भूमंडलीकरण और विषमता

गिरीश मिश्र : भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में आर्थिक विषमता की स्थिति क्या होगी? यह प्रश्न आए दिन उठाया जा रहा है। वह घटेगी या बढ़ेगी? दो वर्ष पूर्व फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टॉमस पिकेट्टी ने अपनी पुस्तक 'कैपिटल इन द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरीÓ में पहली बार इस प्रश्न को जोरदार ढंग से उठाया था।...

डॉ. गिरीश मिश्र

भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में आर्थिक विषमता की स्थिति क्या होगी? यह प्रश्न आए दिन उठाया जा रहा है। वह घटेगी या बढ़ेगी? दो वर्ष पूर्व फ्रांसीसी अर्थशास्त्री टॉमस पिकेट्टी ने अपनी पुस्तक 'कैपिटल इन द ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरीÓ में पहली बार इस प्रश्न को जोरदार ढंग से उठाया था। उनका मानना था कि 1930 के दशक से 1970 के दशक तक आर्थिक विषमता की प्रवृत्ति घटने की थी मगर 1970 के दशक के बाद वह लगातार बढऩे लगी है। ऐसा क्यों हो रहा है?
इस प्रश्न पर विस्तार से ब्रांको मिलानोविच ने विचार किया है। उनकी पुस्तक 'ग्लोबल इन इक्वालिटी: ए न्यू अप्रोच फॉर दी एज ऑफ ग्लोबलाइजेशनÓ अभी-अभी हार्वर्ड विश्वविद्यालय प्रेस से प्रकाशित हुई है। इसमें आर्थिक विषमता के साथ उससे जुड़ा राजनीतिक प्रश्नों पर भी विचार किया गया है। स्पष्ट है कि आय की विषमता पर न केवल राष्ट्रीय संदर्भ बल्कि भूमंडलीय परिप्रेक्ष्य में भी विचार किया गया है। लोग इस प्रश्न को लेकर विचार विमर्श करते हैं कि वे कहां रहें जिससे उनके ज्ञान का बेहतर इस्तेमाल हो और उनकी कमाई बढऩे के साथ अपनी जिन्दगी अपेक्षाकृत खुशहाल बना सकें।
वर्ष 1988 में बर्लिन की दीवार के धराशायी होने के साथ समाजवादी दुनिया का पृथक अस्तित्व समाप्त हो गया। दुनिया का सबसे बड़ा समाजवादी देश चीज पूंजीवादी व्यवस्था का अंग बना गया। भूमंडलीकरण का दबदबा कमोबेश सर्वत्र देखा गया। एक बात स्पष्ट रूप से उभरी है कि भूमंडलीकरण का लाभ सबको समान रूप से नहीं मिला है। संचार क्रांति के फलस्वरूप विभिन्न फर्मों ने अपने कारखाने एक ही जगह नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में स्थापित किए हैं। सस्ता श्रम, कच्चा माल तथा बाजार को देखते हुए यह फैसला लिया जाता है।
वर्ष 1988 और 2008 के बीच एक भूमंडलीय मध्य वर्ग का उदय हुआ है यद्यपि तुलनात्मक दृष्टि से वह पश्चिमी मध्य वर्ग की तुलना में गरीब है। फिर भी इस बात को नहीं नकारा जा सकता है कि एशिया के गरीब और मध्यवर्गीय जनता को काफी फायदा हुआ है।
पश्चिमी देशों को यह अहसास न था कि रीगन थैचर की नीतियों को अपनाने के बाद विकासशील देशों को कहीं अधिक फायदा मिलेगा। इसका अंदाज न गुन्नार मिर्डल को था और न ही पाल एहरलिख को। एहरलिख ने वर्ष 1968 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'पॉपुलेशन बमÓ में रेखांकित किया कि जनसंख्या पर नियंत्रण किए बिना तीसरी दुनिया के देश आगे नहीं बढ़ सकते। आज एहरलिख और मिर्डल, दोनों ही गलत साबित हो गए हैं। चीन हो या भारत दोनों प्रगति पथ पर आगे बढ़े हैं।
वर्ष 1998 और 2008 के बीच भूमंडलीकरण की गाड़ी बड़ी तेजी से आगे बढ़ी। इसीलिए कई लोग इस काल को भूमंडलीकरण का मुख्य दौर मानते हैं। वर्ष 2008 और 2011 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था आर्थिक संकट से गुजरी फिर भी भूमंडलीकरण की गाड़ी आगे बढ़ती रही। इस दौरान भूमंडलीय मध्य वर्ग का उदय कमोबेश सर्वत्र हुआ। चीन में शहरी आय दुगुनी हो गई और ग्रामीण आय में 80 प्रतिशत की वृद्धि हुई इस नजरिए से देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भूमंडलीय मध्यवर्ग की स्थिति मजबूत हो गई।
वर्ष 2013 में प्रकाशित फोब्र्स की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 1,426 अरबपति थे जिनमें से प्रत्येक की हैसियत एक अरब डालर से अधिक थी। उनकी कुल परिसंपदा 5.4 खरब डालर थी। वर्ष 2013 में प्रकाशित क्रेडिट स्विश रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की कुल परिसंपदा 241 खरब डालर थी। स्पष्ट है कि व्यक्तियों के इस छोटे से समूह का विश्व की दो प्रतिशत विश्व संपदा पर कब्जा है। इस प्रकार अफ्रीका की कुल परिसंपदा से उनके पास दुगुनी परिसंपदा है।
सवाल है कि भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में धनाढ्य लोगों की परिसंपदा में कितना इजाफा हुआ है।
वर्ष 1992 तक फोब्र्स पत्रिका धनवानों की दो पृथक सूचियां प्रकाशित करती रहीं। एक सूची में चार सौ सबसे धनी अमेरिकी शामिल थे और दूसरी सूची में भूमंडलीय अरबपति थे। वर्ष 1987 में अमेरिका में 49 और शेष विश्व में 96 अरबपति थे। इस प्रकार विश्व भर में 145 अरबपति थे जिनके पास 450 अरब डॉलर की परिसंपदा थी। उनकी कुल संपदा 4.5 खरब डालर थी। अत्यंत धनी व्यक्तियों की संख्या और उनकी कुल संपदा में पांच गुनी वृद्धि हुई। 1987 और 2013 के बीच अत्यंत धनी लोगों की जमात में कई लोग आकर शामिल हुए हैं। इस दौरान वास्तविक विश्व के सकल उत्पाद में 2.25 गुनी वृद्धि हुई है और इस प्रकार अत्यंत धनाढ्य लोगों की वास्तविक संपदाओं  में यह बढ़ोतरी कहीं अधिक हुई है। धनकुबेरों की संख्या दुगुनी से अधिक हो गई है। इसके बावजूद इन धनकुबेरों की संख्या काफी छोटी है फिर भी उसमें पांच गुनी वृद्धि हुई है। भूमंडलीय सकल उत्पाद की दृष्टि से उनकी संपदा दो गुनी से भी अधिक बढ़ी है।
देशों के बीच और उनके अंदर आर्थिक विषमता न सिर्फ बढ़ी है बल्कि बढ़ती ही जा रही है। याद रहे कि हमारे देश राष्ट्र-राज्यों में बंटे हुए हैं। इसीलिए इन राष्ट्र-राज्यों के अंदर बढ़ रही विषमता का असर व्यापक होता है। उनकी राजनीति काफी दूर तक प्रभावित होती है। यहां पर हम साइमन कुज्नेत्स का जिक्र कर सकते हैं जिनसे अर्थशास्त्र का हर विद्यार्थी परिचित है। कुज्नेत्स के अनुसार, आर्थिक संवृद्धि की प्रक्रिया आगे बढऩे और उसमें तेजी आने के फलस्वरूप आर्थिक विषमता बढ़ती है परन्तु बाद में उसमें कमी आने लगती है। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और यहां तक कि स्वीडन और जर्मनी जैसे समतामूलक देशों के अनुभव कुजेनत्स की परिकल्पना के विपरीत हैं।
टॉमस पिकेट्टी की हाल में आई पुस्तक 'कैपिटल इन द ट्वेंटी-फस्र्ट सेंचुरी ने कुज्नेत्स का विकल्प प्रस्तुत किया है। उन्होंने बतलाया है कि 1918-1980 के बीच विषमता घटने के क्या कारण थे और उसके बाद उसमें क्यों वृद्धि हुई है। पिकेट्टी के अनुसार, युद्ध की मजबूरी, उसका खर्च पूरा करने के लिए कराधान, समाजवादी विचारधारा का बढ़ता वर्चस्व तथा आर्थिक आय की अपेक्षा मजदूरी की दर में वृद्धि प्रमुख कारण हैं। पिकेट्टी के अनुसार, प्रथम विश्व युद्ध के पहले आर्थिक विषमता बढ़ी फिर उसमें कमी आई। 1850-1880 के दौरान कुज्नेत्स के सिद्धांत के अनुकूल ही विषमता का आचरण रहा। कुज्नेत्स के साथ समस्या है कि वे 1980 के बाद आर्थिक विषमता में वृद्धि की व्याख्या करने में अक्षम हैं। यह काम पिकेट्टी सफलतापूर्वक कर पाते हैं। वे संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन में पिछले सौ वर्षों के दौरान आय की विषमता की समुचित व्याख्या कर पाते हैं। इसके बावजूद पिकेट्टी यह स्पष्ट नहीं कर पाते हैं कि युद्ध एवं राजनीति आंदोलन को छोड़कर वे कौन सी शक्तियां हैं जो पूंजीवाद के अंतर्गत विषमता को बढऩे से रोकती हैं।
बीसवीं शताब्दी में विषमता में कमी आने की दो व्याख्याएं सामने आई हंै। पहली व्याख्या कुज्नेत्स ने दी हैं। उनके अनुसार, इस गिरावट के पीछे अनेक आर्थिक शक्तियां हैं। मसलन जनसंख्या गांवों से शहरों और कृषि क्षेत्र से विनिर्माण क्षेत्र में गई है। पढ़ाई-लिखाई को तरजीह दी गई है। जनसंख्या में बूढ़े लोगों का अनुपात बढऩे से सामाजिक सेवाओं पर खर्च बढ़ा है जिससे धनवानों पर पहले की अपेक्षा कहीं अधिक कर लगाए गए हैं। इतना ही नहीं, शीत युद्ध सहित अन्य युद्धों के संदर्भ में धनवानों पर अपेक्षाकृत अधिक कर लगाए जाते रहे हंै। पिकेट्टी ने वर्ष 2001 में प्रकाशित अपनी फ्रेंच भाषा की पुस्तक में रेखांकित किया है कि दो विश्व युद्धों के परिणामस्वरूप धनवानों पर कर बढऩे के साथ ही उनकी संपदा को काफी नुकसान पहुंचा है। ऐसा खासकर फ्रांस में अधिक देखा गया। स्पष्टतया पूंजी से प्राप्त राजस्व में कमी आई।
वर्ष 1914 और 1980 के बीच विषमता में कमी आने के पीछे अनेक कारण थे। पहला कारण युद्ध था जिसमें काफी संपदा बर्बाद हो गई। दूसरा कारण वामपंथी राजनीति ने संपत्तिवान लोगों के मन में समाजवादी आंदोलन को लेकर खौफ पैदा कर दिया था। फलस्वरूप उन्होंने व्यापक आधार वाले मध्य वर्ग को बढ़ावा दिया। यह बात तुर्की, ब्राजील और दक्षिण कोरिया में भी देखी गई। अमेरिका का रुख विषमता को लेकर काफी बदल गया। उसने तीसरी दुनिया के देशों में भी शिक्षा, कृषि सुधार और कल्याणकारी राज्य पर जोर देना आरंभ किया। उसका ख्याल था कि एक जबर्दस्त मध्यम वर्ग कम्युनिज्म को रोकने में सफल साबित होगा।
इस दौरान सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में परिवर्तन तथा भूमंडलीकरण ने दुनिया की स्थिति में भारी बदलाव ला दिया। साथ ही विनिर्माण के मुकाबले सेवाओं के क्षेत्र में स्वरूप बदला और उसका काफी विस्तार हुआ। वर्ष 1979-80 के बाद सेवाओं के क्षेत्र में विनिर्माण के मुकाबले विषमता तेजी से बढ़ी। इतना ही नहीं, बल्कि सेवाओं के क्षेत्र में उत्पादक इकाइयों का आकार विनिर्माण की तुलना में काफी छोटा था इसलिए मजदूरों को संगठित कर मालिकों से भिड़ पाना काफी कठिन हो गया। इतना ही नहीं, सेवाओं के क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के हित समान ही नहीं बल्कि बहुविध थे इसलिए उनको एक साथ लाना काफी मुश्किल था। संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रिया और जर्मनी में यूनियनों का दबदबा श्रमिकों के बीच काफी तेजी से घट गया। वर्ष 1999 से लेकर 2013 तक के आंकड़े इस तथ्य को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। ओइसीडी देशों के आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि वर्ष 1999 में 21 प्रतिशत श्रमिक यूनियनों के दायरे में थे वहीं 2014 आते-आते उनका प्रतिशत घटकर 17 हो गया। श्रमिक संघों का पराभव सबसे अधिक निजी क्षेत्र में देखा गया। स्पष्ट हो जाएगा कि निजी क्षेत्र में पंूजी के मुकाबले श्रम का दबदबा तेजी से घटा है। भूमंडलीकरण के वर्तमान दौर में उपलब्ध श्रमिकों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। वर्ष 1980 के बाद विश्व की जनसंख्या दो-तिहाई बढ़ी है और चीन समेत अन्य पूर्व कम्युनिस्ट देश विश्व श्रमिक बाजार में आए हैं। विख्यात अर्थशास्त्र राबर्ट सोलो के अनुसार, सारी दुनिया में श्रम की स्थिति पहले के मुकाबले काफी कमजोर हुई और उत्पादन का बड़ा भाग पूंजीपति हड़पने लगे हैं। पूंजी के आवागमन पर पाबंदी काफी ढीली हुई है। अत: पूंजी उन देशों का रुख कर रही है। जहां मजदूरी की दर कम होने के साथ ही श्रम संगठन काफी कमजोर हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निरंतर हो रहे परिवर्तनों ने अनेक लोगों को रोजगार छीन कर अनावश्यक बना दिया है। डाक एवं टेलीफोन के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों ने अनेक लोगों को बेरोजगार कर दिया है। वे दिन लद गए जब पोस्टकार्ड या लिफाफे की कीमतों में चंद पैसे बढऩे पर भारी हो हल्ला मच जाता था। वह दिन दूर नहीं है जब डाक विभाग अनावश्यक हो जाएगा। कहना न होगा कि जिस तेजी से परिवर्तन हो रहा है। उसको देखते हुए हम नहीं कह सकते कि आगे दिनों में दुनिया का क्या स्वरूप होगा।


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