मोदी शासन और भारतीय अर्थव्यवस्था

डॉ.गिरीश मिश्र : पिछले महीने लंदन से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका 'द इकॉनामिस्टÓ में भारत के ऊपर एक रिपोर्ट छपी है जिसका शीर्षक है: 'टू चेंज इंडिया : लाइट्स, कैमरा, इन-एक्शन।Ó यह इस बात को इंगित करती है कि मोदी सरकार लंबी-चौड़ी बातें करती हैं मगर कार्रवाई कुछ नहीं करती। विदेश नीति हो या घरेलू मामला, हर जगह यही बात देखने में आती है।...

डॉ. गिरीश मिश्र

पिछले महीने लंदन से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका 'द इकॉनामिस्टÓ में भारत के ऊपर एक रिपोर्ट छपी है जिसका शीर्षक है: 'टू चेंज इंडिया : लाइट्स, कैमरा, इन-एक्शन।Ó यह इस बात को इंगित करती है कि मोदी सरकार लंबी-चौड़ी बातें करती हैं मगर कार्रवाई कुछ नहीं करती। विदेश नीति हो या घरेलू मामला, हर जगह यही बात देखने में आती है।
पत्रिका के अनुसार, मोदी की दिलचस्पी मूलत: राजनीति के थियेटर में है न कि कानून बनाने और विरोधियों के साथ बातचीत कर आगे के रास्ते को तलाशने में है। उसने एक मूर्त उदाहरण पेश किया है कि भूस्वामियों से बातचीत कर आधारभूत संरचना और विकास के लिए जमीन प्राप्त करने के विधेयक को आगे बढ़ाने का मामला था मगर मोदी सरकार ने जिस तरह इस पर कार्रवाई की वह सर्वथा गलत थी। इससे विरोधियों का मनोबल बढ़ा और अंतत: सरकार को घुटने टेकने पड़े। दूसरा उदाहरण, सारे देश में वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) के प्रावधान से जुड़ा था। उम्मीद थी कि संबंधित विधेयक पारित होकर कानून का रूप ले लेगा मगर ऐसा नहीं हो सका। उम्मीद थी कि मोदी या जेटली मुख्य विपक्षी दल-कांग्रेस से बातचीत कर विधेयक को पारित करवा लेंगे। मगर जिस तरह सरकार ने अडिय़ल रुख अपनाया उससे विधेयक के निकट भविष्य में पारित होने की संभावना नहीं दीख रही।
यही हाल सार्वजनिक स्वास्थ्य और जल प्रदूषण जैसे मामले के संबंध में भी है यद्यपि वहां मत वैभिन्य का कोई प्रश्न ही नहीं है। निवेशक चिंतित हैं कि कर संबंधी कानूनों में चिरप्रतिक्षित बदलाव की भी कोई संभावना नहीं दीख रही। यह उम्मीद कि आधारभूत संरचना को दुरुस्त करने से देश में लाखों-लाख नई नौकरियों के पैदा होने की बात अब मिट्टी में मिलती जा रही है।
पत्रिका ने एक मूर्त उदाहरण पेश कर देश में रोजगार की गंभीर होती समस्या को रेखांकित किया है। उसके अनुसार, छत्तीसगढ़ में सरकारी दफ्तरों में पियूनों की मात्र 30 जगहें खाली थीं मगर 75 हजार लोगों ने आवेदन दे रखा था। इनमें एम.ए. और इंजीनियरिंग की डिग्रीधारण करने वाले भी थे। उधर गुजरात में पटेल लोगों ने रोजगार के अवसर को लेकर आंदोलन शुरु किया है। जिसको नियंत्रित करने के क्रम में आठ आदमियों की जानें गई हैं।
मोदी और उनके समर्थक भले ही आने वाले दिनों की मोहक तस्वीरें पेश करें मगर असलियत कुछ और है। विदेशी निवेश के आने की संभावना निरंतर क्षीण होती जा रही है। मोदी शासन के आरंभ में सारे देश में सामान्य या उससे बेहतर बरसात हुई भी जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। मुद्रास्फीति की दर में तकरीबन पचास प्रतिशत की गिरावट आई। वस्तुओं की कीमतें घटीं। बाहर से आने वाले कच्चे तेल की कीमतें गिरीं। अब भी यह गिरावट जारी है।
किन्तु कुल मिलाकर स्थिति विदेशी निवेश के अनुकूल नहीं है। उद्योग से जुड़े लोग सरकार पर दोषारोपण कर रहे हैं कि सरकार ने उनके मनोनुकूल कदम नहीं उठाए हैं जिनसे भारत में स्थिति बदले। सरकार ने भूमि के मामले में घुटने टेक दिए हैं। भूमि प्राप्त करना पहले की अपेक्षा कठिन हो गई है। यदि पर्याप्त मात्रा में भूमि न मिले तो विदेशी निवेशक शायद ही आएं। पिछली सरकार की तुलना में अभी स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। यदि हम वाजपेयी सरकार के आरंभिक पन्द्रह महीनों से मोदी सरकार के शुरुआती पन्द्रह महीनों की तुलना करें तो स्थिति काफी खराब है। यदि हम डॉ. मनमोहन सिंह के दो कार्यकालों से तुलना करें तो डॉ. सिंह के जमाने में स्थिति कहीं बेहतर थी। डॉ. मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल के दौरान मुंबई स्टॉक एक्सचेंज के सेंसेक्स में 56 प्रतिशत और दूसरे कार्यकाल के दौरान 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। किन्तु मोदी के सत्तारूढ़ होने के समय से लेकर अब तक सेंसेक्स में वृद्धि की बात तो छोड़ें, उसमें एक प्रतिशत की गिरावट हुई है। वर्ष 2015-16 की पहली तिमाही के दौरान संवृद्धि की दर सात प्रतिशत पर आ गई है। आने वाले समय में उसमें गिरावट ही होने वाली है क्योंकि चीन सहित पश्चिमी देशों में स्थिति काफी प्रतिकूल बनी हुई है।
शेयरों में निवेश करने वाली एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी- रोजर्स होल्डिंग्स लिमिटेड- के अध्यक्ष जिम रोजर्स का कहना है कि मोदी बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं मगर धरातल पर कोई कार्रवाई नहीं करते। पिछले वर्ष रोजर्स भाजपा की शानदार विजय से उत्साहित होकर भारत में दिलचस्पी लेने लगे किन्तु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। मोदी सरकार ने विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी को बनाए रखने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए हैं। स्वयं रोजर्स ने भारतीय कंपनियों के शेयर खरीदे हैं और वहां प्रत्यक्ष निवेश में दिलचस्पी दिखलाई है। वे इस बात को लेकर उत्साहित रहे हैं कि भाजपा को भारी बहुमत मिलने के कारण वह अन्य दलों पर निर्भर नहीं है और वह अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएगी। मोदी ने विदेश यात्रा के दौरान निवेशकों को भारत आकर निवेश करने का आमंत्रण भी दिया और रेखांकित किया कि निवेश के मार्ग में आनेवाली कठिनाइयों को वे दूर करेंगे किन्तु धरातल पर स्थिति पहले जैसी ही है। कुछ भी परिवर्तन नहीं हुआ है।
इसी कारण रोजर्स ने अपने भारतीय शेयरों को बेचने का निर्णय लिया है। वे चीन, जापान और रूस का रुख करने वाले हैं। आप इस महीने के आरंभ में प्रकाशित जिम रोजर्स के विस्तृत साक्षात्कार को 'मिंटÓ नामक पत्रिका में पढ़ सकते हैं। मिंट का प्रकाशन हिन्दुस्तान टाइम्स समूह करता है।
सदानन्द धूमे वाशिंगटन स्थित अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के रेजिडेंट फेलो हैं। यह संस्था काफी प्रतिष्ठित है। धूमे ने यह सवाल उठाया है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय दक्षिणपंथी लोगों को निराश कर रहे हैं? सतही तौर पर यह प्रश्न बेतुका लगता है। भारतीय जनता पार्टी में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसने भारतीय सत्ता पर कब्जा किया है और मोदी की लोकप्रियता अब भी बरकरार है। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी को भी इतनी लोकप्रियता नहीं मिली थी। सोशल मीडिया पर अब भी उनकी धाक है। इसके बावजूद वे अपने वैकल्पिक विचारों को आगे बढ़ाने में असमर्थ रहे हैं। सत्ता में आए हुए पंद्रह महीने हो चुके हैं किन्तु अब तक कोई खास उपलब्धि नहीं हुई है।
जहां तक आर्थिक नीतियों का प्रश्न है जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के असर को तोड़ पाना आसान नहीं है। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को विकास नियोजन के रास्ते से किया जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र की भारी भूमिका रही। साथ ही विदेश नीति में तटस्थता पर जोर दिया गया। उन्होंने उस समय के दो बड़े समूहों से अलग रहकर अपने विकास का रास्ता तलाशने की कोशिश की। उन्होंने सभी भारतीयों की समानता पर जोर देने के साथ ही अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा पर भी जोर दिया।
जहां तक मोदी का सवाल है उन्होंने अमेरिका, जापान, रूस आदि के साथ ही इजरायल से भारत के संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की है। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता को भी बनाए रखा है। पहले लोगों की आशंका थी कि उसे चोट पहुंचे और हिन्दू-मुसलमान एकता नहीं बनी रहे।
सबसे अधिक निराशा अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में हुई है। उनसे उम्मीद थी कि वे अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ऐसे सुधार करेंगे जिससे वह तेजी से आगे बढ़े। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उन्होंने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे अर्थव्यवस्था को किस दिशा में और किस रफ्तार से आगे बढ़ाना चाहते हैं। अफसरशाही पर उनकी निर्भरता स्पष्ट है। अब तक पन्द्रह महीने बीत जाने के बावजूद वे गुजरात के मुख्यमंत्रित्व के बाहर नहीं निकल पाए हैं। वे अब भी देश के नेता के रूप में अपने क्लू स्थापित नहीं कर सके हैं।
उदाहरण के तौर पर धूमे ने बतलाया है कि वे घाटे में चल रही है कंपनियों का निजीकरण नहीं कर पाए हैं। एयर इंडिया अब भी सरकारी क्षेत्र में है और उसका घाटा बढ़ता ही जा रहा है। जहां तक सरकार की कराधान की नीतियों का प्रश्न है कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। कालेधन का मसला ज्यों का त्यों है। इसमें जहां विदेशी निवेश का भारत में निवेश करने से घबराते हैं वहीं भ्रष्ट अफसरशाही निरंतर अपनी झोली भरती जा रही है। एक तरह से लाइसेंस परमिट राज ज्यों का त्यों है।
यदि हम मोदी शासनकाल की तुलना वाजपेयी शासनकाल से करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि बहुमत के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर रहने के बाद भी वाजपेयी की उपलब्धियां अधिक हैं। वाजपेयी ने दूरसंचार क्षेत्र को निवेश के लिए खोल दिया। नतीजतन इस क्षेत्र में उन्हें काफी नेकनामी मिली और दूरसंचार में देशी-विदेशी पूंजी बड़े पैमाने पर आई। वाजपेयी ने महसूस किया कि बेकरी जैसी गतिविधि पर पैसा बर्बाद न कर, स्कूलों, सड़कों और अस्पतालों में पैसे लगाए जाएं। याद रहे कि अरुण शौरी के तहत उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के निजीकरण के लिए एक मंत्रालय बनाया था।
वाजपेयी के वित्त मंत्रियों- यशंवत सिन्हा और जसवंत सिंह- ने वित्तीय क्षेत्र में सुधार की दिशा में कदम बढ़ाए थे जो कारगर सिद्ध हुए। वर्ष 2003 में बने फिश्कल रिस्सपांसिबिलिटी एक्ट को लोग आज भी याद करते हैं।  वाजपेयी के कार्यकाल को अब भी लोग याद करते हैं कि उन्होंने मध्यम वर्ग को उदारीकरण के साथ जोडऩे की कोशिश की।
इसके विपरीत मोदी क्या विरासत छोड़कर जाएंगे? कहना न होगा कि अब तक लोगों को निराशा ही हाथ लगी है। उनके शासन में आए पन्दह महीने बीत चुके हैं मगर उनकी कोई मूर्त उपलब्धि नहीं दिख रही है। धूमे के शब्दों में उन्हें एक ऐसे जनरल के रूप में याद किया जाएगा जिसने 2014 की लड़ाई तो जीत ली है मगर वह बड़ा युद्ध हार गया है।
मोदी के अमेरिकी समर्थकों का मानना है कि यदि उनको उपलब्धियां टिकाऊ नहीं रहीं तो आनेवाले समय में उन्हें लोग भुला देंगे। इसीलिए समय बीतने के साथ उनकी व्यग्रता बढ़ रही है। मोदी फिर अमेरिका जाने वाले हैं। इस बार उनसे आशा है कि वे अमेरिकी निवेशकों को निश्चित रूप से आकर्षित कर पाएंगे। इस बार वे सूचना प्रौद्योगिकी के माहिरों से भी मिलेंगे।


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