मदर टेरेसा को हम किस तरह याद करना चाहते हैं?

सुभाष गाताड़े : हर सम्प्रदाय या धर्म अपने प्रति आस्थावानों के सामने रोल मॉडल प्रस्तुत करता रहता है और रोमन कैथोलिक धर्म के पोप फ्रांसिस ने भी अपने ही पूर्ववर्तियों का अनुसरण करते हुए इस दिशा में कुछ कदम तेजी से बढ़ाये हैं। कुछ रोज पहले उन्होंने इस बात का ऐलान किया कि मदर टेरेसा, अब वर्ष 2016 में 'सन्तÓ घोषित की जाएंगी।...

सुभाष गाताड़े

हर सम्प्रदाय या धर्म अपने प्रति आस्थावानों के सामने रोल मॉडल प्रस्तुत करता रहता है और रोमन कैथोलिक धर्म के पोप फ्रांसिस ने भी अपने ही पूर्ववर्तियों का अनुसरण करते हुए इस दिशा में कुछ कदम तेजी से बढ़ाये हैं। कुछ रोज पहले उन्होंने इस बात का ऐलान किया कि मदर टेरेसा, अब वर्ष 2016 में 'सन्तÓ घोषित की जाएंगी।
समाचारों के मुताबिक सितम्बर माह में वैटिकन में एक भव्य समारोह में उन्हें इस पद से सुशोभित किया जाएगा। लाखों लोग एकत्रित होंगे। और उनकी मौजूदगी में इस कार्यक्रम को अंजाम दिया जाएगा और जिस कार्यक्रम का सजीव प्रसारण अर्थात् लाईव टेलिकास्ट होगा। तयशुदा बात है कि दुनिया भर के करोड़ों लोग इस पूरे समारोह को देखेंगे कि रोमन कैथोलिक धर्म में कायम सन्तों की लम्बी-चौड़ी सूची में उनका नाम भी शुमार होने की प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है। जानने वाले बता सकते हैं कि उन्हें इस पद से विभूषित करने की प्रक्रिया 2008 में ही शुरु हो चुकी थी जो अब औपचारिक तौर पर समाप्ति की ओर बढ़ रही है।
समाज के वंचितों के लिए जिस व्यक्ति ने अपना समूचा जीवन समर्पित किया हो, वह सम्मानित हो, ऐसा कौन नहीं चाहेगा? और अपने सेवा कार्यों के लिए बहुत पहले नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मदर के साथ एक और खिताब जुड़ रहा है, इसे जान कर भी लोग प्रमुदित ही होंगे। मगर कुछ प्रश्न अवश्य खड़े होते हैं। पहला अहम् मसला यह है कि अपने जीवन के अन्तिम चालीस साल तक वह ईश्वर पर आस्था के मसले को लेकर गंभीर संकट से गुजरी थीं। और स्वर्ग तथा खुदा के अस्तित्व पर उन्होंने सन्देह करना शुरू किया था।
यह उनके उन पत्रों से उजागर होता है जो उन्होंनेे अपने आत्मीयों को लिखे थे और जो कुछ साल पहले 'मदर टेरेसा : कम बी माई लाईटÓ नामक किताब में प्रकाशित हुए हैं जिसका सम्पादन रेवरंड ब्रायन कोलोडीजचुक- जो उनके करीबी मित्रा थे- उन्होंने किया हैं। पत्रों के मुताबिक उनका यह संकट 1949 से ही शुरू हुआ जबसे उन्होंने कोलकाता के गरीबों एवं मरने के करीब पहुंचे लोगों की सेवा का काम शुरू किया। सम्पादक महोदय ने खुद लिखा है कि वह ऐसा कालखण्ड था जब उन्होंने ईश्वर को ' न अपने हदय में या चर्च मेंÓ महसूस किया था। एक पत्र में उन्होंने लिखा था 'यह मुस्कान, एक तरह का मुखौटा है जो सब कुछ ढंक लेती है। मैं यूं बोल रही थी गोया मेरा हदय खुदा के साथ प्रेम करता हो। अगर तुम वहां होते तो कहते 'क्या पाखंड हैÓ।
आखिर ऐसे व्यक्ति को जो खुदा के अस्तित्व को लेकर भी प्रश्न खड़ा करता रहा है, उसे धर्मविशेष का रोल मॉडल बनाने की बात कहां तक उचित है! दूसरा मसला किसी को सन्त घोषित करने को लेकर पिछले तीन-चार दशकों में आए नए उछाल को लेकर है। मालूम हो कि लगभग 25 साल तक पोप रहे जान पॉल के कार्यकाल के दौरान 482 सन्त घोषित किए गए थे, यह संख्या उनके सभी पूर्ववर्तियों द्वारा घोषित सन्तों की संख्या से अधिक थी। सन्त घोषित करने के पहले कदम के तौर पर देखे जाने वाले 'बीटिफिकेशनÓ अर्थात व्यक्तिविशेष को ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार करने में भी वह अव्वल रहे थे, जिन्होंने 1,338 लोगों का बीटिफिकेशन किया था। पोप फ्रांसिस भी शायद उसी रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं जिन्होंने मई 2013 में 800 लोगों का बीटिफिकेशन किया।
तीसरा अहम् मसला सन्त घोषित करने के पूरे सिलसिले को लेकर है। यह समझने की जरूरत है कि नोबेल पुरस्कार, भारत रत्न आदि पुरस्कार जो व्यक्तिविशेष की कला, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान, समाजसेवा या राजनीति के क्षेत्र में जीवन भर की उपलब्धियों को देख कर दिए जाते हैं, जबकि 'सन्तÓ घोषित करने के लिए विज्ञान को चुनौती देनेवाले चमत्कारों का सहारा लिया जाता है। अपवाद महज उन लोगों के सन्दर्भ में किया जाता है, जो धर्म के नाम पर 'शहीदÓ हो गए।
बताया जाता है कि रोमन कैथोलिक धर्म में किसी को सन्त घोषित करना हो- जिसे 'कननायजेशनÓ कहते हैं -तो उसकी पहली शर्तें होती है, उपरोक्त व्यक्ति के नाम के साथ कोई चमत्कार घटित होता दिखाया जाये। अगर चमत्कार का 'प्रमाणÓ पेश किया गया तो उपरोक्त व्यक्ति का 'बीटिफिकेशनÓ होता है अर्थात उसे ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किया जाता है, जिसका ऐलान वैटिकन में आयोजित एक बड़े धार्मिक जलसे में लाखों लोगों के किया जाता है तथा दूसरे चरण में उसे सन्त घोषित किया जाता है।
आखिर किसे सन्त घोषित करना है या नहीं यह सम्प्रदायविशेष का आन्तरिक मामला है, लिहाजा उनके बारे में टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। लेकिन जब इसके लिए कुछ ऐसे पैमाने चुने जाते हैं जिनका सम्बन्ध उपरोक्त सम्प्रदाय की आन्तरिक गतिविधियों तक नहीं रहता तब चिन्ता होना स्वाभाविक ही है।
और सिर्फ मदर टेरेसा ही नहीं, पिछले साल पोप फ्रांसिस ने अपने दो पूर्ववर्ती पोप- पोप जॉन 13 और पोप जॉन पॉल 2- को वैटिकन में एकत्रित लगभग पांच लाख की भीड़ के सामने सन्त घोषित किया और 'बीसवीं सदी की त्रासदियों का मुकाबला करने के उनके साहसÓ की प्रशंसा की। इसके पहले इन दोनों पोप को 'दिव्यÓ घोषित किया गया था अर्थात् उन्हें ईसा के प्रिय पात्रों में शुमार किया गया था। अगर हम उस वक्त के अखबार की कतरनों को पलटें तो पता चलता है कि जहां तक पोप जॉन पॉल दो को दिव्य घोषित करने की बात है तो यह 'तथ्यÓ मिल सकता है कि फ्रान्स की रहने वाली 46 वर्षीय सिस्टर मेरी साइमन पिअरे की पार्किन्संस की बीमारी महज पोप का नाम लेने से ही छूमन्तर हो गई थी। उन्हें सन्त घोषित करने की मुहिम 2007 में ही एक अहम् मुकाम पर पहुंची थी जब इसके प्रस्तोताओं ने कथित चमत्कार का सबूत पेश किया था। निश्चित ही आस्था के नाम पर चमत्कारों को वैधता दिलाने का सिलसिला खास धर्मविशेष तक सीमित नहीं है।
अन्त में, अगर चमत्कार की बात कुछ क्षण के लिए भूल भी जाएं तो किसी को भी जब सन्त घोषित किया जाता है तो उसके आमजन से अलग होने की/विशेष होने की बात रेखांकित की जाती है, फिर साधारण व्यक्ति के लिए उन तक पहुंचना अशक्यप्राय लगता है। यह समझने की जरूरत है कि धर्म या धार्मिक संस्थान आम श्रद्धालु को जिस तरह शक्तिविहीन करार देते हैं, उसे पूरी तरह शरणागत बना देते हैं, उसी का यह प्रतिबिम्बन है। अपनी जिन प्रेरणाओं के चलते- जिसमें उनकी सीमाएं एवं संकट भी घुले-मिले थे- मदर समाजसेवी के तौर पर ताउम्र सक्रिय रहीं। क्या आज जन के लिए उतना ही काफी नहीं कि वह उसी रूप में उन्हें याद करें, न कि धर्मविशेष के रोल मॉडल के तौर पर।


 

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