पार्टी सुप्रीमो और लोकतंत्र

एल.एस. हरदेनिया : तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद कुछ बुनियादी सवालों पर विचार करना आवश्यक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे अत्यधिक लोकप्रिय नेता थीं।...

एल.एस. हरदेनिया

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद कुछ बुनियादी सवालों पर विचार करना आवश्यक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वे अत्यधिक लोकप्रिय नेता थीं। इनको अंतिम विदा देने के लिए उनके अनुयायियों की इतनी बड़ी भीड़ इकठटी हुई थी कि शायद ही और किसी (महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को छोडक़र) नेता की अंतिम विदाई के लिए एकत्रित हुई हो। सच पूछा जाए तो तमिलनाडु के लोग उनके प्रशंसक ही नहीं थे वरन जयललिता के प्रति उनकी अंधभक्तिथी। राजनीति में अंधभक्ति का होना बहुत खतरनाक है।
आज हमारे देश में अनेक राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का शासन है। वर्तमान में इन राज्यों में पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, पंजाब, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और कुछ हद तक जम्मू और कश्मीर हैं। इन सभी पार्टियों के नेताओं को सुप्रीमो कहा जाता है। सुप्रीमो का अर्थ यही है कि इन नेताओं की पार्टी में अंतिम निर्णय उन्हीं का होगा। जो मुख्यमंत्री है वही अध्यक्ष होता है और जो पार्टी का अध्यक्ष है वही मुख्यमंत्री होता है। सत्ता और पार्टी की बागडोर एक ही व्यक्ति में निहित रहती है। जितने राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का शासन है उनमें हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी रहती है। क्षेत्रीय पार्टियों के हाथों में शासन की बागडोर इसलिए आई क्योंकि राष्ट्रीय पार्टियां वहां पर कमजोर हैं। पूर्व में एक ही राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) का लगभग सभी राज्यों में शासन हुआ करता था। स्थिति धीरे-धीरे बदल गई।
तमिलनाडु में तो लगभग चार दशकों से क्षेत्रीय पार्टियों का ही शासन है। तमिलनाडु में कभी सत्ता जयललिता की पार्टी के हाथ में रही तो कभी करुणानिधि की पार्टी के हाथ में। यदि व्यक्तिगत रूप से देखें तो तृणमूल कांग्रेस की नेत्री ममता बेनर्जी हैं, जिनके विरूद्ध पार्टी का कोई भी सदस्य एक शब्द भी नहीं बोल सकता और यदि कोई बोलता है तो उसे उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। उत्तरप्रदेश में मायावती बीएसपी की सर्वोच्च एकमात्र नेत्री हैं। वे जब किसी मंच से भाषण देती हैं तो उस मंच पर एक ही कुर्सी रहती है। बताया गया है कि इसी तरह की स्थिति उनके कार्यालय में भी रहती है। पंजाब में अकालीदल का कई बार शासन रहा है। वर्तमान में पंजाब की सत्ता अकालीदल के हाथ में है और मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल हैं और उपमुख्य मंत्री उनके पुत्र सुखबीर बादल हैं। क्षेत्रीय पार्टियों का एक चरित्र यह भी होता है कि उनमें वंशवाद प्रमुखता से रहता है। चूंकि जयललिता का वंश नहीं था इसलिए वे किसी को औपचारिक रूप से अपना उत्तराधिकारी नहीं बना सकीं। बिहार में लालू यादव ने अपने पुत्रों को उत्तराधिकारी बना दिया। उत्तरप्रदेश में सोशलिस्ट पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह हैं। उनकी पार्टी में तो उनके परिवार के दर्जनों लोग किसी न किसी पद पर हैं। मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं। आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी इसी तरह की स्थिति है।  चंद्रबाबू नायडू, तेलुदेशम पार्टी के सुप्रीमो हैं। इसी तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री भी अपनी पार्टी के सुप्रीमो हैं।
हमारे देश में मंत्रिमंडलीय शासन प्रणाली है। हमने यह शासन प्रणाली ब्रिटेन से ली है। ब्रिटेन में बरसों से यह कहावत लागू है कि प्रधानमंत्री बराबरी के लोगों के बीच में प्रथम स्थान रखता है। वहां पर यह परंपरा आज भी कायम है। वहां की मंत्री परिषद में किसी भी विषय पर खुलकर बातचीत होती है। ब्रिटेन के इतिहास में कम ही ऐसे प्रधानमंत्री हुए हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि पार्टी की सत्ता अकेले उनके ही हाथ में थी। विन्सटन चर्चिल ब्रिटेन के महान शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक थे। उन्होंने रूस के स्टालिन तथा अमेरिका के रू•ावेल्ट के साथ मिलकर हिटलर को हराकर विश्व को फासीवाद के संकट से बचाया था। वे अपने देश में अत्यधिक लोकप्रिय थे। इसके बावजूद वे अपनी मंत्रीपरिषद में बराबरों के बीच में प्रथम थे। विश्व युद्ध के महान हीरो होने के बावजूद युद्ध के बाद हुए चुनाव में ब्रिटेन के मतदाताओं ने उनके हाथ से सत्ता छीन ली थी और उनके स्थान पर लेबर पार्टी के प्रमुख क्लीमेंट एटली प्रधानमंत्री बने। वैसे ब्रिटेन का उदाहरण कई मामलों में हमारे देश में लागू नहीं होगा। परंतु हमारे देश में जहां राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के हाथों में शासन रह सकता है और शायद रहना जरूरी भी है परंतु उसके साथ ही देश की सत्ता इस तरह की पार्टियों के हाथ में रहना चाहिए जिनका दबदबा पूरे देश में बराबर हो और जिनकी प्राथमिकताएं राष्ट्रीय हों, जिनकी चिंताएं राष्ट्रीय हितों के संबंध में हों। इस समय स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि एक समय में राष्ट्रीय स्तर की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस अब उतनी शक्तिशाली नहीं है। बरसों पहले जवाहर लाल नेहरू लंदन की यात्रा पर गए हुए थे। लंदन के प्रवास के दौरान एक शक्तिशाली समाचारपत्र के संपादक ने उनसे पूछा था कि आपने क्यों कम्युनिस्ट पार्टी को मान्यता प्रदान की है? क्या आप मानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां लोकतांत्रिक ढंग से अपनी गतिविधियां संचालित कर सकती हैं? इस पर नेहरू ने जवाब दिया कि हमारे संविधान के अनुसार कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी गतिविधियां संचालित करने का फैसला किया है। कम्युनिस्ट पार्टी बकायदा चुनाव लड़ती है। यदि कभी ऐसा अवसर आ सकता है कि कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में संसद का बहुमत आ जाए तो मैं प्रधानमंत्री के पद को त्याग कर सत्ता उन्हें सौंप सकता हूं।
इसके बाद थोड़ा रुक कर उन्होंने कहा कि मेरी मुख्य चिंता इस बात की है कि यदि कभी हमारे देश में मेरी पार्टी कमजोर हो जाती है और कम्युनिस्ट पार्टी भी कमजोर हो जाती है तो वह मेरे देश के लिए एक संकट की स्थिति होगी। इसलिए इस समय इस बात की आवश्यकता है कि देश में यदि लोकतांत्रिक समाज को कायम रखना है तो कांग्रेस के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टियों को भी मजबूत होना चाहिए। इस समय भारतीय जनता पार्टी देश की सबसे शक्तिशाली पार्टी है। केन्द्र के अलावा कई राज्यों की सत्ता भी उसके हाथ में है। परंतु यदि हमें राजनीतिक संतुलन कायम रखना है तो हमारे देश में तीन प्रकार के राजनीतिक दलों का मजबूत होना आवश्यक है। जिनमें एक राजनैतिक दल का चरित्र दक्षिणपंथी हो सकता है, एक का मध्यमार्गी और एक का वामपंथी। उसी समय हमारे देश में शक्तिशाली प्रजातांत्रिक व्यवस्था कायम रह सकती है और संविधान के अनुसार देश के साथ-साथ राज्यों का शासन भी चल सकता है। परंतु इस तरह की पार्टियों के भीतर भी आंतरिक लोकतंत्र की आवश्यकता है। यदि राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र रहेगा तो क्षेत्रीय पार्टियों को भी मजबूर होकर अपनी-अपनी पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र को प्रोत्साहित करना होगा। जयललिता की मृत्यु के बाद इस तरह के सवालों के न सिर्फ उत्तर ढूंढना आवश्यक हो गया है वरन उन पर अमल करना भी उससे ज्यादा आवश्यक हो गया है।


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