पैसा कमाने की ललक

गिरीश मिश्र : भारत के नवोदित पंूजीपति वर्ग पर येन-केन-प्रकारेण पैसा बटोरने की धुन सवार है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि वह पोंजी के सुझाए मार्ग से आगे बढ़ रहा है या कोई अन्य हथकंडा अपना रहा है। सहारा, शारदा, रोजवैली आदि तो पूर्णतया पोंजी के रास्ते पर चल रहे हैं वहीं कतिपय अन्य कंपनियों ने एक नया नुस्खा पैसे कमाने के लिए अपनाया है।...

डॉ. गिरीश मिश्र

भारत के नवोदित पंूजीपति वर्ग पर येन-केन-प्रकारेण पैसा बटोरने की धुन सवार है। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि वह पोंजी के सुझाए मार्ग से आगे बढ़ रहा है या कोई अन्य हथकंडा अपना रहा है। सहारा, शारदा, रोजवैली आदि तो पूर्णतया पोंजी के रास्ते पर चल रहे हैं वहीं कतिपय अन्य कंपनियों ने एक नया नुस्खा पैसे कमाने के लिए अपनाया है।
देश के अन्दर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और सरकार द्वारा निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना पर लगे प्रतिबंधों के नरम होने के परिणाम स्वरूप तमाम लोगों ने नए-नए विश्वविद्यालयों की स्थापना कर पैसे बटोरने शुरू कर दिए हैं। यहां तक कि पंजाब के एक हलवाई भी इस क्षेत्र में कूद पड़ा है। यह अलग बात है कि विश्वविद्यालय की स्थापना और उसके संचालन के संबंध में कोई विशेष इल्म नहीं है।
भारत के बाहर से भी कई नामी-गरामी विश्वविद्यालय यहां आए हैं और वे भी भरपूर पैसा कमा रहे हैं। इतना ही नहीं बल्कि भारतीय निजी विश्वविद्यालयों ने भी विदेश का रूख किया है और वे भी देश से बाहर अपनी शाखाएं स्थापित कर पैसा कामाने में जुट गए हैं। कहना न होगा, कि उनका ध्यान शिक्षा की गुणवत्ता पर कम, पैसा कमाने पर कहीं अधिक है।
एमिदी विश्वविद्यालय के कुलपति अतुल चौहान ने बतलाया है कि अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, सिंगापुर और युनाइटेड अरब एमिरेट सहित अनेक देशों में अपनी शाखाएं खोल रखी हैं। अक्टूबर 2015 में वह रूमानिया में अपनी शाखा स्थापित करने जा रही है। आने वाले वर्षों में वह आस्ट्रेलिया, जर्मनी, ब्राजील, और जापान में उसकी शाखाएं स्थापित की जानी है। इन देशों में शिक्षा अंग्रेजी या उनकी अपनी भाषाओं के माध्यम से दी जाएगी, यह बात स्पष्ट नहीं है। कहने को तो एमिटी समेत वे सारे विश्वविद्यालय जिन्होंने विदेश का रूख किया है वे मुनाफा कमाने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते मगर उनको स्थापित करने वाली संस्थाओं की पूरी दिलचस्प्ी पैसा कमाने में है।
एमिटी का कैम्पस नोएडा में है जहां उसका विस्तार कई एकड़ में फैला है। इसी प्रकार गुडगांव में भी उसका बड़ा कैम्पस है मगर साकेत जहां उसका जन्म हुआ वहां उसका फैलाव असंभव है क्योंकि वह एक प्राथमिक स्कूल के लिए निर्दिष्ट भूमि पर राजनीतिक लाग-डांट के तहत आ गया। वहां खेलने-कूदने के लिए जगह नहीं है। उसके मालिकों ने पास की कालोनी के लिए निर्दिष्ट पार्क की दीवार तोड़कर उसे हड़पने की असफल कोशिश की है। ऐमिटी के प्रमुख अतुल चौहान के अनुसार अगले दास वर्षो में उसका इरादा पचास देशों में अपना कारोबार शुद्ध करने का है।
एमिटी 240 से अधिक पाठ्यक्रमों में अपनी महारत होने का दावा करता है। इसमें इंजीनियरिंग और व्यावसायिक शिक्षा की प्रमुखता है। भारत में उसका फैलाव बीस से अधिक शहरों में है जहां लगभग एक लाख पच्चीस हजार विद्यार्थी हैं। देश से बाहर तकरीबन दस हजार विद्यार्थी एमिटी की शाखाओं में अभी तक प्रवेश ले चुके हंै।
एमिटी के कई आलोचक उसके उद्भव और आंरभिक धनराशि के निवेश को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठाते हैं। कई प्रतिद्वंद्वियों का मानना है कि उसके विस्तार से यह बात स्पष्ट नहीं होती कि उसके पास शैक्षिक संस्कृति भी है। उसे उच्च शैक्षणिक स्तर को लेकर लोगों को आवश्वस्त करना होगा। देश से बाहर जाकर, उसके विस्तार से यह साबित नहीं होता कि उसके पास योग्य शिक्षक और उच्च शैक्षणिक स्तर है।
आज से कुछ वर्ष पहले एमिटी ने लंदन में अपना कैम्पस खोलने की बात की थी और 10 करोड़ पौंड का इसके लिए निवेश करने का इरादा किया था मगर उसका इरादा आरंभ में ही धरा का धरा रह गया। उसको विद्यार्थियों की पर्याप्त संख्या नहीं मिली। अत: उसे वहां से खिसक कर दुबर्ई का रूख करना पड़ा जहां उसे 15 एकड़ जमीन खरीद कर एमिटी विश्वविद्यालय को नया कैम्पस बनाना पड़ा। कहां अभी बीस हजार विद्यार्थी हैं।
कहना न होगा कि भारत में अनेक आईआईटी और इंजीनियरिंग कालेज है जो सरकारी पैसे से चलते हैं। वहां फीस की रकम कम है तथा हर आय वर्ग  के विद्यार्थी उसे दे पाने में सक्षम है। यही बात है कि पैसे वाले विदेश में अपने कैम्पस बनाते विद्यार्थियों को आकृष्ट करते तथा पैसे कमाते हैं। अनुमान है कि 2020 ई. तक भारत में चार करोड़ 20 लाख विद्यार्थी उच्च शिक्षा विशेषकर तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने को इच्छुक होंगे। हमारे यहां 35,000 कालेज और 700 विश्वविद्यालय हैं जिनमें से अधिकतर सरकारी पैसों से संचालित हैं। भारत से बाहर 28 लाख भारतीय मूल के लोग हैं तथा हर वर्ष दो लाख भारत से विदेश उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं। कहना न होगा कि बाहर जाने वाले इन अधिकतर विद्यार्थियों के परीक्षाफल देश के अच्छे कालेजों में प्रवेश कराने में अक्षम  होते हैं।
देश के बाहर जाने वाले धनी परिवारों मगर अच्छे अंक प्राप्त न करने वालों विद्यार्थी भारतीय निजी विश्वविद्यालयों के विदेशी कैम्पस के लिए मुख्य आकर्षण होते हैं। उदाहरण के लिए दुबई में हर वर्ष तेरह हजार डालर खर्च आएगा। चार वर्षों में कुल व्यय बावन हजार डॉलर आएगा और वहां प्रवेश करने वाले विद्यार्थियों को आसानी से विदेशी डिग्री मिल जाएगी और रोजगार के बाजार में उनकी पूछ बढ़ेगी और परिवार की लाग डाट से अच्छी नौकरी मिल सकेगी।
भारत में ऐसे धनी नौजवानों की कमी नहीं है जिनकों परीक्षा में काफी कम अंक मिले हैं। उन पर विदेश में कार्यरत भारतीय शिक्षा संस्थानों की विशेष नजर होती है। मनीपाल में यह धंधा वर्षों से होता रहा है। वहां छ: विश्वविद्यालयों की एक श्रंृखला है। उनमें 190 सीटों के लिए डॉक्टर बनने के इच्छुक 60 हजार लोग प्रतिद्वंद्विता में बैठते हैं। सबको मालूम है कि कर्नाटक स्थित इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों के बावजूद अपनी जेब ढीली करनी होती है। स्पष्टतया प्रतिस्पर्धा में प्राप्त अंकों के आधार पर ही प्रवेश नहीं मिल पाता बल्कि पर्याप्त दक्षिणा भी देनी होती है। कहते हैं कि यह रकम दोनों सफेद और काले में देनी पड़ती है। नेपाल स्थित पोखरा में स्थित मेडिकल संस्थान में प्रतिद्वंद्विता कुछ कण है। वहां का संस्थान त्रिभुवन विश्वविद्यालय से संबद्ध है। वहां से उत्तीर्ण होने के बाद केवल एक मेडिकल काउंसिल की परीक्षा पास करने के बाद प्रैक्टिस की इजाजत मिल जाती है।
देश से बाहर भारतीय संस्थानों को स्थापित कर अच्छी तरह संचालित करने में सबसे अधिक सफलता मनीपाल समूह को मिली है। वर्ष 1953 में उसकी स्थापना हुई थी। मलेशिया में उसके दो कैम्पस हैं जहां देश के 20 प्रतिशत डॉक्टरों को प्रशिक्षण मिला है। नेपाल, दुबई और एंटीगुआ में भी उसके प्रशिक्षण केन्द्र हैं। मनीपाल समूह के उपकुलपति विनोद भट्ट के अनुसार उसका इरादा श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका में अपने कैम्पस स्थापित करने का है। उनका जानना है कि उसने भारतीयों के अतिरिक्त उन देशों के प्रशिक्षणार्थियों को बड़ी संख्या में आकर्षित किया है जहां वह कार्यरत है। उदाहरण के लिए लगभग दस हजार लोगों ने वहां से डिग्रियां प्राप्त की है। जो मूलत: मलेशिया के रहने वाले हैं। मनीपाल के विभिन्न कैम्पसों में प्रशिक्षित चार हजार डॉक्टर और छ: हजार इंजीनियर आज अमेरिका में कार्यरत हैं।
पिलानी स्थित बिडला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी एण्ड साईंस भी देश से बाहर कार्यरत् है। उसके दुबई स्थित प्रभारी रमेन्द्र नारायण साहा बतलाते हैं  कि जो पैसे वाले लोग देश के अंदर पिलानी में प्रवेश पाने में अक्षम होते हैं उनमें से काफी लोग पैसों के बल पर देश से बाहर बिडला इस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालोजी एण्ड साईंस में प्रवेश पा लेते हैं। उसने वर्ष 2000 में दुबई में अपनी शाखा स्थापित की। उम्मीद है कि अगले चार वर्षों के दौरान वहां विद्यार्थियों की संख्या 1800 से बढ़कर 2500 हो जाएगी। उनमें से अधिकतर भारतीय हैं जो भारत में इंजीनियरिंग या बायोटेक्नोलोजी में प्रवेश पाने में अक्षम होते हैं मगर पैसों के बल पर दुबई में प्रवेश पा लेते हैं।
ब्रिटेन स्थित संस्था ऑबजर्वेटरी ऑन बोर्डरलेश हायर एजुकेशन के अनुसार वर्र्ष 2006 की तुलना में वर्ष 2020 में अपने देश से बाहर 82 की अपेक्षा 280 कैंपस खुलने की उम्मीद है। इनमें से अधिकतर विकासशील देशों में स्थित हैं। भारतीय संस्थानों ने अपने कारोबार अफ्रीका और एशिया में ही बढ़ाए हैं।
कहना न होगा कि पैसे वालों के बच्चे भारत में प्रवेश न मिलने पर भी थैलियों के जोर से विदेेश स्थित भारतीय या किसी अन्य संस्थान से डिग्री लेकर आ जाते हैं और रसूख के कारण ऊंचे पदों पर चले जाते हैं। यदि उनके परिवार की अपनी कोई कंपनी हो तो वे उसमें लग जाते हैं और निरंतर पदोन्नति के बाद उसके प्रबंधन में आ जाते हैं।


 

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