मिले सुर मोदी और ममता के

सीताराम येचुरी : बहुत अर्सा नहीं हुआ है जब प. बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार को गरिया रही थीं। क्यों? क्योंकि मानिक सरकार ने सरकारी शिष्टïाचार का पालन करते हुए, अगरतला पहुंचने पर प्रधानमंत्री की अगवानी की थी। बहरहाल, वही प. बंगाल की मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री मोदी की हाल की कोलकाता यात्रा में उनके लिए लाल कालीन ही नहीं बिछवा रही थीं बल्कि बढ़-चढ़कर प्रधानमंत्री के साथ सुर मिला रही थीं। ...

सीताराम येचुरी

बहुत अर्सा नहीं हुआ है जब प. बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी, त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार को गरिया रही थीं। क्यों? क्योंकि  मानिक सरकार ने सरकारी शिष्टïाचार का पालन करते हुए, अगरतला पहुंचने पर प्रधानमंत्री की अगवानी की थी। बहरहाल, वही प. बंगाल की मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री मोदी की हाल की कोलकाता यात्रा में उनके लिए लाल कालीन ही नहीं बिछवा रही थीं बल्कि बढ़-चढ़कर प्रधानमंत्री के साथ सुर मिला रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हुई कहा-सुनी को बहुत पीछे छोडऩे की दोनों ओर से सचेत कोशिश की जा रही थी। इस दौरे के क्रम में सामने आयी दोनों की देहभाषा, दोंनों के बीच एक नये समीकरण के पनपने को दिखा रही थी। एक नयी राजनीतिक जुगलबंदी के आसार नजर आ रहे हैं।
बेशक, इसके कारण खोजना कोई मुश्किल भी नहीं है। प. बंगाल की मुख्यमंत्री इस राज्य में सामने आये हजारों करोड़ रु. के शारदा घोटाले और अन्य चिटफंड घोटालों की सीबीआई जांच से घिरी हुई हैं। इन घोटालों के सिलसिले में अब तक राज्य मंत्रिमंडल के कई जाने-माने नाम तथा सत्ताधारी पार्टी के कई सांसद  जेल भी पहुंच चुके हैं। आफत की मारी तृणमूल कांग्रेस राहत खोज रही है। यह राहत उसे नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार के साथ कोई राजनीतिक 'समझौताÓ ही दिला सकता है। मोदी सरकार ही है जो इस समय जारी छान-बीन के दबाव से उसे राहत दिला सकती है।
प्रधानमंत्री की ताजा बंगाल यात्रा के दौरान सामने आयी राजनीतिक जुगलबंदी के पीछे ठीक यही प्रेरणा काम कर रही होने की सच्चाई की पुष्टिï खुद प्रधानमंत्री ने ही कर दी। आसनसोल में अपने भाषण में प्रधानमंत्री जहां यूपीए राज के कोयला, स्पैक्ट्रम आदि आदि घोटालों पर जमकर गरजे-बरसे, वहीं शारदा घोटाले का जिक्र तक करना भूल गए। यह तब है जबकि प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार की हैसियत से श्री मोदी ने ठीक इसी घोटाले को लेकर, तृणमूल कांग्रेस और निजी तौर पर खुद मुख्यमंत्री के खिलाफ भी हमले करने में कोई कसर नहीं रहने दी थी। वैसे इस मामले में सुलह की शुरूआत तो पहले ही हो चुकी थी। इसी साल 9 मार्च को दिल्ली में प. बंगाल की मुख्यमंत्री की प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात के बाद, सीबीआई ने अपनी शारदा जांच की रफ्तार साफ तौर पर धीमी कर दी थी। यह भी याद रहे कि पिछले ही दिनों प. बंगाल में हुए नगर निकाय चुनावों के मौके पर, मोदी सरकार ने नाममात्र के लिए ही केंद्रीय बल इस राज्य में भेजे थे और इस तरह उसने तृणमूल कांग्रेस द्वारा चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली किए जाने का रास्ता बनाया था। याद रहे कि इससे पहले, इससे ठीक उल्टे रुख का प्रदर्शन करते हुए, प. बंगाल की मुख्यमंत्री को किसी भी तरह के बजट-पूर्व संवाद के लिए, प्रधानमंत्री से मिलना और यहां तक कि वित्त मंत्री को भेजना तक मंजूर नहीं हुआ था। साफ कि अब कुछ नयी खिचड़ी पक रही है।
जहां तक पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का सवाल है, उन्होंने भाजपा के प्रति और उसके  प्रधानमंत्री के प्रति भी, अपनी पिछली सारी कटुता भुला ही दी लगता है। तभी तो नजरुल मंत्र ऑडीटोरियम के ग्रीन रूम में दोनों के बीच, मीडिया तथा जनता की नजरों से दूर, अकेले में बहुत ही 'सौहाद्र्रपूर्णÓ मीटिंग हुई, जो पूरे आधे घंटे चली। बाद में दोनों ने राजभवन में साथ-साथ भोजन किया। यह तो खैर किसी से भी छुपा हुआ नहीं है कि प्रधानमंत्री को अपने महत्वाकांक्षी कानून पारित कराने के लिए, अपने बहुमत की कमी पूरी करने के लिए, राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के समर्थन की दरकार है। सच तो यह है कि अभी हाल ही में तृणमूल कांग्रेस ने खदान व खनिज विधेयक और कोयला आवंटन विधेयक पारित कराने में मोदी सरकार की मदद की थी। वह अब माल व सेवाएं कर (जीएसटी) विधेयक का भी समर्थन करने के लिए तैयार हो गयी है जबकि अब तक वह इस विधेयक का जोर-शोर से विरोध करती आयी थी। इस तरह, सुर मिलाने में दोनों पक्षों को अपना फायदा नजर आ रहा है।
हाल के राजनीतिक इतिहास को भी और खासतौर पर केंद्र-राज्य संबंधों के इतिहास को मनमाने तरीके से गढऩे की कोशिश करने को, प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी आदत ही बना लिया है। असानसोल में इंडियन आइरन एंड स्टील कंपनी (आइआइस्को) विस्तार परियोजना के उद्ïघाटन के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने वामपंथ पर प. बंगाल का निरुद्योगीकरण करने का आरोप लगाया और यह भी दावा किया कि उद्योगीकरण के लिए भाजपा के नेतृत्ववाली वाजपेयी सरकार ने सहायता की जो पेशकश की थी, उसे तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने ठुकरा दिया था। लेकिन, सचाई यह है कि आइआइस्को के आधुनीकीकरण के पूरे काम की शुरूआत ही वाम मोर्चा के शासन में हुई थी। दूसरी ओर, अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा सरकार ने इसके लिए सहायता देने से इंकार कर दिया था। वास्तव में यूपीए-प्रथम की सरकार को ही, जो बाहर से वामपंथ के समर्थन पर निर्भर थी, इस काम के लिए केंद्रीय सहायता देनी पड़ी थी। इस पूरे दौर में प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ही थी जो राज्य सरकार के सारे के सारे विकास के प्रयासों का विरोध कर रही थी, जिसमें आइआइस्को के आधुनिकीकरण की परियोजना भी शामिल थी।
बेशक, प्रधानमंत्री मोदी ने एक और कला में महारत हासिल कर ली है। यह कला है जनता के कल्याण की कथित रूप से लंबी-चौड़ी तथा नयी योजनाओं का ऐलान करना, जबकि वास्तव में पहले की सरकारों द्वारा शुरू की गयीं तथा पहले से चल रही योजनाओं की ही रीपैजिंग की जा रही होती है। इस बार उन्होंने बड़े धूम-धड़ाके के साथ ऐसी तीन 'नयीÓ योजनाओं की घोषणा की है—प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, जीवन ज्योति बीमा योजना और अटल पेंशन योजना।
प्रधानमंत्री अपनी इन 'नयीÓ योजनाओं की घोषणा करने पर ही नहीं रुक गए। उन्होंने अपना यह जाना-पहचाना राग भी सुनाया कि कैसे आजादी के बाद के पिछले छ: दशकों में तो कुछ हुआ ही नहीं था और हर चीज की शुरूआत उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि बैकों का राष्टï्रीयकरण तो किया गया था गरीबों के लिए, लेकिन बैंकों में कोई गरीब तो पहुंचे ही नहीं। ''80 से 90 फीसद लोगों को पेंशन या बीमा तक पहुंच ही हासिल नहीं है।ÓÓ इस मौके पर अपनी बहुप्रचारित जन धन योजना का एक बार फिर ढोल पीटते हुए उन्होंने यह कहकर अपनी पीठ ठोकी कि करोडों नये बैंक खाते खोले गए हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी को शायद यह याद ही नहीं है कि हमारे देश की आबादी कुल 120 करोड़ होगी, जबकि जिंदा बैंक खाते अब भी कुल 15 करोड़ हैं। इससे भी बदतर यह कि इनमें से भी एक तिहाई खातों में तो कोई जमा राशि है ही नहीं।
जिन तीन नयी योजनाओं की घोषणा की गयी है, उनमें से तीनों का लाभ उन्हीं लोगों को मिल सकता है, जिनका बैंक खाता हो। इस तरह, पहले कदम पर ही ऐसे 90 फीसद देशवासी इन योजनाओं के दायरे से बाहर हो जाते हैं, जिन्हें इस तरह की सामाजिक सुरक्षा की बहुत जरूरत है। वास्तव में जिन लोगों के बैंकों में खाते हैं, उनके लिए तो ऐसी ही अनेक योजनाएं पहले ही मौजूद हैं। इससे भी बदतर यह कि इनमें से किसी भी योजना के लिए न तो सरकार एक भी पैसा लगाने जा रही है और न किसी भी तरह की बजट सहायता देने जा रही है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि ये योजनाएं सिर्फ और सिर्फ जनता के अपने अंशदान के आधार पर ही चलने जा रही हैं।
अटल पेंशन योजना को ही लीजिए। यह पेंशन योजना असंगठित क्षेत्र से संबंधित है और इस तरह से तैयार की गयी है कि 60 साल की उम्र से शुरू कर प्रति माह 1000 से 5000 रु. के बीच तय न्यूनतम पेंशन मुहैया करायी जा सके जो 18 से 40 वर्ष की उम्र के बीच किसी व्यक्ति द्वारा दिए गए अंशदान पर निर्भर होगा। सच्चाई यह है कि 20 वर्ष या उससे ज्यादा वक्त तक किसी व्यक्ति द्वारा किए गए अंशदान के बाद इस योजना के तहत उसे जो हासिल होगा, वह (ब्याज जोडऩे के साथ) उससे कोई ज्यादा नहीं होगा, जितना वह पहले ही निवेश कर चुका है। इसके अलावा हमारे यहां औसत उम्र 65.5 साल है, इसे देखते हुए इस योजना के लाभ की औसत उम्र बस करीब 5 साल ही होगी, जबकि अंशदान करीब 20 वर्ष से ज्यादा का होगा।
इस तरह लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी का हवाई किस्म के लाभों पर दावा करने का तरीका एक जैसा ही है जिनकी मार्केटिंग, प्रचार के जरिए ऐसे की जाती है जैसे कि ये कदम जनता की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाए जा रहे हैं।
संसद के गलियारों में इस तरह की खुसर-पुसर सुनी जा सकती है कि पहले से ही तैयार बैठी तृणमूल कांग्रेस को राजनीतिक अवसरवाद के इस जाल में खींचकर प्रधानमंत्री मोदी आर एस एस/ भाजपा के ''घर वापसीÓÓ के कार्यक्रम को लागू करने में सफल रहे हैं। अतीत मह साफ है कि केंद्र सरकार और भाजपा अराजकता, हिंसा तथा आतंक की उस राजनीति में भागीदार होंगी जो तृणमूल कांग्रेस राज्य में चला रही है।
बंगाल की जनता पर और ज्यादा बोझ डालने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा लागू की जा रही जनविरोधी नीतियों को सघन बनाने के अतिरिक्त इस तरह का नंगईपूर्ण राजनीतिक अवसरवाद जनता की तकलीफों में इजाफा करने के साथ राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को और तीखा ही बनाएगा। इसीलिए पश्चिम बंगाल की जनता का एक बार फिर यह आह्वïान किया जा रहा है कि वह इस घातक गठजोड़ का डटकर मुकाबला करे जिसका आनेवाले दिनों में और सघन होना तय है। देश भर के धर्मनिरपेक्ष और जनवादपसंद लोगों के समर्थन के बिना पश्चिम बंगाल में इस बुराई को मात नहीं दी जा सकती और पूरे देश को इसकी चपेट में आने से नहीं बचाया जा सकता। इस बुराई की चुनौती का एकजुट होकर मुकाबला करना और उसे मात देना जरूरी है।

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