पेरिस हमला और मीडिया विमर्श

शेष नारायण सिंह : पेरिस में 13 नवम्बर को हुए हमले के असर ने पूरी दुनिया को दहला दिया है। जब मुंबई में 26 नवम्बर 2008 को हमला हुआ था तो दुनिया की राजधानियों में इतनी दहशत नहीं थी। यह अलग बात है कि वह हमला इससे ज़्यादा खतरनाक था लेकिन यूरोप और अमेरिका के राजनेता उसे वैश्विक समस्या मानने को तैयार ही नहीं थे। ...

शेष नारायण सिंह

पेरिस में 13 नवम्बर को हुए हमले के असर ने पूरी दुनिया को दहला दिया है। जब मुंबई में 26 नवम्बर 2008 को हमला हुआ था तो दुनिया की राजधानियों में इतनी दहशत नहीं थी। यह अलग बात है कि वह हमला इससे ज़्यादा खतरनाक था लेकिन यूरोप और अमेरिका के राजनेता उसे वैश्विक समस्या मानने को तैयार ही नहीं थे। हद से हद उसको भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला मानकर रफा-दफा कर दिया गया था। सच्ची बात यह है कि अगर मुंबई हमले को गंभीरता से लिए गया होता तो पेरिस पर हुए हमले को रोका जा सकता था। अब पेरिस में हुए हमले के बाद अमेरिका और यूरोप की राजधानियों में भारी हलचल है। अब यह तय माना जा रहा है कि पश्चिमी देशों में मुसलमानों के प्रति अब वह  रवैया नहीं रहेगा। अमेरिका में तो यहां तक चर्चा चल पड़ी है कि मुसलमानों के लिए परिचय पत्र तक जारी किया जाए।
अमेरिकी अखबार न्यूयार्क टाइम्स के अनुसार, फ्रांस और बेल्जियम ने अपने सुरक्षा बलों के हाथ मजबूत करने के लिए जरूरी कार्रवाई शुरू कर दिया है। इस हमले के बाद पूरी यूरोपीय आबादी सकते में है और दोनों ही देशों ने तय किया है कि मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दों को थोड़ा विराम देकर अपने नागरिकों की सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता माना जाएगा। करीब डेढ़ दशक पूर्व अमेरिका पर 11 सितम्बर को हुए आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका में पैट्रियट एक्ट नाम का कानून बना था। इस कानून के तहत इंटेलिजेंस एजेंसियों के अधिकार बढ़ा दिए गए थे। उम्मीद की गई थी कि इससे आंतरिक सुरक्षा को चाक चौबंद किया जा सकेगा। अमेरिकी सरकार का दावा है कि इससे फायदा हुआ भी था। आजकल यह कानून उतनी सख्ती से नहीं लागू किया जा रहा है जितनी कि शुरु में की जाती थी।
 यूरोप के देश आतंकवाद पर काबू करने के सन्दर्भ में दूसरी दिशा में बढ़ रहे हैं। इस काम में फ्रांस, बेल्जियम और ब्रिटेन सबसे आगे हैं। तीनों ही देशों में मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत ज़्यादा है और उनमें सीरिया या पश्चिम एशिया के अन्य देशों से आने वाले आसानी से खप जाते हैं। सही बात यह है कि यह सरकारें घबरा गई हैं और इसी घबराहट के मद्देन•ार, यूरोपीय नागरिकों के पासपोर्ट और वीजा मुक्त आवागमन पर रोक लगाने की कोशिशें कानूनी जामा धारण कर सकती हैं।
ब्रिटेन के अखबार इंडिपेंडेंट की खबर है कि  दुनिया के ताकतवर देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में एक ऐसा प्रस्ताव लाने की योजना बना रहे हैं जिसके तहत एक साझा लड़ाई के जरिये इराक और सीरिया से जेहादियों का 'उन्मूलनÓ किया जा सके। यह खबर एक्सक्लूसिव है यानी अन्य किसी बड़े अखबार में इसकी चर्चा नहीं है। इसका मतलब यह है कि सीरिया और इराक की इस्लामिक स्टेट की प्रभुता वाले इलाकों में सैनिक कार्रवाई करने की योजना पर गंभीरता से विचार हो रहा है। लगता है कि यूरोप और अमेरिका वही गलती दोहराने की फिराक में हैं जो अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान में किया था।
सिनाई के शर्म-अल-शैख में रूसी विमान पर हुई बमबारी और पेरिस में हुए हमले के बाद यूरोप के देशों में इस मामले में एक राय बनती दिख रही  है।  अखबार लिखता है कि इसी हफ्ते इस्लामिक स्टेट वालों ने एक चीनी नागरिक को भी बेरहमी से मार डाला था और वीडियो पब्लिक डोमेन में डाल दिया था। इस तरह से सुरक्षा परिषद् के पांचों वीटो पावर वाले देशों के नागरिकों की हत्या का इलजाम अब इस्लामिक स्टेट के खाते में दर्ज हो चुका है। फ्रांस के अधिकारियों ने बताया कि इस तरह का एक प्रस्ताव रूस की तरफ से सुरक्षा परिषद में दिया गया है, लेकिन उससे भी सख्त भाषा वाला एक प्रस्ताव फ्रांस ने दे दिया है। उम्मीद है कि यह प्रस्ताव अगले 72 घंटों के अन्दर पास करा लिया जाएगा। फ्रांस को मालूम है कि अमेरिका और ब्रिटेन तो उसके प्रस्ताव के पक्ष में हैं ही, रूस और चीन भी इस प्रस्ताव का विरोध नहीं करेगें। और इस तरह यह कार्यक्रम वीटो का शिकार नहीं होगा। रूस के प्रस्ताव में सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद का सहयोग लेने की बात भी की गई है। जाहिर है अमेरिका के दोस्त राष्ट्र इस प्रस्ताव को नहीं मांगें क्योंकि इस्लामिक स्टेट के मददगार यह देश अब तक सीरिया के शिया राष्ट्रपति बशर-अल-असद के खिलाफ अभियान चला रहे हैं।
अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने पेरिस हमले के कथित सरगना, अब्दुल हामिद अबाउद की पेरिस के मोहल्ले सेंट-डेनिस में मुठभेड़ में हुई मौत को प्रमुखता से छापा है। अखबार लिखता है कि आतंकवादियों की उसकी मंडली इसी तरह के कई और हमले करने की फिराक में थी और उसकी योजना बिल्कुल तैयार थी।  इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी यूरोप की सुरक्षा एजेंसियों के सामने खड़ा हो गया है। सीरिया या ईराक से आने वाले शरणार्थी आमतौर पर इस तरह के हमलों में शक के दायरे में आते रहे हैं। लेकिन पेरिस में हुए हमले ने साफकर दिया है कि यूरोप के सबसे संपन्न देशों में रहने वाले मुसलमान भी इस काम में लिप्त हैं। वे यूरोपीय देशों के नागरिक हैं और उनके पास यूरोप के देशों के पासपोर्ट  हैं। जाहिर है कि यूरोप और अमेरिका के बहुत सारे देशों में उनकी आवाजाही पर कोई रोक नहीं है। अखबार ने फ्रेंच सेंटर फॉर एनालिसिस आफ टेररिज्म के अध्यक्ष ज्यां चाल्र्स ब्रिसार्द के हवाले से बताया है कि अगर उतने बड़े हमले के बाद पेरिस हमले का सरगना, उसी शहर के किसी अन्य मोहल्ले में छुपने की हिम्मत जुटा सका तो यह इस बात का संकेत है कि यूरोप के देशों के इंटेलिजेंस इकट्ठा करने वाले अधिकतर संगठन लापरवाह हैं और आतंकवादियों को उनकी कमजोरी की बात की पूरी जानकारी  रहती है।
ब्रिटिश अखबार गार्जियन ने अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान को पहले पृष्ठ पर छापा है जिसमें वे कहते पाए गए हैं कि मुस्लिम अमेरिकियों के लिए एक खास तरह की पहचान बनाई जानी चाहिए जिसमें उनके धर्म के बारे में जानकारी दी गई हो। याहू न्यूज को दिए गए एक इंटरव्यू में डोनाल्ड ट्रंप कहते हैं  कि 'हमें अब कुछ ऐसा काम करना पड़ेगा जिसके बारे एक साल पहले तक सोच भी नहीं सकते थे। इस बात से कुछ लोग नाराज तो होंगे, लेकिन मुझे लगता है कि अब सब इस बात का अनुभव करने लगे हैं कि प्रशासन के लिए सुरक्षा ही सबसे जरूरी हथियार है।Ó ट्रंप कहते हैं कि मुसलमानों की तलाशी अब बिना किसी  वारंट या अधिकारपत्र के की जानी चाहिए और सुरक्षा एजेंसियों को इस तरह के अधिकार दिए जाने चाहिए। उनका दावा है कि मस्जिदों पर निगरानी अभी भी रहती है लेकिन उसको बढ़ा दिया जाना चाहिए।
ब्रिटेन के अखबार टाइम्स ने लिखा है कि पेरिस हमले के सरगना की तलाश में शहर के मोहल्ले, सेंट-डेनिस की घेराबंदी की गई तो वहां एक अन्य महिला संदिग्ध भी मौजूद थी। 26 साल की हुस्ना का जन्म पेरिस में ही हुआ था और उसके माता-पिता कभी मोरक्को से भागकर आये थे। वह किसी कंस्ट्रक्शन कंपनी में मैनेजर के पद पर काम करती थी। घिर जाने के बाद उसने अपने आपको बम से उड़ा दिया। पेरिस की किसी मलिन बस्ती में उसका जन्म हुआ था।  हालांकि वह मुस्लिम परिवार की थी लेकिन उसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं था। वह खूब शराब पीती थी, सिगरेट  पीती थी, नशीली दवाओं का काम करने वालों के साथ अक्सर घूमती- घामती थी और इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ, कुरआन के बारे में कुछ नहीं जानती थी। अखबार को शक है कि वह अपने नशेड़ी साथियों के साथ ही वहां चली गई थी, उसका जिहादी मिशन से कोई मतलब नहीं था।
पिछले एक हफ्ते से पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और यूरोप में 13 नवम्बर के पेरिस हमले ही मुख्य खबर बने हुए हैं।
sheshji@gmail.com


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