भारत को मिली कूटनीतिक सफलता

डॉ. गौरीशंकर राजहंस इसमें कोई संदेह नहीं कि वैदेशिक और कूटनीतिक मामलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक के बाद दूसरी सफलता मिल रही है। नरेन्द्र मेादी ने शुरू से ही इस बात का आकलन कर लिया था कि भारत का हित पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाने में है। इसीलिये उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में 'सार्कÓ देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों को आमंत्रित किया था। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

इसमें कोई संदेह नहीं कि वैदेशिक और कूटनीतिक मामलों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक के बाद दूसरी सफलता मिल रही है। नरेन्द्र मेादी ने शुरू से ही इस बात का आकलन कर लिया था कि भारत का हित पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाने में है। इसीलिये उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में 'सार्कÓ देशों के राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों को आमंत्रित किया था। फिर नेपाल, भूटान और म्यांमार का राजकीय दौरा किया था और इन देशों को जहां चीन का प्रभुत्व बढ़ रहा था, नरेन्द्र मोदी ने भरोसा दिलाया कि भारत हर हालत में उनके साथ है। चीन को नरेन्द्र मोदी का अभियान नि:संदेह बहुत ही नागवार गुजरा। परन्तु नरेन्द्र मोदी और भारत सरकार ने इसकी जरा भी परवाह नहीं की। उसके बाद नरेन्द्र मोदी ने यह फैसला लिया कि हिन्द महासागर के देश मालदीव, सेशल्स, मॉरिशस और श्रीलंका का दौरा किया जाए। अंतिम घड़ी में उन्होंने मालदीव का दौरा रद्द कर दिया।
कारण कि मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को जिस तरह पुलिस घसीटकर उन्हें कोर्ट लाई और पीटकर जेल में बंद कर दिया। वह संसार के सभी टीवी चैनलों पर दिखाया गया और पश्चिम के सभी समाचारपत्रों में पुलिस द्वारा जमीन पर घसीटते हुए मोहम्मद नशीद के फोटो प्रकाशित किए गए। पूर्व राष्ट्रपति और लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए जनता के प्रतिनिधि और प्रतिपक्ष के नेता को पुलिस इस तरह घसीटकर ले जाए और जेल में बंद कर दे इसे संसार का कोई भी लोकतांत्रिक देश बर्दाश्त नहीं कर सकता है।
मालदीव हिन्द महासागर में अनेक द्वीप समूहों का एक मिलाजुला देश है। भारत के साथ उसके संबंध पिछले अनेक वर्षों से बहुत मधुर रहे हैं।  नशीद के साथ वहां के वर्तमान शासकों ने जो व्यवहार किया है उसकी निन्दा सारे संसार में हुई है। पश्चिम के समाचारपत्रों ने यह जोर देकर लिखा है कि मालदीव को कॉनवैल्थ से बाहर कर देना चाहिये और उस देश की सरकार के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगाया जाना चाहिये। सारे संसार के मीडिया ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए भूरि भूरि प्रशंसा की कि उन्होंने दो टूक कह दिया कि नशीद के साथ जो दुव्र्यवहार हुआ उसे भारत बर्दाश्त नहीं करेगा और उचित यह होगा कि मालदीव में फिर से चुनाव हो और वहां एक लोकतांत्रिक सरकार का गठन हो। परन्तु सेशल्स, मॉरिशस और श्रीलंका का प्रधानमंत्री ने जो दौरा किया उसमें उन्हें अभूतपूर्व सफलता मिली। इन तीनों देशों के साथ आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक समझौते हुए। भारत और सेशल्स के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग पर महत्वपूर्ण समझौता हुआ। भारत ने सेशल्स को भरोसा दिलाया कि सुरक्षा के मामले में भारत हमेशा सेशल्स के साथ रहेगा। परन्तु सबसे महत्वपूर्ण दौरा मॉरीशस और श्रीलंका का रहा।
मॉरिशस और भारत का संबंध 100 वर्ष से अधिक पुराना है। प्राय: 100 वर्ष पहले पानी के जहाजों में लादकर अंग्रेज बिहार और उत्तर प्रदेश से हजारों की संख्या में मजदूरों को मॉरिशस गन्ने की खेती कराने के लिए ले गये थे। अंग्रेजों ने अपने अनुभव से पाया था कि ये मजदूर गन्ने की खेती में माहिर हैं। अनेक वर्षों तक बहुत ही कठिन परिस्थितियों में ये मजदूर मॉरिशस के खेतों में 14 से 16 घंटे तक प्रतिदिन काम करते थे। कालान्तर में अधिकतर मजदूर वहीं बस गये और आज उनके वंशज अत्यन्त ही सुखी संपन्न हैं। अनेक लोग तो वहां के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री भी बने। अनेक सांसद बने और दूसरे लोग बहुत ही महत्वूपर्ण पदों पर आज भी विराजमान हैं। नरेन्द्र मोदी ने मॉरिशस के साथ सांस्कृतिक संबंधों को फिर से मजबूत करने का प्रयास किया। वहां के प्रसिद्ध 'गंगा तालाबÓ में गंगोत्री से लाया गया गंगा जल अर्पित किया और गंगा तालाब को श्रद्धापूर्वक नमन करके मॉरिशस के देशवासियों का दिल जीत लिया। उन्होंने भारत और मॉरिशस के बीच पर्यटन बढ़ाने का भी संकल्प किया।
परन्तु नरेन्द्र मोदी की सबसे अधिक सफल यात्रा श्रीलंका की हुई। राजीव गांधी के बाद नरेन्द्र मोदी ही ऐसे प्रधानमंत्री हुए जिन्होंने 28 वर्षों के बाद श्रीलंका की यात्रा की। उनकी यात्रा के पहले भारत और पश्चिमी देशों के मीडिया में ये खबरें आ रही थीं कि यह यात्रा सफल नहीं होगी। क्योंकि श्रीलंका के प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने भारतीय मछुआरों के बारे में यह बयान दिया था कि यदि उन्होंने समुद्री सीमा को लांघा तो उन्हें गोली मार दी जाएगी। इस तरह के कटु बयान के बाद भी नरेन्द्र मोदी श्रीलंका गए और आश्चर्य की बात यह है कि हवाई अड्डे पर उनका स्वागत करने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे आए थे। श्रीलंका के नये राष्ट्रपति मैत्रीपाल शिरिसेना के साथ नरेन्द्र मोदी की शुरू से ही गहरी दोस्ती हो गई थी। शिरिसेना राष्ट्रपति होने के बाद सबसे पहले भारत के दौरे पर आए थे और ऐसा लगता था कि भारत और श्रीलंका के संबंधों में जो हाल के वर्षों में कटुता आ गई थी उसे दोनों नेताओं ने मिल बैठकर विस्तार से बात करके सुलझा लिया था।
श्रीलंका की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां तमिल और सिंहली निवासियों में आपस में घोर कटुता है। भारत में कम लोगों को पता है कि सिंहली और तमिल दोनों कालांतर में भारत से ही गये हैं। सम्राट अशोक के समय में उनकी पुत्री के नेतृत्व में हजारों बौद्ध भिक्षु नावों में सवार होकर श्रीलंका गये थे और कालान्तर में वे वहीं रह गये। वे ही 'सिंहलीÓ कहलाए। अंग्रेजों ने जब श्रीलंका पर कब्जा किया तब चाय की खेती के लिए वे दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु से हजारों तमिलों को श्रीलंका ले गये जो मुख्यत: उत्तरी श्रीलंका के जाफना प्रान्त में रह रहे हैं। अंग्रेजों के निकल जाने के बाद सिंहलियों ने तमिल जनता को तंग करना शुरू कर दिया। उन्हें द्वितीय दर्जे का नागरिक बनाया। उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मुहैया नहीं कराई और सेना या सरकारी नौकरी में तमिलों को जगह नहीं मिली। इस भेदभाव के खिलाफ प्रभाकरण ने लिट्टे नामक एक आतंकवादी संगठन बनाया। वर्षों तक 'लिट्टेÓ और श्रीलंका की फौज के बीच युद्ध चलता रहा। अंत में प्रभाकरण मारा गया। श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति राजपक्षे ने यह वायदा किया था कि वे तमिलों के साथ न्याय करेंगे और उन्हें वही अधिकार दिलायेंगे जो सिंहलियों को प्राप्त हैं। परन्तु वे अपने वायदे से मुकर गये और तमिलों का शोषण जारी रहा। समाज के सभी वर्गों में राजपक्षे के भाई-भतीजावाद के खिलाफ विद्रोह होने लगा और अन्त में सभी राजनीतिक दलों ने इक_ा होकर शिरिसेना को चुनाव में जिता दिया। इस तरह श्रीलंका के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ।
कोलम्बो और जाफना में भी नरेन्द्र मोदी ने कहा कि समाज के सभी वर्गों के साथ न्याय होना चाहिये। उनके कहने का अर्थ था कि तमिलों की जो उपेक्षा हो रही है वह समाप्त की जानी चाहिये। वे पहले प्रधानमंत्री हैं जो तमिल बाहुल्य क्षेत्र 'जाफनाÓ गये। वहां उन्होंने युद्ध में बेघर हुए तमिलों के लिए 27 हजार मकान इन युद्ध पीडि़तों को सौंपा। इन भवनों का निर्माण भारत ने कराया है। उन्होंने भारत की ओर से बनाये जाने वाले सांस्कृतिक केन्द्र का भी शिलान्यास किया। प्रधानमंत्री ने श्रीलंका की प्राचीन राजधानी अनुराधापुर में महाबौद्धि वृक्ष की पूजा अर्चना की। मान्यता है कि सम्राट अशोक की पुत्री राजकुमारी संघमित्रा ने बौद्ध गया स्थिति महाबौधि वृक्ष की एक शाखा यहां लगाई थी। तमिल महिलाओं ने परंपरागत गीतों के साथ आरती उतारकर नरेन्द्र मोदी का स्वागत किया। दोनों देशों के बीच जो समझौते हुए उनके अनुसार टूरिस्ट वीजा में छूट दी गई। सीमा शुल्क में पारस्परिक सहयोग का निर्णय किया गया। यह भी निर्णय हुआ कि एयर इंडिया शीघ्र ही दिल्ली से कोलम्बो सीधी उड़ान भरेगी। इसके अतिरिक्त श्रीलंका में रामायण ट्रेलाÓ बनेगी और भारत में 'बौद्ध सर्किटÓ बनेगा। इससे निश्चित रूप से दोनों के बीच सांस्कृतिक संबंध बढ़ेंगे।
कुल मिलाकर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हिन्द महासागर में स्थित इन सारे द्वीप देशों का दौरा कर नरेन्द्र मोदी ने भारत की कूटनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा है जिसका लाभ भारत को वर्षों तक मिलेगा।
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख

क्या महिलाओं को शांति से जीने का अधिकार नहीं है