भारत में इस्लामिक बैंकिंग

सुभाष गाताडे : भारत में जल्द ही ‘इस्लामिक बैंकिंग’ की शुरुआत होगी, इस मसले पर अधिक बहस नहीं हो सकी है। मालूम हो कि सऊदी अरब स्थित इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक /आईडीबी/ अपने कामों की शुरुआत गुजरात के अहमदाबाद से करेगी। ...

सुभाष गाताड़े

भारत में जल्द ही ‘इस्लामिक बैंकिंग’ की शुरुआत होगी, इस मसले पर अधिक बहस नहीं हो सकी है। मालूम हो कि सऊदी अरब स्थित इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक /आईडीबी/ अपने कामों की शुरुआत गुजरात के अहमदाबाद से करेगी। आप कह सकते हैं कि अप्रैल माह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सऊदी अरब की यात्रा यह एक हासिल है। उनके साथ गए शिष्टमंडल ने इसे लेकर एक विस्तृत करारनामा बैंक के साथ किया है। इस बात पर भी सहमति हुई है कि भारत की राज्य मिल्कियत वाली ‘एक्जिम बैंक’ उसे 100 मिलियन डॉलर का कर्जा देगी ताकि वह आईडीबी के अन्य सदस्य मुल्कों में वह निर्यात कर सके, इतना ही नहीं, इस्लामिक डेवलपमेण्ट बैंक ने भारत के ग्रामीण गरीबों को चिकित्सकीय सहायता प्रदान करने के लिए 55 मिलियन डॉलर सहायता देने की घोषणा की है जिसके तहत मेडिकल वैन्स दिए जाएंगे।
मालूम हो कि जनवरी माह में रिजर्व बैंक ने शरिया अनुकूल सूदविहीन या इस्लामिक बैंकिंग की शुरुआत के लिए अपनी हरी झण्डी दिखाई है। ‘मिडियम टर्म पाथ फार फाइनेंशियल इन्क्लुजन’ के नाम पर बनी आरबीआई की कमेटी ने- जिसकी अगुआई दीपक मोहन्ती ने की थी- उसने पारम्पारिक बैंकों में भी ‘सूदहीन खिड़कियां’ खोलने की सिफारिश की थी। कहा गया था कि इससे न केवल अर्थव्यवस्था में गति आएगी बल्कि वह ‘वित्तीय समावेशन’ को भी बढ़ावा देगा। आकलन किया गया था कि वर्ष 2015 में कुल इस्लामिक वित्तीय परिसम्पत्तियां 2 टिलियन के करीब थीं जो एक दशक के दौरान दस गुना बढ़ी थीं और तमाम मुल्कों ‘पारम्पारिक वित्तसंसाधनों’ की तुलना में तेज गति से बढ़ रही थीं।
प्रश्न उठता है अन्य बैंकों से इस्लामिक बैंक को किस मामले में अलग समझे जाते हैं? दरअसल इस्लामिक बैंक अलग-अलग वित्तीय उत्पाद ऑफर करते हैं जैसे सुकूक बाण्ड या इक्विटी फंड, जहां सूद नहीं लिया जाता क्योंकि इस्लाम में सूदखोरी पर प्रतिबंध है। निवेश पर आधारित परिसम्पत्तियों के परफार्मंस के आधार पर ही उनका निपटारा किया जाता है, जिसमें मुनाफा और घाटा, दोनों साझा किया जाता है। ऐसी आर्थिक गतिविधि जो ‘पाप’ समझी जाती है, जैसे सट्टेबाजी या अल्कोहल तथा अन्य नशीली चीजों में, इसमें इस पैसे का निवेश नहीं किया जाता है। जैसे कि उम्मीद की जा सकती है कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड तथा मुस्लिम हितों के लिए सक्रिय संगठनों, नेताओं ने इस घोषणा का स्वागत किया है।
दिलचस्प है कि पिछली सरकार के दिनों में शरिया अनुकूल फण्ड के लिए रिजर्व बैंक ने अनुमति दी थी, मगर उसने विशुद्ध इस्लामिक बैंकिंग के लिए रजामंदी नहीं दी थी। उसके द्वारा तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक एक ऐसी प्रणाली जिसमें सूद को लिया-दिया नहीं जाता है, वह अस्तित्वमान कानूनों से मेल नहीं खाती है। रिजर्व बैंक का मानना था कि भारत में बैंकों के संचालन के लिए बैंकों को कर्ज लेने पड़ते हैं, जिस पर उन्हें सूद देना पड़ता है। इसके अलावा बैंकों को रिजर्व बैंक के पास ‘कैश रिजर्व रेशो’ के तहत नगदी जमा करनी पड़ती है, जिस पर उन्हें सूद मिलता है। इसी वजह से बैंक ने सरकार को सलाह दी थी कि अगर इस्लामिक बैंकिंग को अनुमति देनी हो तो उसे इसी के अनुरूप विधेयक लाना पड़ेगा। अब उपरोल्लेखित दीपक मोहन्ती रिपोर्ट को पलटें तो यही कहा जा सकता है कि आरबीआई ने अपना रुख बदला है।
इसके पहले कि हम इस्लामिक बैंकिंग की अधिक विवेचना करें यह समझना जरूरी है कि इसे हम दरअसल इस्लाम के अन्दर हावी होती रूढि़वादी धारा का परिणाम कह सकते हैं कि विगत दो-तीन दशकों से ही फिजां बदल रही है। याद करें कि ब्रिटिशों के आगमन के बाद -जब भारत में आधुनिक बैंक प्रणाली की नींव पड़ी- तब उसे लेकर किन्हीं आलिमों ने यह नहीं कहा था कि यह विकसित हो रही व्यवस्था इस्लाम के खिलाफ है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद हों या इस्लाम के अन्य विद्वतजन इसी बात के हिमायती थे। यहां तक कि भारतीय उपमहाद्वीप का उलेमा समुदाय भी इसी नजरिये का था कि बैंक से दिया जाने वाला सूद और कुरान में वर्णित ‘रिबा’ अर्थात् बड़े महाजनों द्वारा वसूले जाने वाला भारी भरकम सूद में कोई सम्बन्ध नहीं है। जनता के मन में इसे लेकर पैदा विभ्रम को दूर करने के लिए इस मामले में फतवे भी जारी किए थे।
दूसरी अहम् बात यह है कि अधिकतर मुस्लिमबहुल देशों में भी भले ही इस प्रणाली को महज प्रतीकात्मक तौर पर शुरु किया गया है , उनकी बैंक प्रणाली की मुख्यधारा बैंकिंग के आम नियमों से ही संचालित होती है। यहां तक कि अपने पेटोडॉलर के बलबूते अपने यहां के अधिक कट्टर वहाबी इस्लाम को दुनिया भर में फैलाने में तत्पर सऊदी अरब के बैंक भी सूद की लेन-देन से ही संचालित होते हैं। सऊदी बैंक एक तरह से अपने इस काम को वैधता देने के लिए ‘सूद’ के बजाय ‘मुनाफा और घाटे’ में सांझापन की बात करते हैं।
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का उदाहरण काबिलेगौर है, जहां जब अस्सी के दशक में जब इस्लामीकरण की बढ़ती प्रक्रिया में सूद आधारित बैंक प्रणाली को शरिया आधारित बैंक प्रणाली से पुनस्र्थापित करने की बात चली तब आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक नजीर बना। न्यायमूर्ति वजीहुददीन अहमद ने सूद आधारित आधुनिक बैंक प्रणाली की हिमायत करते हुए स्पष्ट कहा कि  अगर शरिया आधारित बैंकों को बढ़ावा दिया गया तो देश की अर्थव्यवस्था के पास अपने कर्जे चुकाने के लिए पैसे नहीं होंगे। (पीएलडी 2000, सुप्रीम कोर्ट 780-1, ‘मेनस्टीम’ के लेख में उद्धृत)।
‘जैसा कि सभी जानते हैं कि विदेशी सरकारों एवं अन्तरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति पाकिस्तान की देनदारी कई बिलियन डॉलरों की है। इस देनदारी के ऐवज में सरकार को समय-समय पर भुगतान करना पड़ता है। चूंकि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी नहीं है कि सरकार खुद अपने संसाधनों से इसे चुकता करे, इसके अलावा भी सरकार को समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर्जे की जरूरत पड़ती है।...अगर इस पुनर्भुगतान में गड़बड़ी हुई तो पाकिस्तान को अन्तरराष्ट्रीय बाजार में दिवालिया घोषित किया जाएगा।’
पाकिस्तानी विश्लेषक मोहम्मद फारूक ने ‘मेनस्टीम’ नामक अंग्रेजी पत्रिका में 10 मार्च 2012 में अपने आलेख ‘इस्लामिक बैंकिग- एन एनेथेमा टू पाकिस्तानी डेमोक्रेसी’ में इस पर रौशनी डाली थी। उनके मुताबिक ‘सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के पहले ऐसा नहीं था कि जिया उल हक के संक्षिप्त दौर को छोड़ दें तो पाकिस्तानी बैंक प्रणाली मुख्यधारा के अनुकूल नहीं थी। पाकिस्तान के निर्माण के बाद ही उसके संस्थापक जिन्ना ने खुली बैंकिंग प्रणाली की हिमायत की थी... उनकी अन्तिम इच्छा थी कि पाकिस्तान में सेन्ट्रल बैंक ऑफ पाकिस्तान की तरह कोई नियामक हो और उनका अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम था स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का उद्घाटन।’
प्रश्न उठता है कि एक ऐसी योजना, जिस पर खुद इस्लामिक देशों में भी प्रश्नचिन्ह खड़े किए गए हों, उसकी नए सिरे से पड़ताल की आवश्यकता है या नहीं। निश्चित ही है, यह समझने की जरूरत है कि एक ऐसे मुल्क में जहां गैरमुस्लिमों का बहुमत है, जहां मुसलमानों की माली हालत एक समुदाय के तौर पर बहुत खराब है, जो अपने से किसी बैंकिंग प्रणाली को मजबूत आधार नहीं दे सकते, वहां ऐसी कोई भी योजना पहले से अलगाव में पड़े अल्पसंख्यक समुदाय के अलगाव को और बढ़ावा देगी।
दूसरे, चूंकि इस्लामिक बैंक में निवेश से आम बैंकों की तरह सूद नहीं मिलता है, मुनाफा और घाटा दोनों साझा करने की बात होती है, लिहाजा इसका असर यही होगा कि मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा जो अन्य बैंकों के बजाय ऐसे में निवेश करेगा तो उसे अपनी मेेहनत की कमाई में वाजिब बढ़ोतरी का लाभ भी नहीं मिलेगा।
तीसरे, ऐसी कोई योजना जो किसी खास सम्प्रदाय की आस्था सम्बन्धी मान्यताओं की बुनियाद पर शुरु की जा रही हो, वह धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी मूल्यों के प्रति एक समझौता होगी, जो दूरगामी तौर पर अधिक समस्याओं को जनम देगा।


 

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