प्रवासी भारतीय भारत के विकास में योगदान दें

डॉ. गौरीशंकर राजहंस : हाल में जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे तब उन्होंने विभिन्न अवसरों पर अनेक भाषण दिये थे। परन्तु उनके दौरे का सबसे महत्वपूर्ण भाषण सिरीफोर्ट ओडिटोरियम में हुआ था जहां 2000 चुनिंदा लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि आज की तारीख में 30 लाख भारतीय या भारतवंशी अमेरिका में रह रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उनका योगदान निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। परन्तु ये प्रवासी भारतीय यदि ठान लें तो भारत के भविष्य को स्वर्णिम बना सकते हैं। ...

डॉ गौरीशंकर राजहंस

हाल में जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे तब उन्होंने  विभिन्न अवसरों पर अनेक भाषण दिये थे। परन्तु उनके दौरे का सबसे महत्वपूर्ण भाषण सिरीफोर्ट ओडिटोरियम में हुआ था जहां 2000 चुनिंदा लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि आज की तारीख में 30 लाख भारतीय या भारतवंशी अमेरिका में रह रहे हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उनका योगदान निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। परन्तु ये प्रवासी भारतीय यदि ठान लें तो भारत के भविष्य को स्वर्णिम बना सकते हैं।
यहां यह याद रखने वाली बात है कि 20वीं सदी में 60 के दशक में हजारों प्रोफेसनल भारतीय जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड अकांउटटेंट और प्रोफेसर आदि थे, झुंड के झुंड अमेरिका चले गये थे और वे फिर भारत नहीं लौटे। उसके पहले भी बड़ी संख्या में भारतीय अमेरिका गये थे और वहां के रहन-सहन का स्टैण्डर्ड तथा सुविधाओं को देखकर वे उस देश में इतने रम गये कि अधिकतर लोग भारत नहीं लौटे। कुछ लोग बीच-बीच में थोड़े समय के लिए भारत आते थे। परन्तु अपने गांव और राज्य की बदहाली देखकर वापस लौट जाते थे। 60 के दशक में और उसके पहले भी जो भारतीय अमेरिका गये थे वे वहां अत्यन्त ही संपन्न हो गये हैं। अनेक साधारण लोग जो अमेरिका जाकर वहां के नागरिक बन गये उनमें से कई बड़े और छोटे उद्योगपति बन गये और बड़े पैमाने पर आज वे वहां होटल और मोटल चला रहे हैं। बहुत से लोग आयात-निर्यात व्यवसाय में लग गये हैं। बहुत से बैंकर बन गये। परन्तु दुर्भाग्यवश उन्होंने उस गांव या शहर के लिए कुछ भी नहीं किया जिसकी मिट्टी के वे उपज थे और जहां के लोग आज भी गौरव से उन्हें याद करते हैं। आज भारत पूरी तरह बदल गया है और वक्त का तकाजा है कि अमेरिका में रहने वाले ये संपन्न भारतीय अपने गांव और कस्बों के विकास में योगदान दें।
बंगलौर जैसे भारत के गिने-चुने शहरों में अमेरिका में रहने वाले कुछ भारतीय आकर हाल में बस गए हैं। उनमें से अधिकतर लोग डॉक्टर हैं जिन्होंने अपना क्लीनिक खोल लिया और लोगों की सेवा करने लगे। अनुभव से उन्होंने पाया कि भारत के इन शहरों में आज की तारीख में वे सारी सुविधाएं हैं जो उन्हें अमेरिका में प्राप्त थीं। इसके अतिरिक्त यहां बड़े-बड़े बंगले उनको मामूली किराये पर मिल जाते हैं तथा नौकर-चाकर और ड्राईवर आदि की भरपूर सुविधा मिलती है जो उन्हें अमेरिका में प्राप्त नहीं थी। इसके अतिरिक्त इन भारतीयों ने अपने अनुभव से पाया कि ज्यों-ज्यों बुढ़ापा नजदीक आता गया वे अमेरिका की ठंड बर्दाश्त करने के लायक नहीं रह गए।  यहां भारत में मौसम इतना अच्छा है कि अमेरिका जैसी ठंड उन्हें नहीं सताती है। डॉक्टरों के अलावा बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री प्राप्त कर भारतीय मूल के सैंकड़ों लोग भी भारत आ गये हैं। उन्हें यहां पर प्रसिद्ध कंपनियों में ऊंची तनख्वाह पर अच्छी नौकरी मिल गई। कई लोगों ने तो अपना खुद का बिजनेस भी शुरू कर दिया जिसमें वे पूरी तरह सफल रहे।
आज भी अमेरिका में ऐसे भारतीय हैं जिनके पास अकूत धन है। वे भारत में निवेश करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में वे पूरी तरह योगदान दें। परन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है। यह संतोष की बात है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को यह भरोसा दिलाया है कि यदि वे भारत में निवेश करेंगे तो उनका धन न केवल सुरक्षित रहेगा, बल्कि वह फूले फलेगा भी। अत: समय की आवश्यकता है कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय खासकर जो 'सीनियर सिटीजनÓ हो गए हैं, वे भारत आकर अपने गांव और शहरों के विकास में योगदान दें। क्योंकि उस धरती के प्रति भी उनका कर्तव्य बनता है जिस धरती से उठकर वे अमेरिका गए हैं।
अनुभव से यह पाया गया है कि पिछले 100 वर्षों में लाखों भारतवासी संसार के विभिन्न देशों में गए। थोड़ी देर के लिये अमेरिका की बात छोड़ भी दें तो आज से प्राय: 100 वर्ष पहले अंग्रेज पानी के जहाजों में बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों को लादकर मॉरिशस और सूरीनाम जैसे देश ले गये। उसी तरह वे उन्हें फिजी भी ले गए। उद्देश्य एक ही था कि ये मजदूर गन्ने की खेती करने में पूरी तरह सक्षम थे। इन देशों में भारतीय मूल के लोगों में अपार कष्ट सहा। अधिकतर भारतीय मूल के लोग तो इन्हीं देशों में बस गये। अब तो उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी वहां रह रही है। अधिकतर लोग बहुत ही सम्पन्न हो गये। अनेक लोग सांसद बने और कई तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी बन गये।
फिजी में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या प्राय: 50 प्रतिशत है। परन्तु जब अंग्रेजों ने फिजी को स्वतंत्रता प्रदान की तब फिजी के मूल निवासी और भारतीय मूल के लोगों के बीच भयानक कटुता पैदा कर दी। भारतीय मूल के लोग वहां खेतों में काम कर सकते हैं। परन्तु सौ वर्ष के बाद भी खेतों का मालिकाना हक उन्हें प्राप्त नहीं है। उसी तरह वे बिजनेस तो कर सकते हैं। परन्तु उन भव्य इमारतों पर उनका मालिकाना हक नहीं है जहां से वे बिजनेस कर रहे हैं। फिजी में भारतीय मूल के प्रधानमंत्री महेन्द्र चौधरी को कुछ वर्ष पहले संसद भवन में ही स्थानीय लोगों ने बंधकर बना कर रखा था जहां वे महीनों पड़े रहे और जब अमेरिका और ब्रिटेन ने हस्तक्षेप किया तब उनकी रिहाई हुई। भारतीयों की दुर्दशा देखकर फिजी के अनेक संपन्न भारतीय वहां से भाग खड़े हुए। वे बड़ी उम्मीद लेकर भारत में उन गांवों में गए जहां उनके पुरखे रहते थे। परन्तु उन गांव के निवासियों ने उनके साथ बहुत ही कटु व्यवहार किया और कहा कि इस नाम का कोई व्यक्ति यहां कभी रहता ही नहीं था।  फिजी के इन प्रवासी भारतीयों के वंशजों को गांव के लोगों ने वहां बसने नहीं दिया। क्योंकि उन्हें डर था कि वे उनकी संपत्तियों में इतने वर्षों के बाद हिस्सा मांगेंगे। यह एक अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी। लाचार होकर वे भारत छोड़कर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया चले गये। नुकसान तो अन्त में भारत का ही हुआ। उसी तरह अंग्रेज रबड़ की खेती करने के लिये बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु से हजारों मजदूरों को मलय देश ले गए जो बाद में मलेशिया और सिंगापुर के नाम से दो अलग देश हुए। अधिकतर भारतीय इन दोनों देशों में बहुत ही संपन्न हैं। वे भारत में निवेश भी करना चाहते हैं। परन्तु उन्हें रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है। सबसे बड़ी बात है कि जो भारतीय मूल के लोग जो आज से सौ साल पहले या उससे भी अधिक पहले इन देशों में गए थे वे जब अपने पुरखों की जड़ें तलाशने के लिये भारत आते हैं तो राज्य सरकारें उनके साथ कोई सहानुभूति नहीं दिखाती हैं और वे अपना मन मारकर विदेश लौट जाते हैं।
विदेशों में रहने वाले, खासकर अमेरिका में रहने वाले अधिकतर भारतीय बहुत सुखी और संपन्न हैं। केन्द्रीय सरकार का यह कर्तव्य है कि वह अपने दूतावासों से कहे कि विभिन्न देशों में रहने वाले सुखी-संपन्न भारतीय मूल के लोगों को भारत में निवेश करने के लिए उत्साहित करे। उन्हें अपना फर्ज याद दिलाए कि उनकी मिट्टी उन्हें पुकार रही है। जिस गांव या कस्बे से वे अमेरिका जैसे संपन्न देश में गए हैं उस मिट्टी के प्रति भी उनका कुछ कर्तव्य है। समय आ गया है कि वे अपने कर्तव्य का पालन करें।  
(लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)

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