''फग्र्युसन प्रोटेस्ट'' का सन्देश

एच.एल. दुसाध : अमेरिका के टाइम मैगजीन द्वारा सर्वाधिक न्यूज बटोरने में दूसरे स्थान पर रहने वाला 'फग्र्युसन प्रोटेस्टÓ अभी भी सुर्खियां बटोर रहा है। ध्यातव्य है कि अमेरिका के मिसौरी प्रान्त के फग्र्युुसन इलाके के निहत्थे अश्वेत युवक माइकल ब्राउन के हत्यारे श्वेत पुलिस अधिकारी डरेन विल्सन के खिलाफ जब गत नवम्बर के तीसरे सप्ताह में ग्रांड ज्यूरी ने अभियोग चलाने से इंकार कर दिया, वहां के लगभग दर्जन भर शहरों में दंगे भड़क उठे। ...

एच.एल. दुसाध
एच.एल. दुसाध

अमेरिका के टाइम मैगजीन द्वारा सर्वाधिक न्यूज बटोरने में दूसरे स्थान पर रहने वाला 'फग्र्युसन प्रोटेस्टÓ अभी भी सुर्खियां बटोर रहा है। ध्यातव्य है कि अमेरिका के मिसौरी प्रान्त के फग्र्युुसन इलाके के निहत्थे अश्वेत युवक माइकल ब्राउन के हत्यारे श्वेत पुलिस अधिकारी डरेन विल्सन के खिलाफ जब गत नवम्बर के तीसरे सप्ताह में ग्रांड ज्यूरी ने अभियोग चलाने से इंकार कर दिया, वहां के लगभग दर्जन भर शहरों में दंगे भड़क उठे। उसके बाद तो फग्र्युसन प्रोटेस्ट लगातार सुर्खियों में बना रहा। इस प्रोटेस्ट को मीडिया ने इतना स्पेस दिया कि नवम्बर के शेष में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पछाड़ कर यह टाइम मैगजीन के 'पर्सन ऑफ द ईयरÓ के वोटिंग में पहले स्थान पर आ गया। किन्तु 8 दिसंबर को जब परिणाम घोषित हुआ मोदी जरूर वोटरों के हिसाब से पहले नंबर पर रहे पर, टाइम के सम्पादक मंडल के निर्णय में मोदी शीर्ष पांच में भी स्थान बनाने में व्यर्थ रहे जबकि फग्र्युसन प्रोटेस्ट नंबर दो का स्थान बरकरार रखा। पहला स्थान उस इबोला राहत काम में जुटे डॉक्टरों और नर्सों  को मिला जिसके वायरस से सिएरा लिओन, लाइबेरिया और गिनी में साल भर में लगभग साढ़े छ: हजार लोग मौत के शिकार हो गए एवं जिन्हें बचाने के क्रम में साढ़े तीन सौ डॉक्टरों और नर्सों को भी प्राण विसर्जित करना पड़ा।
बहरहाल फग्र्युरासन प्रोटेस्ट के दौरान ही पुलिस की गोली से दो और अश्वेेतों की हत्या हो गई। अश्वेतों ने इन मौतों को फग्र्युसन कांड से जोड़ते हुए उग्र धरना-प्रदर्शन का सिलसिला अमेरिका के अन्य शहरों तक फैला दिया। फग्र्युसन प्रोटेस्ट की एक बड़ी खासियत यह रही कि अश्वेतों के साथ भारी संख्या में श्वेत लोगों ने इसमें भाग लिया। इस प्रोटेस्ट को टाइम के पर्सन ऑफ द ईयर में दूसरे स्थान पर पहुंचाने में भी श्वेतों ने बड़ा रोल अदा किया। अश्वेत-श्वेेतों के मेल से चल रहा यह प्रोटेस्ट कमजोर पडऩे की बजाय बढ़ता ही गया जिसमें अब एक नया मोड़ आ गया है।
फग्र्युसन प्रोटेस्ट शुरू होने के ठीक एक महीने बाद एक व्यक्ति ने न्यूयार्क पुलिस के दो अफसरों को काफी करीब से गोली मार कर हत्या करने के बाद खुद को भी अपनी ही बन्दूक की गोली से उड़ा लिया। बंदूकधारी की पहचान 28 वर्षीय इस्माइल ब्रिन्स्ले के रूप में हुई है जो हत्या कांड को अंजाम देने के लिए बाल्टीमोर से 300 किलोमीटर का सफर कर न्यूयार्क पहुंचा  था। पुलिस अधिकारयों के मुताबिक ब्रिन्स्ले ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि माइकल ब्राउन और एरिक गार्नर नामक दो अश्वेतों की पुलिस अधिकारियों द्वारा की गई हत्या के कारण वह पुलिस अधिकारियों की जान लेना चाहता है। उसने घात लगाकर गश्ती कार में बैठे दोनों अफसरों पर बन्दूक तान कर खिड़की से उनके सिर और शरीर के ऊपरी हिस्से पर गोली मार दी। इसके बाद वह एक मेट्रो स्टेशन की ओर भाग गया और वहां खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली। इस घटना से न्यूयार्र्क  सिटी शोक में डूब गई है।
इस घटना से आहत अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा ने कहा है-'मैं पुलिस कर्मियों की हत्या की निंदा करता हूं। देश की जनता से अपील करता हूं कि वह हिंसा को खारिज करे और ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करे जिससे किसी के दिल को ठेस न पहुंचे।Ó न्यूयार्क सिटी के मेयर ब्लासियो ने कहा है, 'हमारा शहर शोक में डूबा हुआ है। हमारे दिल भर आये हैं। यहां के नागरिकों को विश्वास नहीं हो रहा है कि इस तरह की घटना यहां हो सकती है। इस व्यक्ति ने हमारे शहर पर हमला किया है। यह हत्या बदला लेने की शैली में की गयी है।Ó
बहरहाल यह घटना निश्चय ही निंदनीय है पर, जब लोगों का कानून-व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाता है तब आक्रोश से भरे किसी भी देश के ब्रिन्स्ले ऐसा काम अंजाम दे देते हैं। इस्माइल ब्रिन्स्ले उन लाखों अश्वेतों में से एक था जो अमेरिका की न्यायपालिका और पुलिस-प्रशासन के प्रति अपना भरोसा खो चुके हैं। किन्तु बाकी लोग जहां धरना-प्रदर्शन, तोड़-फोड़ और आगजनी के रास्ते अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, वहीं ब्रिन्स्ले ने कुछ पुलिस अधिकारियों को मार कर शहीद हुए अपने भाइयों की मौत बदला लेने का कठोर निर्णय ले लिया। अब न्यूयार्क की यह दुखद घटना अमेरिका के लिए तो शोक की बात बन ही चंूकि है किन्तु इससे विविधतामय उन सभी देशों को सबक लेना चाहिए जहां विभिन्न सामाजिक समूहों का अवस्थान है, किन्तु उनमें कुछ समूहों का न्याय और पुलिस-व्यवस्था पर से भरोसा उठ चुका है।
काबिले गौर है कि सत्तर के दशक में जब भयंकर आर्थिक और सामाजिक विषमता के चलते अमेरिका में नस्लीय दंगे शुरू हुए तब कर्नर आयोग की सिफारिशों का सम्मान करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉन्सन ने राष्ट्र की समृद्धि के लिए शांति को ध्यान में रखकर वंचित नस्लीय समूहों को शक्ति के स्रोतों में शेयर दिलाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने भारत की आरक्षण प्रणाली से आइडिया उधार लेकर विभिन्न नस्लीय समूहों का प्रतिनिधित्व सिर्फ नौकरियों में ही नहीं, उद्योग-व्यापार में सुनिश्चित करने की नीति अख्तियार किया। उनकी उस विविधता नीति (डाइवर्सिटी पॉलिसी) को उनके बाद के राष्ट्रपतियों निक्सन, कार्टर, रीगन ने भी आगे बढाया. फलस्वरूप कालों, रेड इंडियन्स, हिस्पैनिक, एशियन पैसिफिक मूल के लोगों सहित प्राय: 28 प्रतिशत अश्वेतों का धीरे-धीरे नहीं, बड़ी तेजी से सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, फिल्म-मीडिया इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों में ही प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। किन्तु ऐसे ढेरों क्षेत्र हैं जहां पांच दशक से डाइवर्सिटी पॉलिसी कठोरतापूर्वक लागू होने के बावजूद अश्वेतों का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, जिसे लेकर वहां तनाव रहता है, जैसे न्यायपालिका व पुलिस-प्रशासन। मसलन जिस फग्र्यूसन इलाके से दंगे भड़के, वहां 70 प्रतिशत आबादी अश्वेतों की है। किन्तु वहां के स्थानीय पुलिस बल के 53 सदस्यों में सिर्फ तीन अश्वेत हैं। जिस ग्रांड ज्यूरी के फैसले से लोगों का गुस्सा भड़का है, वहां उसके बारह सदस्यों में नौ श्वेेत और तीन ही अश्वेत हैं। दरअसल फग्र्युसन प्रोटेस्ट न्यायपालिका और पुलिस बल में वंचित समूहों की अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर है जिसमें विवेकवान गोरों का भी भरपूर समर्थन मिल रहा है। अब विभिन्न क्षेत्रों में अच्छी-खासी भागीदारी पाने के बावजूद न्याय-व्यवस्था में अपर्याप्त हिस्सेदारीजन्य परिस्थिति के कारण यदि अमेरिका के ब्रिन्स्ले चरम निर्णय ले सकते हैं तो उन देशों के खतरे का सहज अनुमान लगाया जा सकता है, जहां वंचित समूहों को शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक और धार्मिक इत्यादि) में नहीं के बराबर हिस्सेदारी मिली है। ऐसे में सवाल उठता है क्या भारत के शासक दल भी फग्र्युसन प्रोटेस्ट में छिपे सन्देश को पढऩे का कष्ट लेंगे?
(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)

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