भारत-अमेरिका की मजबूत होती मित्रता से चिढ़

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : इसमें कोई संदेह नहीं कि कूटनीति के क्षेत्र में गत दो वर्षों में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभूतपूर्व सफलता पाई है। अभी-अभी उन्होंने पांच देशों का सफलतापूर्वक दौरा किया। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

इसमें कोई संदेह नहीं कि कूटनीति के क्षेत्र में गत दो वर्षों में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभूतपूर्व सफलता पाई है। अभी-अभी उन्होंने पांच देशों का सफलतापूर्वक दौरा किया। सबसे अधिक सफलता तो उन्हें अमेरिका में मिली जहां राष्ट्रपति ओबामा ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अमेरिका भारत को ‘एनएसजी’ और ‘एमटीसीआर’ का सदस्य बनाने में भरपूर मदद करेगा। अमेरिका ने यह भी भरोसा दिलाया है कि भारत जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य निश्चय ही बनना चाहिये और इसके लिए वह हर संभव प्रयास करेगा।
 भारत और अमेरिका की बढ़ती हुई यह मित्रता चीन और पाकिस्तान को फूटी आंखों नहीं सुहा रही है। चीन तो भारत को एशिया में अपना सबसे कट्टर दुश्मन समझता है। यद्यपि ऊपर से मित्रता का ढोंग रचाता है। उसने जानबूझ कर भारत के खिलाफ पाकिस्तान को भरपूर आर्थिक और सामरिक मदद की है। अब यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो गई है कि यदि चीन ने पाकिस्तान की मदद नहीं की होती तो पाकिस्तान परमाणु हथियार नहीं बना पाता।
जब से यह बात भारत और अमेरिका के संयुक्त वक्तव्य में आई कि अमेरिका ‘एनएसजी’ में भारत की मदद करेगा। चीन चिढ़ गया और उसने कहा कि अब तो पाकिस्तान को भी ‘एनएसजी’ का सदस्य बनना चाहिये। पाकिस्तान के विदेशी मामलों के शीर्ष सलाहकार सरताज अजीज ने सार्वजनिक तौर से कहा कि ‘एनएसजी’ की सदस्यता के लिए पाकिस्तान भारत से अधिक सक्षम और विश्वसनीय है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने भारत के ठीक बाद पूरे दस्तावेज पेश कर दिये हैं और कोई कारण नहीं है कि पाकिस्तान को ‘एनएसजी’ की सदस्यता हासिल नहीं हो। इस मामले में चीन पाकिस्तान की पीठ थपथपा रहा है। पाकिस्तान को ‘एनएसजी’ की सदस्यता मिल पाएगी या नहीं यह कहना कठिन है। परन्तु चीन भारत के रास्ते में भरपूर रोड़े अटकाएगा।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में जिस तरह चीन की दादागिरी बढ़ रही थी उससे दक्षिण-पूर्व एशिया के देश तथा पूर्व एशिया का देश जापान बुरी तरह त्रस्त था। भारत भी चीन की दादागिरी से तंग आ गया था। भारत के प्रधानमंत्री ने कई बार कहा कि ‘चाइना सी’ में समुद्री जहाजों का आवागमन बिना किसी रोकटोक होना चाहिये। परन्तु चीन इस बात को मानने को तैयार ही नहीं है। दक्षिण-पूर्व एशिया के देश चीन से भयभीत थे। इसलिए उसकी मनमानी को रोकने में समर्थ नहीं थे। परन्तु अब अमेरिका और भारत ने यह ऐलान कर दिया है कि एशिया-प्रशांत क्षेेत्र में इन दोनों देशों के सामरिक हित समान रहेंगे और दोनों देश सामरिक मामलों में एक-दूसरे की भरपूर मदद करेंगे। यह जानकर चीन बौखला गया है। चीन ने तो भारत को परेशान करने का हर संभव प्रयास किया है और हिन्द महासागर के देश जैसे बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, मालद्वीप और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर लिया है और उन्हें इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में भरपूर सहायता देकर उन्हें अपने प्रभुत्व में लाने का प्रयास कर रहा है। यही नहीं, इस क्षेत्र में पडऩे वाले देशों को एकजुट करके चीन ने भारत को हर तरह से परेशान करने का प्रयास किया है। अब तो वह नेपाल के भी भारत के खिलाफ कर रहा है।
सच कहा जाए तो चीन कभी भी भारत का दोस्त नहीं रहा। हमारा यह दुर्भाग्य है कि शुरू से ही हमने चीन की दुष्ट मनसा को नहीं समझा। भावना में बहकर हमने यही सोचा कि चीन भी भारत की तरह पश्चिमी देशों का सताया हुआ देश है। अत: आ•ाादी के बाद चीन और भारत गहरे मित्र हो जाएंगे। परन्तु चीन की नीयत में खोट था। उसने हमेशा से भारत को अपना शत्रु समझा और दोस्ती की आड़ में 1962 में भारत पर चढ़ाई कर दी। भारत अब सैनिक दृष्टि से भी मजबूत हो रहा है। इससे पड़ोसी देशों को भारत की क्षमता में विश्वास हो रहा है और वे अब चीन से उस प्रकार नहीं डरेंगे जैसे पहले डरते थे। चीन इस बात को अच्छी तरह समझता है। इसलिए भारत को तंग करने के लिए उसने पाकिस्तान की हर तरह से सहायता शुरू कर दी है। यहां तक कि पाक अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान के आतंकवादियों को वह सैन्य ट्रेनिंग दे रहा है। भारत ने इसका घोर विरोध किया है और कहा है कि पाक अधिकृत कश्मीर तो भारत का ही अंग है। चीन उसमें दखलंदाजी नहीं कर सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अभूतपूर्व सफलता मिली है। परन्तु हमें सावधान रहने की आवश्यकता है। क्योंकि चीन कभी भी कहीं भी खुराफात कर सकता है। यही नहीं, चीन हाल के वर्षों में रूस से अपने संबंध मजबूत कर रहा है। यह भारत के लिए चिन्ता का विषय है। क्योंकि रूस सदा से भारत का निकटतम मित्र रहा है। हमें रूस को बताना होगा कि हमारी मित्रता अमेरिका से चाहे जितनी मजबूत हो, हम रूस की मित्रता को कभी नहीं भूलेंगे और रूस के साथ रक्षा के मामले में पहले जिस तरह का सहयोग हो रहा था वह कायम रहेगा। आशा की जानी चािहये कि रूस हमारी बातों को अच्छी तरह समझेगा।
एक बात स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एशिया की राजनीति ने करवट बदली है। विपक्षी दलों को इस अवसर पर नरेन्द्र मोदी की आलोचना नहीं करनी चाहिए बल्कि उन्हें पूरा समर्थन देना चाहिए। तभी संसार में भारत का सिर ऊंचा रहेगा।
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)


 

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