भगाणा बलात्कार कांड: मीडिया के समक्ष चुनौती

पूर्व न्यायमूर्ति के उपरोक्त कथन के बाद मीडिया से उम्मीद थी कि वह भगाणा जैसे बलात्कार कांड की अनदेखी नहीं करेगी, पर वैसा हो गया,जबकि इस घटना को हाईलाईट करना उसका अत्याज्य कर्तव्य बनता था। क्योंकि यह घटना निर्भयाकांड से ज्यादा गुरुतर है। कारण, दिल्ली गैंगरेप के पीछे यौनकुंठा प्रधानकारक रही, जबकि भगाणा बलात्कारकांड को अंजाम देने वाले लोग सिर्फ यौन कुंठा के शिकार नहीं हैं। वे ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर एक उभरते समाज का मनोबल तोडऩे तथा अपने टूटते प्रभुत्व को स्थापित करने का मनोवैज्ञानिक सुख लूटते हैं। ...

एच.एल. दुसाध

2012 की सर्दियों के बाद एक बार फिर राष्ट्रीय राजधानी बलात्कार के विरुद्ध मुखर है। लेकिन तब और अब में काफी फर्क है। तब दिल्ली में एक पैरा मेडिकल छात्रा के साथ 16 दिसंबर की रात चलती बस में दुष्कर्म की एक रोंगटे खड़ी कर देनेवाली घटना हुई थी। दुष्कर्मियों ने बुरी तरह जख्मी पीडि़ता और उसके मित्र को निर्वस्त्र कर चलती बस से बाहर फेंक दिया था। तब 'निर्भयाÓ के बलात्कार और उसकी हत्या के बाद दिल्ली के मध्यम वर्ग के युवाओं में तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। उन्होंने बलात्कारियों को फांसी दो, फांसी दो की मांग करते हुए एकाधिक बार दिल्ली के विजय चौक को तहरीर चौक में तब्दील किया था। तब मीडिया उसकी आवाज में आवाज मिलाते हुए बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के खिलाफ जनाक्रोश पैदा करने में विराट भूमिका अदा की थी। उसकी सक्रियता के फलस्वरूप रायसीना हिल्स से राजघाट, कोलकाता से कोयम्बटूर और श्रीनगर से चेन्नई तक लोग विरोध प्रदर्शन के लिए उमड़ पड़े। उसका प्रभाव पड़ा। महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध की रोकथाम के लिए कानून में कई संशोधन हुए। महिलाओं की असुरक्षा एवं उनके खिलाफ बढ़ती यौन हिंसा का प्रतीक बनकर उभरी 'निर्भयाÓ के नाम पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए बजट में 1000 करोड़ के विशेष फंड का प्रावधान बना तथा उसके उसके परिवारजनों को फ्लैट सहित लाखों का आर्थिक मुआवजा मिला। बहरहाल 2012 के सवा साल बाद दिल्ली बलात्कार की जिस घटना को लेकर नए सिरे से उतप्त हुई है, वह दिल्ली नहीं, हरियाणा के हिसार जिले के भगाणा गांव की है।
जिस वर्ष दिल्ली में निर्भया काण्ड हुआ था, उसी वर्ष भगाणा के जाटों ने गांव के सभी दलित परिवारों का बहिष्कार किया था। उनके बहिष्कार के विरोध में चमार, कुम्हार, खाती आदि जैसी अपेक्षाकृत मजबूत दलित जातियों के 80 परिवार हिसार के मिनी सचिवालय में खुले आसमान के नीचे शरण ले लिए, किन्तु उसी गांव के दलितों की एक दुर्बल जाति, धानुक लोग गांव में ही बने रहने का फैसला किए। इन्हीं धानुक परिवारों की चार लड़कियों को भगाणा के जाट जाति के दबंगों ने 23 मार्च को अगवा कर दो दिनों तक सामूहिक बलात्कार किया। आठवीं और नौवीं क्लास में पढऩेवाली इन लड़कियों का कसूर बस इतना था कि वे पढऩा चाहती थीं जिसके लिए उनके अभिभावकों ने इजाजत दे रखी थी। यह जाटों के लिए बर्दाश्त के बाहर की बात थी। लिहा•ाा उन्होंने इन लड़कियों को सजा देकर दलित समुदाय को उसकी औकात बता दिया। घटना के प्रकाश में आने के बाद जहां सरकारी डॉक्टरों ने मेडिकल जांच में अनावश्यक विलम्ब कर घोर असंवेदनशीलता का परिचय दिया वहीं पुलिस ने किसी तरह एफआईआर तो दर्ज कर लिया, पर किसी दोषी का नाम दर्ज नहीं किया। हार-पाछ कर पीडि़त परिवार दो सप्ताह पूर्व राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे और जंतर-मंतर पर बैठ कर इंसाफ की गुहार लगाने लगे। वे छुट्टा घूम रहे आरोपियों को अविलम्ब गिरफ्तार करने; फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित कर मामले की छ: महीने में सुनवाई करने तथा चारों बलात्कार पीडि़तों एवं गांव के प्रत्येक बहिष्कृत परिवार को गुडगांव या फरीदाबाद में चार-चार सौ गज का आवासीय भूखंड सहित एक-एक करोड़ का मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं। उनकी यह भी मांग है कि  पीडि़त लड़कियों के लिए सरकार शिक्षा की व्यवस्था करे तथा शिक्षित होने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी दे। पीडि़त बच्चियों को इंसाफ दिलाने की मुहिम में दिल्ली के भारी संख्या में छात्र, शिक्षक, लेखक, कलाकार, सोशल एक्टिविस्ट, युवक-युवतियां जुड़ गए हैं। किन्तु जिस तरह 2012 की सर्दियों में युवाओं की सक्रियता के फलस्वरूप निर्भया को इंसाफ दिलाने के लिए शहर-शहर, गांव-गांव, बस्ती-बस्ती में लोग मुखर हुए, वैसा इस बार नहीं हो रहा है तो उसका प्रधान कारण मीडिया है।
जहां तक हाल के दिनों में यौन हिंसा के विरुद्ध मीडिया की भूमिका का सवाल है, वह काबिलेतारीफ रहा है। ऐसा नहीं कि उसने निर्भयाकांड को ही अंजाम तक पहुंचाया। अप्रैल 2013 में दिल्ली में ही बलात्कार की शिकार बनाई गई पांच वर्ष की बच्ची और उसके परिवार को न्याय दिलाने के लिए जो विरोध प्रदर्शन हुए, उसमें भी उसकी भूमिका अग्रणी रही। पीडि़त बच्ची के मामले में लोगों में दिसंबर-2012 जैसा स्वत: स्फूर्त प्रचंड गुस्सा नहीं था। यह चैनेल थे जिनमें आमजन की अपेक्षा कहीं ज्यादा रोष था। चैनलों ने ही मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, पुलिस अधिकारियों इत्यादि के इस्तीफे की मांग पहले उठाई। उनके ऐसा करने  के बाद आन्दोलनकारी जनता भी इस्तीफे की मांग उठाने लगी। हालांकि अप्रैल 2013 में बलात्कार के विरुद्ध उठी विरोध की लहरें दो-तीन दिनों बाद ही शांत हो गईं थी, पर लोगों के जेहन में आज भी मीडिया, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका ताजी है। बहरहाल निर्भयाकांड में असाधारण भूमिका का निर्वहन करने वाली मीडिया दलित महिलाओं के यौन हिंसा के मामले में खुद के साथ इंसाफ न कर सकी। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर उस पर तल्ख टिप्पणी करने से खुद को नहीं रोक पाए। गत वर्ष उन्होंने पश्चिम बंगाल में एक दस वर्ष की दलित लड़की के साथ हुई दुष्कर्म की घटना पर मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा था-'16 दिसंबर की घटना कोई अलग मामला नहीं है। यह ऐसे कई मामलों में से एक है। कुछ मामलों में यह अलग प्रकरण असाधारण अवश्य था, पर अनूठा नहीं। अगले दिन के अखबारों में यह वारदात पहले पृष्ठ पर थी, लेकिन दस साल की उम्र की दलित लड़की से गैंगरेप और उसे जलाने की घटना अखबारों के भीतरी पृष्ठों पर मात्र पांच-दस लाइनों में सिमट कर रह गई। निर्भया के परिवार को सरकार और दूसरों से आर्थिक मदद मिली, लेकिन उस दलित लड़की या उसके परिवार की सुध लेनेवाला कोई नहीं।Ó   
पूर्व न्यायमूर्ति के उपरोक्त कथन के बाद मीडिया से उम्मीद थी कि वह भगाणा जैसे बलात्कार कांड की अनदेखी नहीं करेगी, पर वैसा हो गया,जबकि इस घटना को हाईलाईट करना उसका अत्याज्य कर्तव्य बनता था। क्योंकि यह घटना निर्भयाकांड से ज्यादा गुरुतर है। कारण, दिल्ली गैंगरेप के पीछे यौनकुंठा प्रधानकारक रही, जबकि भगाणा बलात्कारकांड को अंजाम देने वाले लोग सिर्फ यौन कुंठा के शिकार नहीं हैं। वे ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर एक उभरते समाज का मनोबल तोडऩे तथा अपने टूटते प्रभुत्व को स्थापित करने का मनोवैज्ञानिक सुख लूटते हैं। ऐसी घटनाएं अशक्त पर सशक्त समुदाय के हमले का सूचक हैं। ऐसी घटनाओं के कारण ही 21वीं सदी में भी भारत मध्ययुग के असभ्य व बर्बर समाज के रूप में देखा जाता है।
वैसे तो दलितों को भगाणा कांड से मुक्कमल निजात शक्ति के सभी स्रोतों में वाजिब भागीदारी से ही मिल सकती है। किन्तु मीडिया यदि इस बार निर्भया कांड की भूमिका में अवतरित हो जाय, पीडि़त बच्चियों के साथ वहां के समस्त बहिष्कृत परिवारों को इंसाफ मिलने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। इसका सन्देश देश भर में फैले छोटे-मोटे असंख्य भगाणों तक जायेगा जहां रोज-रोज दलित उत्पीडऩ की छोटी-बड़ी घटनाएं होती रहती हैं। काबिलेगौर है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान दिल्ली बॉर्डर पर नोएडा के कनावनी गांव में दबंगों ने दलित बस्ती तहस-नहस कर दी है। इस बर्बरकांड के बाद दलित गांव छोड़कर पलायन शुरू कर दिए। अगर मीडिया इन घटनाओं को मानव सभ्यता का कलंक मानती है तो उसे हर हाल में भगाणा के पीडि़तों को इंसाफ दिलाने के लिए सामने आना चाहिए। 
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )


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