बांडुंग सम्मेलन की 60वीं वर्षगांठ पर छाया रहा चीन

डॉ. गौरीशंकर राजहंस अभी-अभी इंडोनेशिया में 'बांडुंग सम्मेलनÓ की 60 वीं वर्षगांठ मनाई गई जिसमें एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष सम्मिलित हुए। यह एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण सम्मेलन था। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में व्यस्त होने के कारण इस सम्मेलन में भाग नहीं ले सके। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

अभी-अभी इंडोनेशिया में 'बांडुंग सम्मेलन' की 60 वीं वर्षगांठ मनाई गई जिसमें एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्ष सम्मिलित हुए। यह एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण सम्मेलन था। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में व्यस्त होने के कारण इस सम्मेलन में भाग नहीं ले सके।
पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति सुकार्णो ने जी जान से प्रयास करके इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में 1955 में एशिया और अफ्रीका के देशों का प्रथम सम्मेलन बुलाया था। उनका कहना यही था कि एशिया और अफ्रीका के अधिकतर देश पश्चिम के उपनिवेशवादी देशों के गुलाम रहे हैं जिन्होंने अनेक वर्षों तक इन देशों की जनता का शोषण किया है। इसलिए वक्त आ गया है जब ये देश मिलकर उपनिवेशवाद के खिलाफ झंडा बुलंद करें जिससे भविष्य में कोई भी पश्चिम के उपनिवेशवादी देश फिर से इनका शोषण नहीं कर पाएं।
इस सम्मेलन में अन्य देशों के नेताओं के साथ-साथ चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ-एन-लाई भी सम्मिलित हुए थे। इस सम्मेलन में भाग लेने वाले अधिकतर देशों का कहना था कि वे पश्चिम के उपनिवेशवादी देशों के खिलाफ तो हैं ही, सोवियत रूस और चीन जैसे साम्यवादी देशों के भी खिलाफ हैं। परन्तु पंडित नेहरू ने लोगों को समझा-बुझाकर कर राजी किया। उनका कहना था कि अन्य देशों की तरह चीन भी पश्चिम की उपनिवेशवादी ताकतों का शिकार रहा है। इस कारण चाउ-एन-लाई इस सम्मेलन में सम्मिलित हो सके। परन्तु उनकी भूमिका नगण्य थी ।
जैसे-जैसे समय बीता एशियाई और अफ्रीकी देशों का भाईचारा भी कमजोर होने लगा। बांडुंग सम्मेलन के मुख्य संचालक इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्णो थे। बाद के वर्षों में सुकार्णो ने लोकतंत्र को तिलांजलि दे दी और सैनिक शासन स्थापित कर इंडोनेशिया के तानाशाह बन गये। इससे पंडित नेहरू को घोर निराशा हुई और एशिया और अफ्रीका के देशों का यह सम्मेलन करीब-करीब बिखर सा गया।
यह अलग बात है कि बाद के वर्षों में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो और मिस्र के राष्ट्रपति नासिर के नेतृत्व में 'गुटनिरपेक्ष नीतिÓ का सिद्धांत अपनाया गया जिसमें कहा गया कि एशिया और अफ्रीका के देश न तो अमेरिकी गुट के साथ जाएंगे और न सोवियत यूनियन के गुट के साथ। परन्तु अमेरिका और ब्रिटेन ने गुटनिरपेक्ष नीति को हेय दृष्टि से देखा और व्यंग्य में कहा कि 'गुटनिरपेक्ष नीतिÓ को मानने वाले देश असल में सोवियत यूनियन के पिछलग्गू हैं।
पाकिस्तान ने कश्मीर को लेकर हमेशा अडंग़ा पैदा किया। अमेरिका और ब्रिटेन ने हमेशा 'सुरक्षा परिषदÓ में पाकिस्तान का साथ दिया और परेशान होकर पंडित नेहरू को सोवियत यूनियन का साथ मांगना पड़ा। सोवियत यूनियन की मदद से ही 'सेक्युरिटी काउंसिलÓ में भारत अमेरिका और ब्रिटेन के तिकड़म को परास्त कर सका। परन्तु इन समस्याओं में उलझे रहने के कारण भारत एशिया के अन्य देश और अफ्रीका के अन्य देशों से अपने संबंधों को मजबूत नहीं कर सका।
उधर चीन ने इस मौके का फायदा उठाकर एशिया और अफ्रीका के देशों में अपनी पैठ मजबूत कर ली। भारत के लिए तो अत्यन्त दुर्भाग्य की बात यह हुई कि उसने चीन पर भरोसा किया और चीन ने धोखा देकर 1962 में भारत पर चढ़ाई कर दी जिसका नतीजा यह हुआ कि भारत बुरी तरह इस युद्ध में हार गया। इस युद्ध में चीन से हार जाने के कारण भारत की कमर ही टूट गई और वह एशिया तथा अफ्रीका के देशों का नेतृत्व नहीं कर सका। कमजोर भारत पर एशिया और अफ्रीका के देश बहुत भरोसा नहीं कर पाए। उधर चीन की आर्थिक और सामरिक शक्ति दिन दुगुनी और रात चौगुनी बढ़ती ही गई।
अब जब इंडोनेशिया में 'बांडुंग सम्मेलनÓ की 60वीं वर्षगांठ मनाई गई तो परिदृश्य पूरा बदला हुआ था। 60 वर्ष पहले चीन को कोई पूछता नहीं था। इस बार सब चीन का मुंह जोह रहे थे। पूरे सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग छाए रहे और सभी देशों के प्रतिनिधियों ने चीन के 'एशिया इन्फ्रास्टक्चर बैंकÓ की भूरि भूरि प्रशंसा की। शी ने वायदा किया कि इस बैंक के द्वारा वे एशियाई देशों को भरपूर आर्थिक सहायता देंगे। सबसे अधिक सहायता का वायदा उन्होंने इंडोनेशिया को देने का किया। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति वी डोडो कठपुतली की तरह शी की खुशामद करते रहे। यह देखकर लोगों को बहुत ही दुख और आश्चर्य हुआ। जापान ने भी एशिया और अफ्रीका के देशों को आर्थिक सहायता देने का वायदा किया। परन्तु लोगों ने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे की बातों पर बहुत ध्यान नहीं दिया। कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि गत 60 वर्षों में एशिया और अफ्रीका की राजनीति पूरी तरह बदल गई है। इन देशों में संसार की तीन-चौथाई जनता रहती है। चिन्ता की बात यह है कि चीन एशिया और अफ्रीका के देशों पर हावी हो रहा है। चीन अब किसी की बात नहीं सुनता है। वह 'साउथ चाइना सीÓ में टापुओं पर धड़ल्ले से रेत, मिट्टी और पत्थर गिराकर वहां हवाई अड्डे और हवाई पट्टी बनाना चाहता है। अभी-अभी मलेशिया में 'आसियानÓ देशों का सम्मेलन हुआ जिसमें चीन की इन हरकतों की सभी देशों ने आलोचना की। परन्तु चीन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। क्योंकि चीन यह जानता है कि 'आसियानÓ बहुत कमजोर हो गया है।
भारत के लिये चीन से सतर्क रहने की आवश्यकता है। दोस्ती अपनी जगह ठीक है। परन्तु भारत की सुरक्षा सर्वोपरि है। 
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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