बलूचिस्तान पर पाक का अनाधिकृत कब्ज़ा

शेष नारायण सिंह : लाल किले के अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब डेढ़ घंटे का समय बिताया। उनका भाषण दो साल की अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा था, अपनी कथित सफलताओं का हिसाब-किताब था।...

शेष नारायण सिंह

लाल किले  के अपने भाषण  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करीब डेढ़ घंटे का समय बिताया। उनका भाषण दो साल की अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा था, अपनी कथित सफलताओं का हिसाब-किताब था। ऐसा वे अपने हर भाषण में करते हैं और जिन लोगों को उनका हर भाषण सुनना पड़ता है उनको यह सारी बातें लगभग याद हैं और यह भी याद है कि कौन सी बात के बाद अगला प्वाइंट क्या होगा।
लेकिन अपने भाषण को समाप्त करते हुए इस बार प्रधानमंत्री ने  पाकिस्तान के हवाले से बलूचिस्तान, पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगिट और पेशावर का एक अलग तरह से जिक्र किया जिसके बाद तुरंत विवाद शुरू हो गया। यह सच्चाई है कि जिस कश्मीर मुद्दे पर बात न करने के लिए पाकिस्तान को बार-बार चेताया जा चुका है और शिमला समझौते  में आपसी विवाद बिना किसी तीसरी पार्टी के सुलझाने की हिदायत दी गई है, उसी कश्मीर को मुशर्रफ ने अटल बिहारी वाजपेयी की नाक के नीचे से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में सफलता हासिल कर ली थी। हद तो यह हो गई कि जब भी कश्मीर की बात होती है तो श्रीनगर के आसपास के इलाके की बात होती है, मुजफ्फराबाद या उन इलाकों की नहीं होती जिनको धोखे से जिन्ना की अगुवाई में पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों की पोशाक पहनकर कब्जा कर लिया था। राजा हरिसिंह हीला हवाला कर रहे थे और जब मुजफ्फराबाद और गिलगिट के इलाकों पर पाकिस्तानी फौज का कब्जा हो गया तब उन्होंने सरदार पटेल के सामने भारत में विलय के कागजों पर दस्तखत किया और भारतीय सेना ने पाकिस्तानी कबाईली हमले को नाकाम किया।
 लाल किले से  पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान  का जिक्र करके प्रधानमंत्री ने दोनों ही मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा की  शुरूआत कर दिया है। उनके भाषण के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज  ने कहा है कि कश्मीर की स्थिति से दुनिया का ध्यान बंटाने के लिए  प्रधानमंत्री ने  बलूचिस्तान का उल्लेख किया है। कुछ पाकिस्तानी प्रवक्ताओं ने यह भी कहा है कि बलूचिस्तान  भारत  की खुफिया एजेंसी रॉ का प्रोजेक्ट है और प्रधानमंत्री ने लाल किले से इस बात को स्वीकार कर लिया है।
पाकिस्तान सरकार और उसके हमदर्दों को यह बताए जाने की जरूरत है कि रॉ का जन्म ही सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के कार्यकाल  में हुआ जबकि बलूचिस्तान  में आजादी की लड़ाई 1948 से चल रही है।  वास्तव में जब ब्रिटिश कब्जे से भारत आजाद हुआ और उसमें से कुछ इलाके काटकर पाकिस्तान बनाया गया तो बलूचिस्तान भारत के बाहर ब्रिटिश सत्ता के अधीन एक देश था। यह अलग बात है कि भारत की अंग्रेजों से मुक्ति की लड़ाई के साथ-साथ बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई भी चलती रही थी। तो इस तरह से भारत, पाकिस्तान और बलूचिस्तान  एक साथ आजाद हुए। जब पाकिस्तान बन गया तो 1948 में बलोचिस्तान के उस वक्त  के शासक मीर अहमद यार खां को धोखे से पाकिस्तान के तत्कालीन गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना ने उस इलाके को पाकिस्तान में मिला लिया। उसके तुरंत बाद ही विरोध शुरू हो गया लेकिन विरोध में खड़े हुए लोगों के नेताओं, मुहम्मद अमीन खोसा और अब्दुल समद अचकजई को पाकिस्तान फौज ने गिरफ्तार कर लिया था।
उसके बाद सन् 1948 में ही करीम खां के  नेतृत्व में बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई शुरू हो गई जो आज तक जारी है। 1968 में बलोच अवाम नवाब नौरोज खान की अगुवाई में पाकिस्तान के खिलाफ पूरी तरह से बगावत कर चुकी थी लेकिन 1973 आते-आते जुल्फिकार अली भुट्टो ने तिकड़म करके बलूचिस्तान की आजादी की मांग को तितर बितर करवा दिया। दरअसल भुट्टो ने वृहत्तर बलूचिस्तान की मांग करवा दिया। वृहत्तर बलूचिस्तान में इरान  और अफगानिस्तान के बलोच इलाके भी आ जाते। इसके बाद बलूचिस्तान का विरोध दोनों देशों ने शुरू कर दिया। भुट्टो ने उस वक्त के बलोच राष्ट्रवादी नेताओं को इस बात पर भी राजी कर लिया कि वे 1973 वाले पाकिस्तान के संविधान को समर्थन कर दें। लड़ाई कमजोर पड़ गई लेकिन आजादी की बात कहीं गई नहीं, जिंदा रही। भुट्टो ने ‘बांटो और राज करो’ के सिद्धांत के तहत बलोच राष्ट्रीय आन्दोलन को तहस-नहस कर दिया। जिया उल हक ने भी वहां इसी हाफिज सईद की अगुवाई में धार्मिक राजनीति के बीज बो दिए और बलोच राष्ट्रीय आन्दोलन लगभग खत्म कर दिया।
बाद में  नवाब अकबर बुगती की अगुवाई में बलोच फिर एकजुट हुए। उनको मुशर्रफ ने घेरकर 2006 में मरवा दिया जिसके बाद बलोच आन्दोलन की आग बहुत जोर पकड़ गई है।
अब दुनिया भर के मानवाधिकार समूहों का समर्थन बलोच अवाम को हासिल है और भारत को चाहिए कि अपने कर्तव्य का निर्वाह करे और बलोच अवाम को पाकिस्तानी चंगुल से मुक्ति दिलाने में सहयोग करे।


 

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