मानवाधिकार दिवस: दूसरे का दर्द अपनाइए

चिन्मय मिश्र : एक और मानवाधिकार दिवस 10 दिसंबर हमारे सामने है। तमाम लोग पिछले एक वर्ष में हुए मानवाधिकार उल्लंघन का लेखा-जोखा कर रहे हैं तो कुछ और ज्यादा का। परंतु एक बात तो एकदम साफ है कि मानवाधिकारों का हनन लगातार बढ़ रहा है और हर ओर बेचारगी सी फैल रही है। ...

चिन्मय मिश्र

इंसान अगर खुद को इंसान समझता है,
एमाल (स्वर्ग) पे क्यों अपने लगता है पछताने।
-हंसराज रहबर

एक और मानवाधिकार दिवस 10 दिसंबर हमारे सामने है। तमाम लोग पिछले एक वर्ष में हुए मानवाधिकार उल्लंघन का लेखा-जोखा कर रहे हैं तो कुछ और ज्यादा का। परंतु एक बात तो एकदम साफ  है कि मानवाधिकारों का हनन  लगातार बढ़ रहा है और हर ओर बेचारगी सी फैल रही है। लोग-बाग जाने अनजाने कानून व्यवस्था को ढर्रे पर लाने के लिए सहिष्णुता के बजाय कटुता और धैर्य के बजाय क्रूरता को अपनाने पर जोर दे रहे हैं। सारी शासन व्यवस्थाएं और प्रणालियां घुटनों पर हैं और किसी तरह खुद को संभाले हुए हैं। अधिकांश देश व वहां की सरकारें अपने गिरेबां में झांकने की बजाय दूसरे की चेहरे की कालिख से खुद को चमकाने का प्रयास कर रहे हैं। काजल की इस कोठरी या कोयले की खान से कोई भी उजला नहीं निकल सकता।
शायद इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने अब राष्ट्रों से उम्मीद हटाकर लोगों पर विश्वास करने का मन बनाया है। तभी तो इस बार के अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस की थीम है, ‘हम लोग! किसी के अधिकारों के लिए उठ खड़े हों।’ तो क्या ‘हम लोग’ इस उम्मीद पर खरे उतरने की कोशिश करेंगे? पिछले एक वर्ष में भारत की ही बात करें तो नोटबंदी के माध्यम से आम आदमी के जीवन के अधिकार से लेकर संविधान प्रदत्त सभी मूल अधिकारों का जबरदस्त हनन हुआ है। लेकिन इसके अलावा भी ऐसे तमाम मसले हैं जिन पर यदि विचार करें तो साफ नजर आता है कि हमारे यहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता का लगातार हनन हो रहा है। इनकी गिनती यदि कश्मीर से शुरू करें तो आसानी होगी। वहां पिछले पांच महीनों से जो कुछ चल रहा है वह अपने आप में भारतीय शासन व्यवस्था की मनोवृत्ति को समझने और समझाने को पर्याप्त है। वैसे वहां पिछले दो दशकों से स्थितियां लगातार बद् से बद्तर होती जा रहीं हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, असम सहित उत्तरपूर्व, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र कहां-कहां की बात करें और कहां की न करें।
भोपाल एनकाउंटर हो या मलकानगिरी एनकाउंटर देशभक्ति के नाम पर किसी भी तरह के सवाल पूछने की अब कोई गुंजाइश ही नहीं बची। मणिपुर में हुए सैकड़ों एनकाउंटर पर यदि आप सवाल पूछेंगे तो आप सैन्य बलों का मनोबल तोड़ रहे होते हैं। एक राष्ट्र में संविधान प्रदत्त अधिकारों की बहाली की बात करना अब हमें शक के दायरे में ले आता है। संविधान की प्रस्तावना को मानवाधिकारों से जोडऩा अपना मजाक उड़वाना है और यदि आप अपने मूल अधिकारों को लेकर सवाल करेंगे तो शायद हाथापाई के शिकार हो जाएंगे। अब कुपोषण से मरना शायद मानवाधिकार का हनन नहीं है। महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचार तो संस्कृति का अंग हैं। तभी तो वीभत्स हत्याओं (आनर किलिंग) की संख्या जो वर्ष 2014 में 28 थी वह एक वर्ष में बढक़र 251 हो गई, याने इज्जत की हिफाजत में 796 प्रतिशत की वृद्धि। आदिवासियों को तो वैसे भी जीने का शऊर नहीं है। और दलित? उन्हें तो अभी मनुष्य बनने में ही सदियां लग सकती हैं। इस मानसिकता से कैसे बचेंगे? जिन नंदिनी सुंदर की अपील पर सर्वोच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा के राडमेटला, मोरापल्ली, और टिम्मापुरम में मार्च 2011 में कांबिग ऑपरेशन के दौरान 250 से ज्यादा घरों को जलाने की जांच के लिए सीबीआई को आदेश देती है, एक और मामले में उन्हीं नंदिनी सुंदर के हस्तक्षेप पर सर्वोच्च न्यायालय सलवा जुडूम को प्रतिबंधित कर देता है। उन्हीं नंदिनी सुंदर पर छत्तीसगढ़ पुलिस अब हत्या का आरोप लगाकर एफ आईआर दर्ज करा चुकी है। सन् 2011 के लोमहर्षक घटनाक्रम पर रिपोर्ट आने के बाद पहली बार छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिरीक्षक कल्लूरी ने माना कि (उन्हीं के आधीन यह कार्रवाई हुई थी) हिंसा उन्हीं के मार्गदर्शन में हुई थी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा उन्हें व्यक्तिगत तौर प्रस्तुत होने के आदेश के बाद इसी साल 23 अक्टूबर को जगदलपुर में एक संवाददाता सम्मेलन में कल्लूरी साहब ने कहा,  ‘मैं कोई कायर नहीं हूं। मैं उस समय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) था। यह एक बहुत बड़ा ऑपरेशन था। हमने 421 व्यक्ति भेजे थे। टाड़मेटला में हमारे 76 लोग मारे गए थे। जब उस क्षेत्र में इतना बड़ा बल भेजा जाएगा तो युद्ध होना तो लाजमी है, गोलियां तो दागी ही जाएंगी और बमबारी भी होगी। वह गर्मी का मौसम था। अतएव (इतनी गर्मी में) झोपडिय़ों ने आग तो पकडऩी ही थी। हां, पुलिस कार्रवाई के दौरान झोपडिय़ों में आग लगी थी। परंतु पुलिस ने उनमें आग नहीं लगाई थी। हमारे लोगों ने अपनी जान न्यौछावर की थी। इसके बाद पुलिस बल का मनोबल गिराना ठीक नहीं है। वास्तव में यह तो राष्ट्रविरोधी कार्य है।’ तो आप अपने लोगों पर गोली चलाएं, बमबारी करें, आगजनी करें, परंतु सवाल उठाना अब देशद्रोह हो गया? यह तो सिर्फ एक घटना है। ऐसा पूरा घटनाचक्र देश के तमाम हिस्सों में दोहराया जा रहा है।
खुर्शीद अनवर ने लिखा है, ‘यहां जिंदा लाशें हैं और मुर्दा इंसान भी। जिंदा लाशों और मुर्दा इंसानों के जख्म ताजा रखे हैं। लाल खून हर तरफ फैल रहा है। इंसानों का समुन्दर अपने साथ खून का सैलाब भी लाया है। सैलाब रोको कि इसमें सब डूब जाएगा। मगर इस सैलाब के लिए कोई बांध नहीं बनाया जा सकता। तैयारशुदा बांध भी अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं। बिखर रहे हैं।’ ऐसे में हम लोगों को किसी और के अधिकारों के लिए उठ खड़ा होना ला•ामी हो गया है। क्योंकि कहीं और, कोई और हमारे अधिकारों के लिए न केवल खड़ा है बल्कि वह संघर्षरत भी है। वह नर्मदा घाटी में है, वह मलकानगिरी में है, वह मुंबई की उन झुग्गी बस्तियों में हैं जिन्हें तोड़ा जा रहा है। वह विशाखापट्टनम में हैं जहां मछुआरे बेरोजगार हो रहे हैं, वह कुडनकुलम में हैं जहां हजारों निर्दोष लोग राष्ट्रद्रोह के मामले में अदालतों में खड़े हैं। (गौरतलब है यहां पर लोगों पर देशद्रोह के 6 से लेकर 125 तक मुकदमे दर्ज है। वैसे हम कितनी बार देशद्रोह की अनुमति दे सकते हैं?) वह छत्तीसगढ़ में राजनीतिज्ञों, पूंजीपतियों और अधिकारी गठजोड़ के सामने खड़ा है तो आंध्रप्रदेश में वेटलेंड बचाने खड़ा है। वह गुजरात की सांप्रदायिक विनाशलीला से लड़ रहा है तो मुजफ्फरनगर की हैवानियत से। जम्मू-कश्मीर में अस्मिता की लड़ाई लड़ रहा है और उत्तरपूर्व में अपने पारंपरिक अस्तित्व की। अब आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने मानवाधिकार की लड़ाई खुद लड़ें और दूसरे के अधिकारों के लिए भी आगे आएं।
स्मार्ट सिटी के नाम पर उजड़ते शहरों के बेघरबार नागरिकों के अधिकारों के लिए खड़ा होना आज की बड़ी जरूरत है। कुपोषित बच्चों को उनकी पूरी खुराक मिले इसे तो सुनिश्चित करना ही होगा। समान शिक्षा के अधिकार, स्वच्छ पानी के अधिकार, नि: शुल्क स्वस्थ्य सेवा का अधिकार जैसे तमाम मानव अधिकारों के लिए तो खड़ा होना ही पड़ेगा। जैसे ही आप किसी और के अधिकार के उठ खड़े होते हैं आप स्वमेव एक बेहतर इंसान के रूप में परिवर्तित हो चुके होते हैं। एक ऐसा देश जो आज भी 70 प्रतिशत गांवों में बसता हो वहां नई तकनीक का लादा जाना, उसके मानवाधिकार का घोर उल्लंघन है। हम अपनी सुविधा के लिए दूसरे को असुविधा नहीं दे सकते।
मानवाधिकार उल्लंघन के कुछ मामले सीधे-सीधे हमें दिखाई देते हैं। परंतु ऐसे असंख्य मामले हैं, जिन्हें लेकर हमारे ध्यान में ही नहीं आता कि इससे भी हमारे मानवाधिकारों का उल्लघंन हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ की यह पहल हमें एक बेहतर इंसान बनाने की दिशा में उठा कदम है। मानवाधिकार हनन से लाल होती इस धरती को हरा बनाने के लिए हमें हर उस शरणार्थी के बारे में भी सोचना होगा जो कि भूमध्य सागर में डूब कर मर रहा है। अफ्रीका में भूख व हिंसा से मर रहे लोग भी हमारे हैं। परंतु हम इसे तभी समझ पाएंगे जब हम अपने पड़ोसी के अधिकार को अपना समझ उसके लिए संघर्ष करेंगे। शायद कबीर के जरिए इस बात को बेहतर समझ पाएं। वे लिखते हैं:-
कबिरा सोई पीर है, जो जानै पर पीर,
जो पर पीर न जानिहैं, सो काफिर पर पीर।


 

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