पोंजी का...

गिरीश मिश्र : आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व इटली में जन्मे और कनाडा में कारोबार कर अमेरिका के बोस्टन शहर में नए-नए प्रकार के धोखाधड़ी के धंधों की शुरुआत करने वाले चाल्र्स पोंजी ने अपनी धाक जमाई। उन्होंने बतलाया कि उनके पास ऐसी युक्ति है जिससे लोग अतिशीघ्र अधिकाधिक धन बटोर सकते हैं।...

डॉ. गिरीश मिश्र

आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व इटली में जन्मे और कनाडा में कारोबार कर अमेरिका के बोस्टन शहर में नए-नए प्रकार के धोखाधड़ी के धंधों की शुरुआत करने वाले चाल्र्स पोंजी ने अपनी धाक जमाई। उन्होंने बतलाया कि उनके पास ऐसी युक्ति है जिससे लोग अतिशीघ्र अधिकाधिक धन बटोर सकते हैं। उसके नाम से प्रचलित पोंजी स्कीम को वर्ष 1964 में ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी शब्दकोष ने यों परिभाषित किया है: ''पोंजी स्कीम धोखाधड़ी का वह रूप है जिसमें लोगों का विश्वास एक ऐसे अस्तित्वहीन उद्यम में होता है जिससे आरंभ में जुडऩे वालों की चांदी होती है क्योंकि उनको आगे आने वालों के निवेश से फायदा होता है।ÓÓ
आए दिन लोगों के पास पत्र पहुंचते हैं जो उन्हें अपनी नवस्थापित कंपनी से जुडऩे का आग्रह करते हैं क्योंकि उन्हें अविलंब यानी बिना अंतराल के फायदा मिलेगा। जब वे उस कंपनी से जुड़ते हैं तब उनसे कहा जाता है कि उनमें से हर कोई दस-दस व्यक्तियों को कंपनी के साथ जुडऩे के लिए प्रोत्साहित करे और वे निर्धारित शुल्क अदा करें। इस तरह यह सिलसिला बढ़ता ही जाता है।
हमारे अपने देश में सहारा, शारदा आदि अनेक छोटी-बड़ी कंपनियों ने पोंजी के नुस्खे का सहारा लेकर अकूत धन कमाए हैं। उनमें से कुछ कानून की गिरफ्त में आई हंै तो अन्य बटोरी गई धनराशि लेकर चंपत हो गई हैं। अजीब बात है कि हमारे अपने देश में चाल्र्स पोंजी और उनकी योजनाओं, विशेषकर पिरामिड स्कीम, के बारे में न कुछ विशेष लिखा गया है, और न बहस चली है।
आइए, हम रोज वैली नामक कंपनी की चर्चा करें। इस कंपनी के चेयरमैन गौतम कुंडु ने कभी दावा किया था कि वे शारदा कंपनी के सुदीप्त सेन जैसे नहीं हंै कि वे कानून की गिरफ्त में आ जाएं। याद रहे कि सुदीप्त सेन शारदा कंपनी के सर्वेसर्वा थेे जिससे अनेक राजनीतिज्ञ जुड़े रहे हैं। उनमें से कुछ विधायक, सांसद और ममता सरकार के मंत्री रहे हैं। तत्काल उनमें से कई जेल में बंद हैं।
मार्च में गौतम कुंडु इंफोर्समेंट डायरेक्टोरेट द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए और उन पर आरोप लगा कि वे पोंजी स्कीम चला रहे हैं। कहते हैं कि रोज वैली सहारा समूह के बाद पैसे बटोरने वाली सबसे बड़ी कंपनी है। याद रहे कि सहारा कंपनी के मालिक सुब्रतो राय महीनों से जेल में बंद हंै। इंफोर्समेंट डायरेक्टोरेट के अनुसार, रोज वैली ने पंद्रह हजार करोड़ रुपए की रकम बटोरी है मगर ऑल इंडिया डिपोजिटर्स एसोशिएशन के अनुसार, उसने लगभग चालीस हजार करोड़ रुपए जमा किए हैं। शारदा घोटाले की तुलना में उसके द्वारा बटोरी गई रकम 16 गुना अधिक है।
तत्काल रोज वैली के मालिक गौतम कुंडु और शारदा के सर्वेसर्वा सुदीप्त सेन, दोनों ही जेल में बंद हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद अब तक यह पता नहीं चल पाया है कि जमाकर्ताओं से प्राप्त रकम का सुदीप्त सेन ने क्या किया है। उसका आबंटन कैसे हुआ है। इसके विपरीत गौतम कुंडु ने अनेक परिसंपत्तियों में बटोरी गई रकम लगाई है। उनकी परिसंपत्तियां सारे भारत में फैली हैं।
रोज वैली होटल्स और इंटरटेनमेंट के पास करीब 23 परिसंपत्तियां हैं जो लगभग सारे भारत में फैली हुई हैं। अनुमान है कि इन परिसंपत्तियों का मूल्य पच्चीस हजार करोड़ रुपए आंका गया है। इन परिसंपत्तियों को बेचकर कुछ निवेशकों के पैसे अदा किए जा सकते हैं किन्तु उनकी बिक्री पर तत्काल रोक है। भारतीय प्रतिभूत्ति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने जनवरी 2011 में उसकी परिसंपत्तियों की बिक्री पर रोक लगा दी थी। राज्य सरकार ने कंपनी के 26 हजार बैंक खातों के परिचालन पर पाबंदी लगा दी थी। इन खातों में तकरीबन आठ सौ से एक हजार करोड़ रुपए पड़े हुए हंै।
आज से 18 वर्ष पूर्व गौतम कुंडु के बड़े भाई काजल कुंडु ने रोज वैली होटल्स व इंटरटेनमेंट की शुरूआत की थी और साथ ही रोज वैली रियल इस्टेट और कंस्ट्रक्शन की स्थापना की थी मगर इनका कोई खास महत्व नहीं बन पाया था। वर्ष 2001 में काजल कुंडु ने रोज वैली चेन मार्केटिंग की स्थापना की जो वर्ष 2002 में जीवन बीमा निगम का एजेंट बन गई। दुर्भाग्वश वर्ष 2003 में शिलांग के समीप बारापानी झील में उनकी मोटरगाड़ी डूबने के कारण उनका पूरा परिवार समाप्त हो गया। इसके बाद गौतम कुंडु सारी कंपनियों के मालिक हो गए।
वर्ष 2003 और 2008 में रोज वैली चेन मार्केटिंग की मान्यता का नवीनीकरण हुआ और वह जीवन बीमा निगम के साथ जुड़ी रही। वर्ष 2012 में भारत की इंश्योरेंस रेगुलेटरी और डेवलपमेंट अथॉरिटी ने उसके काम-काज को लेकर कतिपय आपत्तियां उठाईं। कहा गया कि कंपनी बीमा कराने वालों से तरह-तरह की फीसें उगाह रही हैं। जिसके लिए वह अधिकृत नहीं है। उदाहरण के लिए कंपनी प्रशासकीय फीस और सर्विस शुल्क वसूल रही है। कहा गया कि वसूली गई रकमें अन्य रोज वैली कंपनियों को हस्तांतरित की जा रही हंै। इतना ही नहीं, रोज वैली चेन मार्केटिंग जनता से वसूली गई रकमों को अचल संपत्ति में लगा रही है और मेहमाननवाजी से जुड़े कार्यों पर खर्च कर रही है। इन तमाम आरोपों की छानबीन की जा रही है कि उसमें कितनी सच्चाई है। यह तथ्य उभर कर सामने आया है कि ग्रामीण इलाकों में विश्रामस्थल और होटल बनाए गए हैं।
पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार का रौबदाब कमजोर पडऩे के साथ ही रोज वैली के अच्छे दिन शुरू हो गए। कई लोगों का मानना है कि वर्ष 2008 में ग्राम पंचायत चुनावों के परिणामों के आने के साथ ही रोज वैली के धंधों का फैलाव शुरू हुआ। उसने मीडिया से जुड़े कार्यों में निवेश करना आरंभ किया और मीडिया ने उसको काफी बढ़ावा दिया और उसके कार्यों की प्रशंसा आरंभ हुई।
वर्ष 2009 में वामपंथी सरकार इस बात को लेकर चिंतित हो गई कि बड़े पैमाने पर कतिपय धंधे पैसे बटोरने में लगी हुई है। उसने सरकार के आर्थिक अपराध से जुड़े धंधों की जांच-पड़ताल आरंभ करवा दी। किन्तु इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नहीं दिखा। ऊंचे मुनाफे के वायदे से ललचाकर आम लोगों ने अपनी कमाई के पैसे आकर्षक योजनाओं में लगाना आरंभ कर दिया। मार्च 2011 के अंत तक रोज वैली रियल इस्टेट और कंस्ट्रक्शन के जरिए 1358 करोड़ रुपए के मुकाबले 2016 करोड़ से अधिक की राशि बटोरी। आमजन के बीच उसमें पैसे लगाने की होड़ सी लग गई थी। रोज वैली के अतिरिक्त शारदा, प्रयाग, आईकोर आदि अनेक कंपनियों ने भी काफी पैसे बटोरे।
इसको देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने सेबी को जांच करने के लिए कहा। स्टॉक मार्केट से जुड़े नियामक इस प्रकार की अनेक स्कीमों की जांच शुरू की और उनके खिलाफ अनेक निर्देश भी दिए। जुलाई 2013 में शारदा घोटाला सामने आया जिसने सरकार को चौंकन्ना बना दिया। सेबी ने रोज वैली हॉली डे मेम्बरशिप योजना के खिलाफ एक आदेश जारी किया। उस पर रोक लगा दी गई। इस दौरान यह तथ्य सामने आया कि आर्थिक अपराध शाखा काफी कुछ बिखर सा गया है जिससे वह निष्क्रिय हो गया है। यदि वह सक्रिय रहती तो शारदा और रोज वैली से जुड़े घोटालों को समय रहते काबू किया जा सकता था। स्पष्ट है कि सरकार की निष्क्रियता से इन कंपनियों को बल मिला।
कागज पर रोज वैली के तहत तीस से अधिक कंपनियां सक्रिय दिखती हैं। इनमें रोजवैली एयर लाइंस, रोजवैली माक्रोफाइनेंस, रोजवैली फैशन, रोजवैली कंसलटेंसी, रोजवैली वेविरेजेज, रोजवैली इंफोटेक और रोजवैली हाउसिंग फाइनेंस शामिल हैं। कहना न होगा कि कंपनियों की गतिविधियों और मौद्रिक स्रोतों पर सरकारी निगाह न रखने या अनदेखी करने के कारण ही उनका निरंतर फैलाव हुआ है।
रोजवैली से जुड़ी मुख्य कंपनियां हैं: रोजवैली होटल्स एंड इंटरटेनमेंट, रोजवैली फिल्मस् ब्रांड वैल्यू कम्युनिकेशंस, एड्रिजा और रोजवैली इंडस्ट्रीज प्रमुख हैं। ब्रांड वैल्यू कम्युनिकेशंस अनेक क्षेत्रीय अखबारों का प्रकाशन करने के साथ ही न्यूज टाइम बांग्ला, रूपाशी बांग्ला और धूम म्युजिक का संचालन करता है। एड्रिजा आभूषणों की दुकानें चलाता है, रोजवैली इंडस्ट्रीज डिब्बाबंद मिनरल वाटर तथा अन्य सामग्रियां बेचता है।
कई लोगों को मानना है कि रोजवैली के न होने से अच्छी फिल्मों का अभाव हो जाएगा। उसने अब तक अनेक उम्दा फिल्में बनाई हैं जिससे शहरी जनता के बीच वह काफी लोकप्रिय हुआ है। उसने बांग्ला फिल्म उद्योग की अनेक नामी गिरामी हस्तियों के साथ काम किया है। इनमें गौतम घोष, कौशिक गांगुली और अनिक दत्त प्रमुख हैं।
कहते हैं कि रोजवैली ने अपने से जुड़े उद्योगों में निवेश किया है जब कि शारदा के सेन ने टेलीविजन न्यू•ा चैनल्स में ही सबसे अधिक पैसे लगाए हैं। उसने तृणमूल कांग्रेस के साथ जुडऩे की भरपूर कोशिश की है। कहते हैं कि केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो को लिखे एक पत्र में आरोप लगाया था कि उसको सत्तारूढ़ लोगों ने ही धोखा दिया है। कुंडु की स्थिति कुछ अलग है। सत्ता में बैठे लोगों ने भले ही उनकी मदद की हो मगर उन्होंने अपने व्यवसायों मेें निवेश किया है और कोलकाता के व्यावसायिक जगत में उनकी काफी इज्जत रही है।
जैसा कि हम कह चुके हैं, शारदा हो या रोजवैली चाल्र्स पोंजी द्वारा निर्दिष्ट मार्ग पर ही चलकर कम से कम समय में अधिकाधिक पैसे कमाने में लगे रहे हैं। आज बाजार के काफी कुछ आ•ााद होने के कारण पोंजी का प्रभाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। जरूरत है कि हम उसके विभिन्न आयामों को जानें।


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