पेट की आग

डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया : 18जनवरी 2016 के एक अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित समाचार के अनुसार उत्तर प्रदेश की देवरिया और अमरोहा नगरपालिकाओं में हो रही स्वीपर पदों की भर्ती के लिए अनेक स्नातक और स्नातकोत्तरों के साथ एमबीए और पीएचडी उपाधिधारी उच्चशिक्षित लोगों ने भी आवेदन दिया है।...

डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया

18जनवरी 2016 के एक अखबार के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाशित समाचार के अनुसार उत्तर प्रदेश की देवरिया और अमरोहा नगरपालिकाओं में हो रही स्वीपर पदों की भर्ती के लिए अनेक स्नातक और स्नातकोत्तरों के साथ एमबीए और पीएचडी उपाधिधारी उच्चशिक्षित लोगों ने भी आवेदन दिया है। इस समाचार को पढक़र भला किस जागरुक नागरिक की आत्मा न कांप उठेगी? इस पीड़ा को शब्दों में बयान करना कठिन है। कई बार पीड़ा शब्दों से परे होती है। पीड़ा की भयावहता के सामने शब्द बौने पड़ जाते हैं। जरा कल्पना कीजिए इतनी बड़ी-बड़ी उपाधियां उन्होंने कितने परिश्रम से प्राप्त की होंगी। उपाधियां पाकर भविष्य के लिए कितनी कामनायें होंगी। ऐसे में आवेदन करते समय उनकी खंडित आत्मायें कितना रोई होंगी, कितना उन्होंने अपने मन को मारा होगा? कुछ दिन पूर्व इसी तरह का समाचार अखबारों में पढ़ा कि मध्यप्रदेश में चपरासी के पदों के लिए हजारों आवेदकों ने आवेदन दिया है जिसमें कला, वाणिज्य, विज्ञान के स्नातकों व स्नातकोत्तरों के साथ ही इंजीनियर और डॉक्टर भी थे। डॉक्टर का आशय था- पीएचडी, बीएमएस, बीएएमएस तथा एमबीए भी। जबकि कुल शैक्षणिक योग्यता आठवीं उत्तीर्ण अपेक्षित थी। अभी 23 जून को भोपाल में ही दिल दहलाने वाला एक और समाचार छपा था कि फारेस्ट गार्ड के 2400 पदों के लिए 6 लाख से अधिक आवेदकों ने आवेदन किया जिसमें 34 पीएचडी, 12230 बीई, इंजीनियर, 4024 डिप्लोमाधारी इंजीनियर, 23420 स्नातकोत्तर, 1,17,897 स्नातक, 3,35,792 बारहवीं उत्तीर्ण तथा 10वीं पास की संख्या 1,17,237 थी। मेरिट सूची बनी तो उसमें 1729 बीई, 339 डिप्लोमा इंजीनियर, 14 स्नातकोत्तर तथा 88 स्नातक एवं 4951 बारहवीं एवं दसवीं पास थे। उन आंकड़ों को पढक़र भला किसकी आत्मा न कांपेगी। उल्लेखनीय है कि यह पद चतुर्थ श्रेणी का है और इसका कार्यक्षेत्र जंगलों में संबंधित है। अपने जीवन के शानदार बीस-पचीस वर्ष इन उपाधियों को पाने में जी जान से जुटने वालों पर क्या बीती होगी? कैसी उनकी विवशता है? सारे पूर्व अपेक्षित मनसूबे खंड-खंड हो गये होंगे।
इक्कीसवीं सदी में पहुंचकर हमारा देश कहां पर खड़ा है, उसे जांचने-परखने का यह एक ताजा जीवंत उदाहरण है। क्या यह शिक्षा की निरर्थकता है? अथवा बेकारी और भुखमरी का भयानक रूप?
अखबारों और प्रचार माध्यमों से रोज देखने-सुनने में आता है कि हमारा देश भारतवर्ष बहुत तेजी से प्रगति कर रहा है। विश्व की अनेक संस्थायें और हमारे अर्थशास्त्री सर्वेक्षणों का हवाला देकर इसकी आर्थिक प्रगति आंकड़े आये दिन बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत कर रहे हैं। देश की जनता को बताया जा रहा है कि भारत विश्व में आर्थिक प्रगति की दृष्टि से शीर्ष पर है। उसने अमेरिका, चीन, जापान, आदि को भी पीछे छोड़ दिया है। देश के नियामक जनप्रतिनिधियों और प्रशासन पर बैठे उच्चाधिकारियों के सीना गर्व से फूले हुए हैं। ये दावे से कह रहे हैं कि आम जनता को दस रुपये में भरपेट भोजन कहीं भी मिल रहा है। बीस रुपये रोज कमाने वाले आम मजदूर भी गरीबी रेखा से ऊपर परिगणित किये जा रहे हैं। यह पढक़र गरीब जनता चकित है। वह जानती है कि ऐसे आंकड़े और कर्तव्य वास्तविकता से कितनी दूर है। असल में मुफ्त हवाई यात्रा करने वालों, शानदार महलों-कोठियों में रहने वालों, देश-विदेश के उच्च शिक्षा संस्थानों में पढऩे-पढ़ानेवालों, नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा, मुफ्त बिजली-पानी-टेलीफोन व निवास की सुविधा पाने वालों एअरकंडीशंड रेल-डिब्बों में बिना पैसे की यात्रा सुविधा पाने वालों, बीस-पचीस रुपयों में संसद की कैंटीन में शानदार स्वादिष्ट खाना-खाने वालों को क्या पता कि गरीबी, भुखमरी, बेकारी और अभिशाप क्या है? जाके पैर न फटी बिंवाई। क्या जाने पीर पराई। इन्हें भूखे पेट, बेकारी, गरीबों की हाहाकार सुनाई नहीं देती। ये ही लोग स्मार्टसिटी बना रहे हंै, मैट्रो टे्रन चला रहे हैं, गरीबों को झोपडिय़ों को तोडक़र सडक़ें चौड़ी कर रहे हैं ताकि बड़े सम्पन्न लोगों की गाडिय़ां फर्राटे से दौड़ सकें। रास्ते में कोई अवरोध न आये।
एक ओर बड़े लोगों को सुविधासम्पन्न बनाया जा रहा है, दूसरी ओर ग्रामीण जनता को पीने का पानी तक नहीं मिल रहा। अनाज उपलब्ध नहीं है, रहने के लिए मकान तथा चिकित्सा सुविधायें तक नहीं हैं। दो सौ रुपया किलो दाल और पचास-साठ रुपये प्याज, टमाटर का भाव सुनकर ये गरीब लोग ललकते रह जाते हैं। उन्हें दाल-रोटी या प्याज रोटी भी दुर्लभ है। कुछ दिनों पूर्व ही एक सर्वे रिपोर्ट अखबारों में छपी कि बुन्देलखंड में ग्रामीणजन पानी के लिए तरस रहे हैं, तथा घास की रोटियां खा रहे हैं। क्या इस सच्चाई की भनक दिल्ली या प्रदेश की राजधानियों तक नहीं पहुंची? यह सब देख-सुनकर भी हमारे कर्णाधार आंख-कान क्यों बंद रखते हैं? आये दिन लम्बे-चौड़े भाषण देने वाले एक-दूसरे की छिछालेदर करने वालों को इन गरीबों के बारे में सोचने का समय ही नहीं है। उन्हें केवल अपनी कुर्सी दिखती है। चोर-चोर मौसेरे भाई के कारण ही अरबों का घोटाला करने वाले स्वच्छन्द घूमते हुए मौज मस्ती कर रहे हैं और किसान आत्महत्या के लिए अमिशप्त हंै। कितनी बड़ी विसंगति और विडम्बना है।
अभी कुछ दिन पूर्व ही पढऩे को मिला कि सरकार ने देश के भिखारियों का सर्वे कराया तो पता चला कि सैकड़ों भिखारी ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट तथा उच्च डिग्रीधारी है! है न चौंकाने वाली बात? जरा विचारिये, क्या ये शौक से भीख मांग रहे हैं? कितनी विवशता होगी उनके सामने। बेकारी और भुखमरी में जब कोई रास्ता जीने का न मिला तो आत्महत्या की बजाय इस अधम कार्य के लिए कटोरा लेकर सडक़ों पर बैठकर हाथ फैलाना पड़ा। क्या बीती होगी उनके मन में? उनकी आत्मा कितनी रोई होगी? रहीम ने तो मांगने को मरन के समान बताया है- मांगन मरन समान है, मत कोई मांगो भीख। वे तो यहां तक कहते हैं- रहिमन वे नर मर चुके जे कहुं मांगन जाहिं। आत्मा को मारकर ही हताश-निराश, विवश व्यक्ति भिखारी बनता है। तुलसीदास को भी बचपन में भीख मांगनी पड़ी थी- बारे ते ललात बिललात फिदौं द्वार-द्वार जान्यों चार फल चार ही चनक को। इस गरीबी और दरिद्रता का उन्हें कठोर अनुभव था। इसीलिए लिखा था- नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। वे तो यहां तक कहते हैं कि पेट की आग तो बड़वानि से भी भीषण होती है। आगि बड़वागि से बड़ी है आग पेट की। इसी पेट की आग से तप्त होकर व्यक्ति वह सब करता है जिसे अनुचित और अकरणीय माना जाता है- आरत काह न करै कुकरमू। मांगे भीख त्यागि निज धरमू।
विडम्बना यह देखिये कि एक ओर सरकार द्वारा खरीदा गया हजारों लाखों क्विंटल अनाज इसलिए सड़ या खराब हो रहा है क्योंकि अनाज रखने की जगह गोदामों में नहीं है। भ्रष्ट और निकृष्ट नौकरशाही अपनी अलाली, लापरवाही और गैरजिम्मेदारी के कारण उसके रखरखाव की समुचित व्यवस्था नहीं करती। ऊपर से भ्रष्टाचार कर के अपने को मालामाल कर रहे हैं और दूसरी ओर बेकारी- भुखमरी का यह विकराल रूप गांवों के विकास और कल्याण के लिए की गई पंचायत राज व्यवस्था भी भ्रष्टाचार का केन्द्र बनी हुई है। गांव के पंच-सरपंच सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग कर अपना घर भर रहे हैं। मोटर गाडिय़ों में फर्राटे से सैर-सपाटे कर रहे हैं। आमजन की सुविधाओं का बेरहमी से शोषण हो रहा हंै और गरीब जनता उनके भय से मुंह तक नहीं खोल पा रही। भ्रष्टाचार का यही राक्षस व्यापमं जैसा कांड बिहार की बोर्ड परीक्षा का टॉपर्स जैसा छल छंद और दर्जनों घोटाला करवाने वाला है। अधिकारी, कर्मचारी, नेता और धनपतियों आदि सभी की मिलीभगत है। यह कब तक चलेगा? जिस दिन गरीबों-बेकारों की पेट की आग लपटें बनकर फूटेंगी-फैलेंगी तो उसका विध्वंसकारी दुष्प्रभाव भयावह और विनाशक होगा। जनाक्रोश अनियंत्रित होता है। उस स्थिति के पहुंचने के पूर्व ही समाधान आवश्यक है ताकि पेट की सुलगती आग प्रलयंकारी रूप न ले सके। यहां-वहां हो रही तोड़-फोड़, विद्यालयों में फैल रही अशांति, जलाई जा रहीं डिग्रियां, बढ़ रही हिंसक गतिविधियां, फैल रहा भ्रष्टाचार उसी का संकेत है। क्या शीर्ष पर बैठे सत्ताधीशों, धनपतियों की आंखें खुलेंगी? अब जनता भाषणों से बहलाई नहीं जा सकेगी। उसे आंकड़े नहीं चाहिए।
संपर्क -ए-7, फारचून पार्क, जी-3, गुलमोहर,भोपाल-462039


 

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