पोंजी स्कीम या धोखाधड़ी का पर्याय

गिरीश मिश्र : हमारे इतिहास में धोखाधड़ी कोई नई चीज नहीं है यद्यपि उसका स्वरूप आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन के साथ लगातार बदलता रहा है। वर्तमान आर्थिक युग में चाल्र्स पोंजी के आने के बाद उसने एक नया स्वरूप ग्रहण किया है। ...

डॉ. गिरीश मिश्र

गिरीश मिश्र
हमारे इतिहास में धोखाधड़ी कोई नई चीज नहीं है यद्यपि उसका स्वरूप आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों में परिवर्तन के साथ लगातार बदलता रहा है। वर्तमान आर्थिक युग में चाल्र्स पोंजी के आने के बाद उसने एक नया स्वरूप ग्रहण किया है। आए दिन चाल्र्स पोंजी के नाम से जुड़ी पोंजी स्कीम की चर्चा होती है। आइए देखें कि पोंजी स्कीम क्या है? ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोश के अनुसार, पोंजी स्कीम धोखाधड़ी का वह रूप है जिसके तहत किसी भी अस्तित्वहीन उद्यम में आमजन का विश्वास पैदा करने और उसे बनाए रखने के लिए पहली बार निवेश करने वालों को बाद में आने वाले निवेशकों से प्राप्त पैसों के द्वारा भुगतान किया जाता है।
यह पोंजी महोदय कौन थे जिनके नाम के साथ पिछले करीब सौ सालों के धोखाधड़ी के कारनामे जुड़े हुए हैं? वे इतालवी मूल के थे जो नोकरी के चक्कर में सबसे पहले कनाडा गए और फिर अमेरिका के बोस्टन शहर में आए कनाडा में उन्होंने अनेक बेलन बेले और कई पेशे अजमाए और इस क्रम में उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी। वहां से वे बोस्टन आए जहां उन्होंने अपने धोखाधड़ी के कारोबार को चमकाया और अकूल धन कमाया। वे बड़े ठाट-बाट से रहने लगे। उन्होंने शादी की और अपना घर बसाया। इटली से अपनी मां को बुलाया और सुख की जिन्दगी बिताने लगे। कुछ दिनों के बाद जब उनके धन बटोरने का रहस्य उजागर हुआ तब वे गिरफ्तार हुए, सजा मिली और जेल गए। वर्ष 1936 में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था 'द राइज ऑफ मिस्टर पोंजी: दी ऑयोबॉयोग्राफी ऑफ ए फाइनेंशियल जीनियसÓ।
पोंजी को अविलंब धनी बनने का नुस्खा ईजाद करने का श्रेय दिया गया। कहा गया कि अमेरिका के बाहर के किसी भी देस से इंटरनेशनल पोस्टल कूपन खरीद कर अमेरिका में बेचने के सिलसिले में कि उस व्यक्ति को 45 दिनों में 50 प्रतिशत तक का फायदा हो सकता है जितनी कमाई अन्यत्र संभव  नहीं है। इस का में न कोई जोखिम है और न कोई खतरा। इससे लोगों के बीच काफी उन्माद पैदा हो गया। बोस्टन में हर जगह लोगों पर पागलपन सवार हो गया। हर व्यक्ति पर जल्द से जल्द धनी बनने का भूत सवार हो गया। लोगों ने तार्किक ढंग से सोचना बंद कर दिया। नतीजतन लोग बिना किसी जमानत या लिखा-पढ़ी के पोंजी को अपनी जिन्दगी भर की कमाई को सौंपने लगे।
ऐसा कैसे हुआ? लोगों ने अपनी तर्कबुद्धि को क्यों पूरी तरह अलविदा कर दिया? उनके ऊपर अविलंब धनी बनने का भूत कैसे सवार हुआ? इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए हमें पोंजी के जीवन को देखना होगा। आज से करीब 75 वर्ष पूर्व पोंजी के इस संसार से जाने के बाद भी उसका नाम जिंदा है। धोखाधड़ी के कारोबार को हर जगह अब भी पोंजी के नाम से जोड़ा जाता है। हमारे यहां शारदा, सहारा, रोज वैल्ली, हैप्पीनेस लिमिटेड आदि अनेक घोटाले पोंजी से किसी न किसी तरह प्रोत्सहित हुए हैं। शारदा समूह के अध्यक्ष सुदीप्त सेन और सहारा समूह के प्रमुख सुव्रत राय अब भी जेल में बंद हैं। रोज वैल्ली हैप्पीनेस लिमिटेड शारदा समूह चार गुना बड़ा है। उसने अपनी दो कंपनियों के जरिए दस हजार करोड़ रुपये बटोरे थे। उसके प्रबंध निदेशक शिवमय दत्त अब भी जेल की हवा खा रहे हैं।
इन सबके प्रेरणास्रोत हमेशा पोंजी ही रहे। एक जमाने में कहा जाता था कि अमेरिका के न्यू इंग्लैंड निवासी अत्यन्त रूढि़वादी हैं।  वे कभी किसी के झांसे या बहकावे में नहीं आ सकते किन्तु पिछली शताब्दी के आंरभिक वर्षों के दौरान लगा कि वहां के लोगों ने भी अपनी तर्कबुद्धि को तिलांजलि दे दी है। वे भी जल्द से जल्द धनी बनने को आतुर हैं। लगा कि आधुनिक मिडास पोंजी के रूप में अवतरित हुआ है जो हर किसी के पैसों को मात्र नब्बे दिनों में दुगुना कर रहा है। पोंजी ने एक नई आशा जगाई है। लोगों को अब से अमेरिका की ओर शराब की तस्करी के जोखिम भरे काम में पैसे लगाने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। पोंजी पैसे दीजिए और मात्र 180 दिनों में धनी बन जाइए।
बिना किसी व्यक्तिगत जमानत या लिखा-पढ़ी के लोग पोंजी को अपनी बचत राशि सौंपने लगे। लगा कि एक बड़ा भारी तूफान आ गया है। पोंजी के घर और दफ्तर के इर्द-गिर्द निवेशकों की इतनी भारी भीड़ उमड़ी कि पुलिस भी उसे नियंत्रित करने में अक्षम दिखने लगी। पोंजी ने छ: महीनों के अंदर निवेशक को पचास प्रतिशत लाभांश देने का वायदा कर भारी कमाई की। उसने दो कमरों का एक दफ्तर बनाया जहां बारह क्लर्क कार्यरत हो गए। मगर उसे यह खतरा हमेशा सताता रहा कि वह इस हेराफेरी के क्रम में कहीं स्वयं न पकड़ा जाय।
अब आइए, हम पोंजी के जीवन पर एक निगाह डालें। पोंजी जिस समय कनाडा से अमेरिका के लिए रवाना हुआ था उस समय उसकी जेब में मात्र दो हजार डालर थे मगर अमेरिका पहुंचते-पहुंचते उसके पास केवल ढाई डालर ही रह गए थे। अमेरिका पहुंचने के बाद उसने अनेक छोटे-मोटे काम किए जिसमें उसकी कमाई काफी कम थी। इस क्रम में उसे अनेक बार गिरफ्तार भी होना पड़ा। जुलाई 1912 में वह घूमता-घामता बोस्टन आए।
एक अस्से के बाद उसने अंतरराष्ट्रीय जवाबी कूपन का कारोबार आरंभ किया। उसके अनुसार, यह धंधा उसकी झोली में पक्के सेव की तरह आ टपका और वह काफी सुस्वादु साबित हुआ। उसके पास स्पेन से आया एक पत्र मिला जिसमें उससे किसी पुस्तक की एक प्रति भेजने का आग्रह किया गया था जिसके साथ डाक व्यय के लिए पोस्टल कूपन भेजा गया था।  इस प्रकार के कूपन का इस्तेमाल वह पहले भी कर चुका था। कूपन के नीचे स्पेन के किसी डाकघर का जिक्र था जहां लिखा था कि इस कूपन का मूल्य 35 सेंटाइक्स है जिसका विनिमय अन्य यूरोपीय तथा उत्तरी अमेरिकी देशों की करेंसियों के साथ किया जा सकता है।  इस कूपन पर अचानक उसकी निगाह पड़ी और उसे अहसास हुआ कि उसके जरिए सट्टेबाजी की जा सकती है और बड़ी आसानी से पैसे कमाए जा सकते हैं। उस समय तक वालस्ट्रीट के किसी बड़े वित्तीय विशेषज्ञ की नजर उस पर नहीं पड़ी थी। जब उसने उसका इस्तेमाल आरंभ किया तब वित्तीय विशेषज्ञ काफी खफा हो गए। पोंजी को उसकी संभावनाओं का हिसाब लगाने में कोई खास देर नहीं लगी। पोंजी के ही शब्दों में, 'सर्वशक्तिमान डालर ही मेरा एकमात्र लक्ष्य था। उस पर स्वामित्व कायम करने के बाद कोई भी व्यक्ति आलोचनाओं और उसे हथियाने के क्रम में की गई किसी भी हरकत से परे हो जाता है।Ó
उसे पता था कि किसी एक व्यक्ति से सौ डालर लेने के बदले वह दस अलग-अलग लोगों से प्रति व्यक्ति दस डालर मांग सकता था। इस काम को आसान बनाने के लिए ही उसने सेक्युरिटीज एक्सचेंज कंपनी की स्थापना की जिसके तहत वह लोगों से पैसे आसानी से मांग सकता था। उसे अहसास हो गया कि वह इस दिशा में कैसे आसानी से बढ़ सकता है।
उसने जो कंपनी बनाई उसका कर्ताधर्ता वह स्वयं था। वह आरंभ से ही साझेदारी व्यवस्था के खिलाफ था क्योंकि उसे अहसास था कि साझेदारी के बीच मतभेद होने पर वह झगड़े का रूप ले सकता है। उसने साझेदारों के बतौर अपने कुछ रिश्तेदारों को शामिल किया जिससे कम से कम विवाद हो। रजिस्टे्रशन के बाद उसकी अपनी कंपनी अस्तित्व में आ गई। कंपनी का अपना पता ठिकाना हो गया। लेटर-हेड्स छप गए और साथ ही किसी प्रकार से अन्य जरूरी स्टेशनरी का जुगाड़ हो गया। इसके साथ ही उसे पचास डालर जुर्माना पड़ा। पोंजी के ही शब्दों में, 'चूंकि हम सब जुआड़ी हैं इसलिए हम सब आसान से धन कमाने की फिराक में लगे रहते हैं। हम चाहतेहैं कि आसानी से उसे बटोरा जाय। यदि हम इसमें कामयाब नहीं होते हैं तो आसानी से धनवान बनने का लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सके।Ó
लोगों ने उसे बिना झिझक प्रतिव्यक्ति दस डालर दे दिए। उसने पैंतालीस दिनों के बाद हरेक को पंद्रह डालर दिए तो उनकी झिझक खत्म हो गई और उनके पास जो भी नकदी थी वे उसे दे आए। वे साथ में अपने दोस्तों को भी ले आए। कहना न होगा कि निवेशकों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी। हर संतुष्ट निवेशक स्वयं उसका प्रचारक बन गया और इस प्रकार उसका धंधा आगे बढ़ा। जुलाई 1920 के अंत तक निवेशकों की संख्या 30,219 पर पहुंच गई। जिनके पास कंपनी के एक करोड़ पचास लाख डालर के शेयर हो गए। हर जगह कंपनी के शेयरों के लिए आपाधापी मच गई।
अनेक लोगों ने सवाल खड़े किए कि मात्र 90 दिनों में 40-50 प्रतिशत लाभांश देना कैसे संभव है किन्तु इंटरनेशनल रिप्लाई कूपन दिखलाने और पूरी प्रक्रिया के स्पष्टीकरण के बाद वे संतुष्ट होकर चले गए।  वर्ष 1907 में रोम में आयोजित इंटरनेशनल पोस्टल कांग्रेस के निर्णय के विषय में जब उन्हें बतलाया गया तब वे संतुष्ट होकर चले गए। इस दौरान पोंजी ने पुलिस अधिकारियों और पोस्टल इंस्पेक्टर से अच्छे रिश्ते कायम कर लिए। देखते ही देखते हर रोज करीब एक हजार डालर उसके यहां जमा होने लगे। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था। इसी बीच पोंजी ने किसी इतालवी को कुछ कूपन दिए मगर अनेक जर्मन तथा अन्य लोगों ने कूपन लेने से मना कर दिया।
ऊपर हमने जिस इतालवी का जिक्र किया है वह पोंजी के पास आया और बतलाया कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई पोंजी की साख दांव पर थी। पोस्ट मास्टर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया जिसकी खबर पोंजी तक पहुंच गई मगर वह सतर्कता के साथ आगे बढ़ा। उसने स्वयं के दफ्तर खोले जहां इन कूपनों का विनिमय पैसों के साथ हो सके। पोंजी को निरंतर सफलता मिलती ही गई। उसने काफी संपत्ति अर्जित की और एक बढिय़ा मोटर गाड़ी खरीद ली जैसे गाड़ी उस समय बहुत कम लोगों के पास थी।
पोंजी ने पिरामिड स्कीम को बढ़ावा दिया। इस स्कीम के तहत एक गैर टिकाऊ और अवैध व्यावसायिक मॉडल जन्म लेता है। ऐसे लोगों को इस स्कीम के तहत लाया जाता है जो न कोई ठोस निवेश लाते हैं और न ही उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं को जनता के बीच ले जाते हैं।
किसी भी पिरामिड स्कीम के तहत लोगों को मजबूर किया जाता है कि वे भुगतान करें और उसमें शामिल हो जाएं। उसके आयोजक शामिल होने वाले नए सदस्यों से वादा करते हैं कि उनसे लिए जाने वाले धन का एक हिस्सा उन्हें दिया जाएगा। उनसे कहा जाता है कि वे नए सदस्यों को आकर्षित करें और वे जितनी ही अधिक संख्या में उन्हें लाएंगे उनको उसी अनुपात में पैसे मिलेंगे। साथ ही संगठन के शीर्ष पर बैठे निर्देशक भी पैसे पाएंगे। निदेशकों के लिए यह स्कीम काफी आकर्षक होती है। इस प्रकार पुराने सदस्यों को नए सदस्य भर्ती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
इस प्रकार के संगठनों की दिलचस्पी उत्पादों या सेवाओं को बेचने में नहीं होती। राजस्व प्राप्ति का एक ही जरिया होता है कि वे अधिकाधिक सदस्यों को संगठन के साथ जोड़ें। अंतत: एक सीमा के बाद सदस्यों को भर्ती कर पाना संभव नहीं होता और मौजूदा सदस्य इस स्कीम का लाभ नहीं उठा पाते।
पोंजी स्कीम हो या पिरामिड स्कीम दोनों ही एक-दूसरे के पर्याय हैं। पोंजी स्कीम के अनेक रूप हैं जिन पर जेम्स एल. पेरिस ने प्रकाश डाला है। पेरिस के अनुसार, लालच के वशीभूत होकर लोग अपना होशोहवास खो बैठते हैं। कालक्रम में वे ठग बन जाते हैं। यहां पेरिस की श्रीमती फें्रजर का जिक्र करते हैं। वे धार्मिक कार्यों में संलग्न होने के बावजूद हर दिन सौ से अधिक लोगों को प्रॉफिटेबुल सनराइज अॅपाच्र्युनिटी में शामिल कर रही थीं। जहां प्रतिदिन 2.7 प्रतिशत लाभांश देने का वायदा कर रही थीं। उनका कहना था कि इसके शत-प्रतिशत गांरटी है। यह पूछे जाने पर कि कोई भी कंपनी इतना अधिक लाभांश कैसे दे सकती है, उनका उत्तर था कि  उपर्युक्त कंपनी के मालिक रोमन नोवाक काफी परिश्रमी व्यक्ति हैं और उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। नोवाक का दावा है कि वे पेशेवर लोग हैं जिन्हें इस प्रकार की स्कीम को चलाने में महारत हासिल है। जब भी कोई व्यक्ति अपनी कमाई नोवाक को सौंपता है तब वह अल्पकालिक व्यवसायों में लगाता है जहां जोखिम कम से कम हो।


 

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