक लक्षण है और वास्तव में यह मोदी के राज में सामने आ रहे जनविरोधी एजेंडा में एक तीसरा पहलू जोड़ता है।
अब तक इतना तो साफ हो चुका है कि मोदी सरकार, डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार से भी ज्यादा आक्रामक तरीके से नवउदारवादी आर्थिक सुधारों को लगातार आगे बढ़ाने में लगी हुई है। यह इस देश में बसे दो देशों के बीच की खाई को तेजी से बढ़ा रहा है और हमारी जनता के विशाल बहुमत पर अभूतपूर्व बोझ लाद रहा है। इसके साथ ही साथ, नरेंद्र मोदी की सरकार के संरक्षण में आरएसएस से जुड़े सांप्रदायिक संगठनों ने हिंदुत्ववादी एजेंडा को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने की अपनी मुहिम तेज कर दी है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जहरीला अभियान छेड़ दिया है। इसका नतीजा यह हुआ है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच असुरक्षा तथा अनिश्चितता का एहसास और बढ़ गया है। इसके साथ ही हमने पहले ही यह आशंका जताई थी कि तानाशाही शैली का शासन थोपने की ओर स्पष्टï रूप बढऩा, इस सरकार के एजेंडा का ही एक और पहलू लगता है। दुर्भाग्य से हमारी यह आशंका सही साबित होती न•ार आती है। मोदी सरकार का पहला साल पूरा होने से पहले-पहले ही, यह नया त्रिशूल गढ़ा जा चुका है।
तानाशाही शैली के शासन की इन आशंकाओं की पुष्टिï करने वाला ताजातरीन साक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी की एक टिप्पणी के रूप में सामने आया है। प्रधानमंत्री ने यह टिप्पणी न्यायपालिका के साथ एक संयुक्त सम्मेलन में की है, जिसमें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश भी शामिल थे। इस सम्मेलन के ईस्टर के रविवार पर (5 अप्रैल को) ही आयोजित किए जाने का भी अपना ही किस्सा है, लेकिन वह फिर कभी सही। इस सम्मेेलन में 24 हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के सेवारत न्यायाधीश शामिल थे। उन्हें संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने चेताया: ''जन-धारणा से संचालित (न्यायिक) निर्णयों के प्रति सावधान रहने की जरूरत है, जो अक्सर पांच सितारा एक्जिविज्म से संचालित होते हैं।ÓÓ
नरेंद्र मोदी ने ''पांच सितारा एक्टिविस्टÓÓ की संज्ञा का कोई पहली बार प्रयोग नहीं किया है। प्रधानमंत्री बनने से पहले भी वह 2002 के गुजरात के दंगों के सिलसिले में जनहित याचिकाओं के आधार पर शुरू हुई कानूनी कार्रवाइयों पर अपनी खीज निकालने के लिए, इस संज्ञा का प्रयोग करते रहे थे।
अचरज की बात नहीं है कि विशेष रूप से जनहित याचिकाओं के सिलसिले में इस तरह की तिरस्कारपूर्ण टिप्पणियों की अनेक कानूनविदों ने उचित ही तीखी आलोचना की है। उनमें से एक ने ध्यान दिलाया है कि, ''जनहित याचिकाएं, सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिस इसका इशारा करता हो कि सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी ऐसी कोई जनहित याचिका विचार के लिए स्वीकार की है, जो ईमानदार न हो या जिसमें न्याय का पक्ष न लिया गया हो। जनहित याचिका के जो प्रकरण सुप्रीम कोर्ट सुनती है, गुमराह होकर नहीं सुनती है। अंतत: यह अदालत की ही आलोचना हो जाती है, जिसके लिए मिथकीय पांच सितारा कार्यकर्ताओं की ओट ली गई है।ÓÓ पुन: यह भी कि, ''जनहित याचिका क्षेत्राधिकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1980 के दशक में शुरू किया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दूसरे लोग बढ़कर आगे आएंगे और हाशिए पर पड़े तबकों के अधिकारों के लिए लड़ेंगे। इन अन्य लोगों को ''पांच सितारा कार्यकर्र्ताÓÓ कहकर बदनाम करना, संविधान के शब्दों और भावना के खिलाफ है।ÓÓ एक और न्यायविद् ने रेखांकित किया है कि, ''उच्चतर न्यायपालिका के सामने कहना—वहां सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश तथा हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीश बैठे हुए थे—यह कहना कि वे लोक-धारणा के आधार पर फैसले देते हैं न कि संवैधानिक तर्कों के आधार पर, बहुत ही अपमानजक है।ÓÓ
फ्रांसीसी दार्शनिक मोंटेस्क्यू ने कुछ मानक तय किए थे, जो आज भी हरेक जनतंत्र के लिए बुनियादी आधार की तरह काम करते हैं। उन्होंने राजनीतिक दुनिया का ध्यान विधायी, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका की शक्तियां, किसी एक ही सत्ता में केंद्रित होने में छुपे खतरों की ओर ध्यान खींचा था और संवैधानिक शासन में तीनों बाजुओं बीच परस्पर अंकुश लगाने तथा संतुलन रखे जाने की जरूरत पर जोर दिया था।
अनेक आधुनिक संविधानों में, जिनमें हमारा संविधान भी शामिल है, यह अवधारणा समाहित है। जैसाकि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व-प्रधान न्यायाधीश, बालकृष्णन ने (2007 में) रेखांकित किया था: ''संविधान ढांचा बनाता है तथा सीमाएं तय करता है। वह न्यायपालिका समेत राज्य के हरेक अवयव की भूमिका तथा कामों को अलगाता है और उनके अंतर्संबंधों के नियम, अंकुश तथा संतुलन स्थापित करता है।ÓÓ
शक्तियों के इस तरह के पृथक्करण का निर्देश देते हुए तथा ऐसी समरसता से चलने की व्यवस्था करते हुए, जिसमें राज्य के तीनों बाजू एक संयुक्त तथा सहभागितापूर्ण भूमिका अदा कर सकेें, हमारा संविधान जनगण की इच्छा की केंद्रीयता को स्थापित करता है। संविधान की प्रस्तावना में इसे बहुत ही मुखर रूप से परिभाषित किया गया है, जो शुरू होती है, ''हम भारत के लोगÓÓ से और समाप्त होती है इस पर कि, ''एतद द्वारा यह संविधान अपनाते, बनाते तथा खुद को देते हैंÓÓ। इसका शाश्वत संदेश एक ही है—जनगण की संप्रभुता और हमारी संवैधानिक व्यवस्था में उसकी सर्वोच्चता।ÓÓ हमारे संविधान में एक बात स्पष्टï है—इसमें ''न्यायिक समीक्षाÓÓ की अवधारणा की ही जगह है, न कि ''न्यायिक एक्टिविज्मÓÓ की।
किसी एक अवयव द्वारा अपनी तय सीमा को पार करने से न सिर्फ टकराव पैदा होना तय है बल्कि भारी कुशासन की स्थिति बनना भी तय है। कार्यपालिका की खामियां, विधायिका के काम के बार-बार बाधित होने से और बढ़ गईं क्योंकि विधायिका के काम के बार-बार बाधित होने से वह कार्यपालिका पर जिस तरह से न•ार रख सकती थी, नहीं रख पाई और इसी चीज ने न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने का आधार प्रदान किया। जैसा कि न्यायमूर्ति वर्मा ने (2007 में) नोट किया था, ''राजनीतिक हिसाब चुकता करने के लिए कुछ निहित स्वार्थों द्वारा न्यायिक प्रक्रिया का सोचे-समझे ढंग से दुरूपयोग या कुछ ऐसे नाजुक राजनीतिक मुद्दों पर, राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा जिन पर निर्णय लेना असहज होता, फैसला लेने की जिम्मेदारी न्यायपालिका पर डालने सेÓÓ न्यायपालिका को ऐसे मसलों पर भी फैसले देने पड़े जिन्हें पूरी तरह से कार्यपालिका द्वारा निपटाए जाने की जरूरत थी।
इस तरह के असंतुलनों को ठीक करने के लिए सी पी आइ (एम) ने एक राष्टï्रीय न्यायिक आयोग स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। इस सुझाव को स्वीकार करने की बजाय इस भाजपा सरकार ने न्यायिक नियुक्ति विधेयक पारित करा दिया। यह उसके शुरूआती कामों में शामिल था। ऐसा शायद न्यायिक नियुक्तियों का ख्याल रखने (प्रभावित करने?) के लिए किया गया, न कि असंतुलनों को ठीक करने के लिए। यह एक बार फिर हमारे संसदीय जनतंत्र की बांह मरोडऩे और इसे तानाशाही व्यवस्था की ओर ले जाने की कोशिश का ही इजहार था।
न्यायपालिका के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियां करने से पहले, हमारी संसदीय प्रक्रियाओं को झटका देने का एक और उदाहरण वह तरीका था, जिस तरीके से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को फिर से जारी किया गया। 5 अप्रैल को पूर्ववर्ती अध्यादेश के निरस्त होने के एक दिन पहले भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को फिर से जारी करने का रास्ता साफ करने के लिए अभूतपूर्व ढ़ंग से राज्यसभा का ''सत्रावसानÓÓ कर दिया गया। अध्यादेशों को जारी करने का रास्ता साफ करने के लिए संसद के अधिवेशन के दौरान एक सदन का सत्रावसान करना, हमारे संसदीय इतिहास के बहुत ही दुर्लभ मामलों में से एक है। यह ऐसी स्थितियों में तो जरूरी हो सकता है जब ऐसे राज्यों, जहां राष्टï्रपति शासन लगा हो, के बजटों को मंजूरी देनी हो। लेकिन किसी अध्यादेश को जारी करने के लिए किसी सदन का सत्रावसान करना हाल के इतिहास में कभी नहीं हुआ। इस तरह के तौर-तरीकों से एक ऐसी विचित्र स्थिति पैदा हो गयी है जहां राज्यसभा के 234 वें सत्र में पेश किया वित्त विधेयक, उसके 235वें सत्र में लोकसभा को वापस भेजा जाएगा। राष्टï्रपति ने राज्यसभा का 235वां सत्र 23 अप्रैल को बुुलाया है, जो 13 मई तक चलेगा (अब राज्यसभा का कामकाज मूल कार्यक्रम के अनुसार 20 अप्रैल को फिर से शुरू नहीं होगा)। अध्यादेश जारी करने का अधिकार एक ब्रिटिश परंपरा है, जब नियंत्रण सम्राट के पास होता था और इस तरह के अधिकार के जरिए वह औपनिवेशिक शासन के तहत गठित बेहद सीमित से विधायिका निकायों तक की राय को बरतरफ कर सकता था। संविधान सभा में हृदयनाथ कुंजरू ने स्वतंत्र भारत के संविधान में इस प्रावधान को जारी रखने पर ऐतराज किया था। उनका कहना था कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के तहत अध्यादेश जारी करने की गवर्नर जनरल की शक्ति हमेशा ''अलोकप्रियÓÓ रही है। क्या राज्यसभा में बहुमत के विरोध के मद्देनजर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को फिर से जारी करना इस तरह की ''आपात स्थितिÓÓ के तहत आता है, जैसा कि डॉ. अंबेडकर ने कहा है? जब संसद का अधिवेशन चल रहा हो, तब इस अध्यादेश को जारी करने की राह आसान बनाने के लिए संसद के एक सदन का सत्रावसान करने के जरिए एक ऐसी स्थिति पैदा करके क्या मोदी सरकार खतरनाक ढंग से हमारे संविधान और संसदीय प्रक्रियाओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर रही है और तानाशाही शासन की ओर नहीं बढ़ रही है?
आखिर इस अध्यादेश को फिर से जारी करने के लिए ऐसा उतावलापन क्यों दिखाया गया? प्रधानमंत्री और भाजपा की राष्टï्रीय कार्यकारिणी द्वारा विपक्ष पर ''झूठÓÓ फैलाने का आरोप लगानेवाला असत्यों से भरा ऐसा अभियान आखिर क्यों चलाया जा रहा है? इस तथ्य को बयान करना क्या झूठ है कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को पारित करने के लिए भाजपा ने अपना पूरा समर्थन दिया था? फिर अब यह बदलाव क्यों? क्या यह बदलाव यह नहीं दिखाते कि प्रधानमंत्री मोदी पहले से ही बेहाल भारतीय किसान की कीमत पर विदेशी तथा घरेलू कार्पोरेट घरानों दोनों को ही लाभ पंहुचाने के लिए यह बदलाव ला रहे हैं। इसलिए क्या यह वास्तव में उन लोगों को लाभ पंहुचाकर, जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव अभियान में उदारपूर्वक धन दिया था, उनका ''अहसान चुकानेÓÓ की ही कोशिश नहीं है?
इस नरेंद्र मोदी सरकार के तहत इसी तरह के तिहरे खतरे सामने आ रहे हैं। भारतीय राष्टï्र तथा भारतीय जनता के लिए ये खतरे साफ दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं खतरों को एक ऐसे त्रिशूल में तब्दील करने की कोशिश की जा रही है जो हमारी जनता के व्यापक बहुमत की रोजी-रोटी पर और आधुनिक भारत के धर्मनिरपेक्ष-जनतांत्रिक चरित्र पर हमले का हथियार बनेगा। यह एक चुनौती है जिसका मुकाबला हमारी जनता की ऐसी एकजुट इच्छा शक्ति से करना होगा जो शक्तिशाली जनसंघर्षों में प्रतिबिंबित हो।                                                                       

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