मंदिर, मठों में क्यों नहीं दिखता काला धन?

पुष्परंजन : सबरीमाला के अय्यप्पा मंदिर में स्वाइप मशीन लगा दी गई है, जहां भक्तगण इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दान कर सकते हैं। इस मंदिर में सालाना 650 करोड़ की राशि सोना, जेवर-जवाहरात, दान के जरिये प्राप्त हो जाती है। सभी मंदिरों की तरह यहां भी दान का बड़ा हिस्सा नकद के रूप में होता है। ...

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सबरीमाला के अय्यप्पा मंदिर में स्वाइप मशीन लगा दी गई है, जहां भक्तगण इलेक्ट्रॉनिक तरीके से दान कर सकते हैं। इस मंदिर में सालाना 650 करोड़ की राशि सोना, जेवर-जवाहरात, दान के जरिये प्राप्त हो जाती है। सभी मंदिरों की तरह यहां भी दान का बड़ा हिस्सा नकद के रूप में होता है। स्वाइप मशीनों से कैश में दक्षिणा देने और लेने वालों को दिक्कत होगी। देश में सोलह ऐसे मंदिर हैं, जहां साल में अरबों रुपये का चढ़ावा आता है। उनमें अय्यप्पा मंदिर दूसरे नंबर पर आता है। कुबेर की कृपा सबसे अधिक तिरूअनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर पर है, जिसका खजाना पूरी दुनिया में परीकथा की तरह है। इस मंदिर के आठ में से तीन तहखाने अब भी एक रहस्य की तरह हैं। 7 जुलाई 2011 को पद्मनाभस्वामी मंदिर सुर्खियों में आया था, जब इसके पांच तहखाने खुलने के बाद एक लाख करोड़ से अधिक की संपत्ति का पता चला था।
तीसरे स्थान पर तिरूमाला तिरुपति देवस्थानम् है। 2015-16 में इस मंदिर का सालाना बजट 2530.10 करोड़ रुपये था। लगभग आठ टन सोना बैंकों में जमा करने की पेशकश करने वाले तिरुपति देवस्थानम् ने अगस्त 2015 में साढ़े चार टन सोना बैंक में जमा किया था। साईबाबा मंदिर शिरडी, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, सिद्धिविनायक मंदिर मुंबई, वैष्णोदेवी, काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, सोमनाथ मंदिर, मीनाक्षी मंदिर मदुरै, स्वर्ण मंदिर अमृतसर, केरल का गुरूवायुरप्पन मंदिर, बर्फानी बाबा मंदिर अमरनाथ, कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर, अक्षरधाम मंदिर दिल्ली, लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर, गुजरात में गब्बर पर्वत पर स्थित अंबादेवी मंदिर बेशुमार धन की बारिश, और वैभव के प्रतीक हैं। ये सत्रह विश्वविख्यात मंदिर आज की तारीख में हाईटेक हो चुके हैं। उन्हें आप ऑन लाइन दान कीजिए, और पुण्य के भागीदार बनिये। इसके अलावा देश में हजारों मंदिर हैं, जहां अथाह पैसे चढ़ते हैं। धर्म इस देश का ऐसा उद्योग है, जिसका जीडीपी हर साल बढ़ता रहा है।
2009 में भारत के कैथलिक चर्च के बारे में अनुमान लगाया गया था कि उनके पास सात हजार करोड़ से अधिक की राशि जमा है। उस साल गोवा में कनक्लेव हुआ था, तभी एक चर्चा के दौरान इतनी संपत्ति का अंदाजा लगाया गया। प्रोटेस्टेंट चर्च के पास भी अथाह पैसा है। चर्च, मिशनरी स्कूलों, मिशन के अस्पतालों की संख्या भारत में कोई दस लाख है, जिनके लिए विदेश से 10 हजार करोड़ से अधिक की राशि का आगमन हर साल होता है। यह अनुमान इंडिया टुडे के 30 अप्रैल 2011 के अंक में ‘फ्रीलांसर्स ऑफ गॉड’ शीर्षक वाले लेख में लगाया गया था। ईसाई संस्थाएं बहुत पहले से ऑन लाइन अनुदान लेने की आदी रही हैं। मास (ईसाइयों का धार्मिक समागम) व संडे चर्च के दिन नगद में दान पुरानी परंपरा है। अब चर्च जाने वाले भक्तों को कहा जा रहा है कि स्वाइप मशीन, पेटीएम, डेबिट-क्रेडिट कार्ड के जरिये डोनेशन देने की आदत डाल लें। लेकिन क्या इससे मान लें कि प्रभु यीशु मसीह के भक्त, धन का दुरूपयोग नहीं करते? ईसाई बहुल यूरोप, अमेरिका में सबसे अधिक काला धन चर्च व ईसाई मठों के माध्यम से खपाया जाता है।
2006 में सच्चर समिति ने अपनी रिपोर्ट में जानकारी दी कि पब्लिक सेक्टर बैंकों में मुसलमानों के खाते 12.2 फीसद हैं, और प्राइवेट सेक्टर बैंकों में 11.3 प्रतिशत। 2008 में इस रिपोर्ट को आधार बनाकर रघुराम राजन ने शरिया बैंकिंग की स्थापना का प्रस्ताव रखा, और देश के सभी मदरसों, इस्लामिक संस्थाओं को इसमें पहल करने की अपील की। केरल की सरकार ने इस दिशा में कदम आगे बढ़ाया, तो उसे वहां हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 18 प्रतिशत आबादी वाले भारतीय मुसलमानों के लिए शरिया बैंक, महज प्रस्ताव तक ही सिमट कर रह गया। इसके आगे न बढऩे की वजह चंद मुल्ला व मुस्लिम संगठन थे, जो नहीं चाहते कि चंदे की रकम सार्वजनिक हो।
मिसाल के लिए देवबंद स्थित दारूल उलूम को देश दुनिया से करोड़ों रुपये लोग खैरात में भेजते हैं। दारूल उलूम की वेबसाइट पर ऑन लाइन, क्रेडिट व डेबिट कार्ड के जरिये रकम भेजने के सारे विकल्प आपको दिखेंगे। जिस प्रोजेक्ट पर खर्च करना है, उसकी तय रकम भी दान की दरकार वाले वेब पेज पर आप देख सकते हैं। मगर, दारूल उलूम के पास सालाना रकम कितनी आती है, उसे सार्वजनिक नहीं किया जाता। इस देश में इस्लामिक फंडिंग एक रहस्य सा है, जिसकी वजह से ऐसी कई ऊटपटांग कहानियां भी गढ़ दी जाती हैं, जिनका आखिरी सिरा आतंकवाद पर जाकर समाप्त होता है। इस्लामिक बैंकिंग व्यवस्था को समझने वाले डॉ. रहमतुल्लाह मानते हैं कि मस्जिद, मदरसों, वक्फ बोर्ड, दरगाहों में जो आय के साधन हैं, या जो पैसे खैरात में आते हैं, उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। डॉ. रहमतुल्लाह इसकी जरूरत समझते हैं कि ‘भारत में मुस्लिम फंडिंग’ विषय पर रिसर्च हो।
पर सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन ? तुर्की में धार्मिक संस्थाओं, चर्च, मस्जिद, मदरसा चलाने वालों ने इस्लामिक बैंकिंग की अवधारणा को सबसे अधिक समर्थन किया। 2005 से 2013 तक अरबों लीरा तुर्की के इस्लामिक बैंकों में जमा किये गये। वहां की धार्मिक संस्थाओं द्वारा जमा रकम की वजह से तुर्की मई 2008 में ‘आईएमएफ’ के कर्ज से मुक्त हो सका। अब विश्व मुद्रा कोष का एक पैसा तुर्की पर बकाया नहीं है। यह वह दौर था, जब पूरी दुनिया में आर्थिक भूचाल आया हुआ था। सोचिए कि तुर्की मॉडल की मौद्रिक व्यवस्था हम हिन्दुस्तान में क्यों नहीं लागू कर सकते? भारत में हालत यह है कि हमारी बड़ी परियोजनाएं, विश्व बैंक और आईएमएफ के गाइडलाइन पर काम करने को विवश हैं। क्योंकि 1945 से 2015 तक हमारी सरकारों ने वल्र्ड बैंक से 102.1 अरब डॉलर का कर्ज ले रखा है। हमारे देश के मंदिरों, मठों के पास इतने पैसे हैं कि यदि वह संगठित हो जाएं, तो विश्व बैंक का कर्ज यह देश चुका सकता है।
मंदिर संपत्ति के जरिये देश को कर्जमुक्त करना तो दूर की कौड़ी है, उल्टा धर्म की आड़ में कई तरह के चोर दरवाजे खोलने के प्रयास हो रहे हैं। 2011 में मुंबई हाइकोर्ट ने गणपति पंचायतन संस्थान ट्रस्ट की एक याचिका को खारि•ा की थी, जिसमें देवी-देवताओं के नाम से बैंक अकाउंट खोलने की अदालती अनुमति मांगी गई थी। इस देश में धार्मिक संस्थाएं आयकर, सर्विस टैैक्स से मुक्त हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि चर्च, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, मठों की बैंकिंग व्यवस्था को सरकार मान्यता दे, और देश के विकास में उन अरबों रुपये का इस्तेमाल हो?  मगर साधु-संतों, मठाधीशों को इसके लिए मनाएगा कौन? नेताओं को यही डर सताता है कि उनका वोट बैंक सरक न जाए।
नोटबंदी के इस दौर को ही देख लीजिए। हमारे छप्पन इंच के सीने वाले मोदी जी सबको ललकार रहे हैं, मगर मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं में जमा अथाह संपत्ति पर एक शब्द नहीं बोल रहे हैं। उनमें हिम्मत नहीं है कि उसे वह काला धन घोषित कर सकें। मोदी जी यह नहीं कहेंगे कि मठों, मंदिरों, वक्फ के नाम पर कितने लाख एकड़ बेनामी जमीनें जमींदारों, बाबाओं, मुल्लाओं ने हड़पी हुईं हैं। कोर्ट में हजारों विवाद वर्षों से लटके पड़े हैं। धर्म के नाम पर सबसे अधिक भूमिहरण इस देश में हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी इसे छेड़ कर देख तो लें!
इस समय देश में एक विज्ञापन बाबा का उदय हुआ है। विदेश से कालेधन की वापसी का पुराना अजेंडा फिस्स हुआ, तो बाबाजी लाइन में मर रहे लोगों, विवाह में नकदी की वजह से परेशान परिवारों का मजाक उड़ाने में लगे हैं। बाबाजी पतंजलि के उत्पाद सिर्फ डेबिट, क्रेडिट कार्ड से क्यों नहीं बेचते? बाबाजी ने विज्ञापन का ऐसा बवंडर खड़ा किया है, मानों विदेशी कंपनियों को विस्थापित करके ही दम लेंगे। कुछ महीनों से लगभग हर टीवी चैनल पर बाबा जी का उत्पाद विज्ञापन के रूप में छाया हुआ है। पता नहीं कहां से अरबों का धन आ रहा है, जिसे विज्ञापन के जरिये बाबाजी गला रहे हैं। क्या यह सफेद धन है?
इस साल ब्रॉडकास्ट रिसर्च ऑडियंस कौंसिल (बीएआरसी) के लोग यह देखकर हैरान हो गये कि 23 से 29 जनवरी 2016 तक, सिर्फ पांच दिनों में पतंजलि के विज्ञापन टीवी पर सत्रह हजार बार चलाये गये। दूसरी ओर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ‘एफएमजीसी’ के विज्ञापन इस अवधि में सोलह हजार बार दर्शकों को देखने को मिले। कमरतोड़ प्रचार हो तो आप  कोयले को भी सोने के भाव बेच सकते हैं, यही काम बाबाजी कर रहे हैं। मीडिया खबरों की मानें तो 2016 के शुरूआती छह महीने में बाबाजी ने प्रचार पर 320 करोड़ फूंकने का लक्ष्य रखा था। बाबाजी ने किस कुबेर की कमर पकड़ रखी है, उसे इस देश की गरीब जनता को भी जानना चाहिए।
दो हजार करोड़ की पूंजी वाले बाबा जी 2016 में दस हजार करोड़, और 2019 के आम चुनाव तक बीस हजार करोड़ का आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर लेंगे, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए। बाबाजी के हर्बल, मेगाफुड पार्क के वास्ते हजारों एकड़ जमीनें भाजपा सरकारें अधिग्रहीत करा रही हैं। असम में एक हथिनी के खड्ड में गिर कर मरने के कारण पतंजलि पर केस हुआ है। इस मामले के उजागर होने पर पता चला कि अरूणाचल सीमा से लगे असम में बाबाजी को 28 हजार बीघा जमीन राज्य सरकार की मदद से मुहैया कराई गई है। नागपुर में पतंजलि को 270 एकड़ जमीन मिली है, जिसके भूमिपूजन समारोह में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस उपस्थित थे। 2014 से 2016 तक पतंजलि को कितनी जमीनें भाजपा शासित राज्य सरकारों ने दी हैं, इसे ढंग से उजागर किया जाए तो पता चल जाएगा कि धर्म, योग, राष्ट्रवाद के छद्मावतार देश के संसाधनों को हड़पने के वास्ते कितनी हड़बड़ी में हैं।
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