भारत में दिवालियापन का अर्थ

गिरीश मिश्र : कहते हैं कि 19वीं शताब्दी तक भारत में दिवालियापन को लेकर कोई कानून नहीं था। जब कोई व्यापारी दिवालिया हो जाता था तब वह अपने घर के आगे रात में घी का दीया जलाकर लापता हो जाता था। यह दीया उसके दिवालियापन का प्रतीक होता था। जिनसे उसने कर्ज लिया था वे उसके आवास पर कब्जा जमा लेते थे।...

डॉ. गिरीश मिश्र

कहते हैं कि 19वीं शताब्दी तक भारत में दिवालियापन को लेकर कोई कानून नहीं था। जब कोई व्यापारी दिवालिया हो जाता था तब वह अपने घर के आगे रात में घी का दीया जलाकर लापता हो जाता था। यह दीया उसके दिवालियापन का प्रतीक होता था। जिनसे उसने कर्ज लिया था वे उसके आवास पर कब्जा जमा लेते थे।
अन्य अनेक देशों की तरह भारत में कोई ऐसा कानून नहीं है जो व्यवस्थित रूप से दिवालियापन को परिभाषित कर आगे की कार्रवाई के लिए मार्ग प्रशस्त करें। अब तक अदालतें अपनी सूझ-बूझ के आधार पर ही दिवालियापन को परिभाषित करती रही हैं। परिणामस्वरूप विभिन्न परिभाषाओं को लेकर वे एकमत नहीं होती हैं। इसी स्थिति से निबटने के लिए सरकार ने दिवालियापन से जुड़े कानून पर विचार करने के लिए एक समिति गठित की है जिसकी अंतरिम रिपोर्ट सरकार के पास फरवरी में आई है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट को दो भागों में विभाजित किया है। पहले भाग में उसने कंपनियों के दिवालियापन के ऊपर विचार कर अविलंब कार्रवाई के लिए सुझाव दिए हैं। पिछले कुछ वर्षों से भारत में विदेशी निवेश आने से ऐसे कानून बनाने की अहमियत बढ़ गई है।
विश्व बैंक के अनुसार भारत में दिवालियापन से जुड़े विवादों को लेकर काफी लंबा समय किसी नतीजे पर पहुंचने में लगता है। उसका अनुमान है कि औसतन 4.3 वर्ष का समय लग जाता है। चीन जैसे देशों की तुलना में हमारे यहां दुगुना समय लग जाता है। फिर भी प्रति डालर 25.7 सेंट की ही वसूली हो पाती है। मुकदमे में समय और पैसे काफी खर्च होते हैं। विजय माल्या के किंगफिशर एयर लाइन का उदाहरण ले सकते हैं। इस एयर लाइन को बड़े धूमधड़ाके से आंरभ किया गया था। किन्तु वर्ष 2012 आते-आते वह ठप्प हो गया। उस पर 1.5 अरब डॉलर से अधिक की देनदारी थी। जिन बैंकों ने उसे ऋण दिए थे उन्होंने बड़ी मशक्कत के बाद मुंबई स्थित उसके मुख्यालय पर ही कब्जा जमा सके। याद रहे कि लगभग सब ऋण दाता बैंक राष्ट्रीयकृत हैं। पिछले तीन सालों के दौरान अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद बैंक अपने पैसे वसूल कर पाने में असमर्थ रहे हैं। लंदन से प्रकाशित होने वाले 'दी इकॉनामिस्टÓ (21 नवम्बर) के अनुसार सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि देश में कोई समेकित दिवालियापन से जुड़ा कोड नहीं है। इस स्थिति में अलग-अलग अदालतें अपनी समझ के अनुसार दिवालियापन और उसकी परिभाषा करती हैं।
नवम्बर महीने में वित्तमंत्रालय ने दिवालियापन से जुड़े कानूनों पर विचार कर एकमत बनाने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया। कहा गया कि 180 दिनों के भीतर किसी भी रुग्ण फर्म के भविष्य के बारे में फैसला किया जाना चाहिए। यदि लेनदारों की सहमति हो तो इस समय सीमा को 90 दिनों तक और बढ़ाया जा सकता है। एक कानूनी फर्म से जुड़े बहराम वकील जो मंत्रालय को कानूनी सलाह देते हैं, उनके अनुसार इस समय सीमा को बढ़ाया जा सकता है। कोई भी लेनदार तब तक समय पर पैसा नहीं चुकाने वाले के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकता जब तक पुनर्भुगतान की योजना प्रस्तुत न की जाय। कहना न होगा कि पुनर्भुगतान तीन से लेकर दस वर्षों तक किया जा सकता है।
इस दौरान रुग्ण फर्मों के ऊपर उनके पुराने मालिकों का ही कब्जा बना रहेगा। कानूनी कार्रवाई का अंतिम परिणाम आने तक पुराने मालिक उनकी परिसंपत्तियों का इस्तेमाल बेरोक-टोक करते रहेंगे। इस दौरान यदि परिसंपत्तियों में कमी आती है तो उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। आए दिन पुराने मालिक अपने किसी रिश्तेदार के नाम से नई कंपनी स्थापित कर पुरानी कंपनियों की परिसंपत्तियों को उसमें हस्तांतरित कर सकते हैं। ऐसा करने पर कोई रोक-टोक नहीं है।
सरकार द्वारा वर्तमान स्थिति से निबटने के लिए एक सुस्पष्ट नीति अपनाई जाने की कोशिश की जा रही है। रुग्ण फर्मों की ओर से सरकारी संस्था बोर्ड फर्मों इंडस्ट्रियल एवं फाइनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन के सामने अपनी समस्याओं को रखना पड़ता है। यह संस्था तब तक कोई कार्रवाई नहीं करेगी जब तक फर्म अपनी 50 प्रतिशत परिसंपत्ति गंवा न बैठे। तब तक सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। कुछ लोगों का मानना है कि सरकार को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए नहीं तो तब तक काफी देर हो जाएगी। फर्म की पुनर्संरचना के लिए कदम उठाने की जरूरत है।
सरकार द्वारा प्रस्तावित कानून के तहत कहीं अधिक रुग्ण फर्मों को फिर से जिन्दा किया जा सकता है। इससे राष्ट्रीयकृत बैंकों का भी भला होगा क्योंकि वर्ष 2011 से अब तक उनके 133 डॉलर रुग्ण फर्मों में फंसे हुए हैं। यदि समय पर कदम उठाया गया तो वे अपने पैसे निकाल सकेंगे। देखना होगा कि क्या भारतीय जनता पार्टी की सरकार की कोई दिलचस्पी है। आरंभ से ही भाजपा का बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रति दृष्टिकोण मैत्रीपूर्ण नहीं रहा है। याद करें उस समय को जब श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा बैंक राष्ट्रीयकरण को लेकर उन्हें घोर विरोध का सामना करना पड़ा था। जनसंघ के तत्कालीन नेता बलराज मधोक सुप्रीम कोर्ट भी गए थे।
तत्काल वर्ष 1985 में बना कानून ही रुग्ण औद्योगिक कंपनियों की ओर ध्यान देता है मगर उसके बने हुए तीस वर्ष हो गए हैं। तब से लेकर अब तक देश में काफी परिर्वतन हो गए हैं। वर्ष 1990 के बाद विदेशी निवेश के मार्ग में आने वाली रुकावटों को दूरकर विदेशी कंपनियों के आने का मार्ग प्रशस्त कर दिया गया है। अब प्रश्न है कि कंपनियों कों कैसे लाभप्रद बनाया जाय। कंपनी का प्रबंधन वित्तीय स्थिति पर निरंतर निगाह रखें और ज्यों ही वित्तीय परेशानी बढऩे के लक्षण न•ार आए त्यों ही कंपनी की मुनाफादायकता को बरकरार रखने की दिशा में कार्रवाई की जाय। कंपनी का प्रबंधन वित्तीय कठिनाईयों के प्रकट होते ही ऋणदाताओं के साथ मिलकर कदम उठाए। यदि स्थिति सुधरने के लक्षण न दिखें तो कंपनी को समाप्त करने का निर्णय लिया जा सकता है।
कानून के अनुसार एकल स्वामित्व और साझेदारी के अंतर्गत चल रही और साझेदारी के अंतर्गत चल रही कंपनियां सीमित देनदारियों वाली कंपनियों से भिन्न हैं। एकल स्वामित्व और साझेदारी में चल रही कंपनियों का अस्तित्व स्थायी नहीं होता। स्वामी की वित्तीय स्थिति बिगडऩे के बाद एकल स्वामित्व वाली कंपनी का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार किसी साझेदार के अलग हो जाने के बाद साझेदारी के अंतर्गत चल रही कंपनी समाप्त हो जाती है। केवल सीमित देनदारियों वाली कंपनियां ही चलती रहती हैं क्योंकि उनमें शामिल शेयर धारकों की देनदारियां उनके शेयरों की रकम तक ही सीमित रहती है। कंपनी की अपनी हस्ती होती है।
कंपनियों की स्थिति खराब होने पर शेयरधारकों, ऋणदाताओं, कर्मचारियों, आपूर्तिकर्ताओं, और ग्राहकों पर बुरा असर पड़ता है। साथ ही अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। अन्य धंधों और काराबोर पर भी असर पड़ता है। आवश्यकता है कि एक अत्यंत कुशल कारपोरेट दिवालियापन की व्यवस्था हो जो सक्षम और अक्षम कंपनियों के बीच फर्क करे। अक्षम कंपनियों को समाप्त कर दिया जाय जिससे अर्थव्यवस्था पर बुरा असर नहीं पड़े। दिवालियापन से जुड़े कानून को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:- 1. ऋणदाताओं के हितों का ध्यान रखना चाहिए और उनको घाटा न हो इस बात का ख्याल रखना होगा; 2. संसाधनों के कुशल आबंटन के जरिए आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए; 3. उधार से जुड़े बाजार का विकास हो;  4. कंपनी के कर्मचारियों और शेयर-धारकों के हितों की रक्षा होनी चाहिए; 5. कंपनी में निवेशकों का विश्वास बना रहे।
दिवालिएपन से जुड़े कानून को कंपनी से जुड़े सभी लोगों के हितों का पूरी तरह ध्यान रखना चाहिए। किसी पर भी अधिक जोखिम नहीं डाला जाना चाहिए।
विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय कारपोरेशन ने 'डुइंग बिजिनेसÓ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। जिसमें ग्यारह क्षेत्रों में व्यवसाय पर ध्यान दिया गया है। उपर्युक्त रिपोर्ट के ताजा संस्करण में 180 देशों पर दिवालियापन को लेकर विचार किया गया है। इनमें भारत का स्थान 137वां है। कहा गया है कि भारत में दिवालियापन से जुड़ा कानून व्यवहार में प्रभावकारी सिद्ध नहीं हुआ है। दिवालियापन से जुड़े अधिकारी कोर्ट और ट्रिब्यूनल्स कारगर साबित नहीं हुए हैं। इसके लिए अनेक कारण गिनाए गए हैं। कहते हैं कि जब तक इन पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक कोई भी कानून कारगर नहीं हो सकेगा। लगता  है कि कोई भी दिवालियापन संबंधी कानून को कारगर बनाने को उत्सुक नहीं है। जरूरत है कि कानून में बदलाव लाकर दिवालियापन से जूझने और वांछित परिणामों को प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रशस्त किया जाय।
इस बात को लेकर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए कि कब और किन परिस्थतियों में किसी ऋण के बोझ से दबी कंपनी को पुनर्जीवित किया जाय या फिर उसके अस्तित्व को समाप्त होने दिया जाय। किसी कंपनी के दिवालिया होने की स्थिति में उसके प्रबंधन की क्षमता पर भी विचार किया जाना चाहिए।


 

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