पाकिस्तान पर एक नजर-2

गिरीश मिश्र : आज से दो वर्ष पूर्व यानी वर्ष 2014 में आयशा जलाल की एक महत्वपूर्ण पुस्तक ''द स्ट्रगल फॉर पाकिस्तान: ए मुस्लिम होमलैंड एंड ग्लोबल पॉलिटिक्सÓÓ अमेरिका और इंग्लैंड से एक साथ प्रकाशित हुई थी। इसकी लेखिका भले ही पाकिस्तानी मूल की हैं ...

डॉ. गिरीश मिश्र

आज से दो वर्ष पूर्व यानी वर्ष 2014 में आयशा जलाल की एक महत्वपूर्ण पुस्तक ''द स्ट्रगल फॉर पाकिस्तान: ए मुस्लिम होमलैंड एंड ग्लोबल पॉलिटिक्सÓÓ अमेरिका और इंग्लैंड से एक साथ प्रकाशित हुई थी।  इसकी लेखिका भले ही पाकिस्तानी मूल की हैं मगर वे न्यूयार्क में पली-बढ़ी हैं। वर्ष 1971 में वे जब हाईस्कूल में थीं तब उनके मन में बार-बार यह प्रश्न उठा कि पश्चिमी पाकिस्तान के नेतागण पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) को अपने साथ क्यों नहीं रख पाए। पाकिस्तानी राष्ट्रवाद के ऊपर बार-बार प्रश्नचिन्ह खड़े हुए। पाकिस्तान के फौजी शासक इस्लाम के आधार पर पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को एक साथ क्यों नहीं रख पाए? वर्ष 1977 में जनरल जिया ने भुट्टो सरकार को अपदस्थ कर अपना फौजी शासन थोप दिया। 1973 के अरब-इजरायली युद्ध और तेल की कीमतों में चौगुनी वृद्धि की पृष्ठभूमि में उन्होंने देश का इस्लामीकरण आंरभ किया। जिया का दावा था कि भारत-विभाजन का आधार इस्लाम था। मगर लेखिका के गहन शोध ने इस दावे को नकारा है और उन्होंने सादत हसन मंटो की कहानियों को पढऩे का सुझाव दिया है।
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद फौजी शासन की अहमियत बहुत कुछ समाप्त हो चुकी है। अब वह जमाना जा चुका है जब लियाकत अली खां से लेकर बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी। इसी दौरान डॉ. खां साहब को मौत के घाट उतार दिया गया और जुल्फिकार अली भुट्टो को भी फांसी पर लटका दिया गया। वर्ष 1988 में जनरल जिया की जीवन-लीला समाप्त हो गई। कालक्रम में बेनजीर भुट्टो काफी संघर्ष के बाद सत्ता में आईं मगर उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया गया। उनकी मौत की जांच करने वाले आयोग का मानना था कि उन्हें मारने वालों के पीछे बड़ी ताकतें सक्रिय थीं।
भारत के साथ निरंतर तनाव और अफगानिस्तान के लड़ाई ने पाकिस्तान को काफी नुकसान पहुंचाया। वर्ष 2003 और 2013 के बीच 40 हजार से अधिक लोग आतंकवाद के शिकार हुए हैं। साथ ही पाकिस्तान की सुरक्षा पर खर्च बढ़ा है यद्यपि इसका भार बहुत कुछ अमेरिका ने उठाया है। जो भी हो एक आम पाकिस्तानी का देश के बाहर संदेह की निगाह से देखा जाता है। देश के अंदर ऊर्जा का भारी संकट है, चोरी और राज्य ही नहीं बल्कि प्रभावशाली लोगों द्वारा सरकारी संस्थानों के बिलों का भुगतान न करना भारी समस्या है। देश के अंदर रोजगार के अवसर घट रहे हैं इसलिए शिक्षित मध्य वर्ग ही नहीं बल्कि अन्य लोग भी देश के बाहर नौकरियों की तलाश का रहे हैं। अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई से पाकिस्तानियों पर भी बुरा असर पड़ रहा है। तालिवानीकरण के बढ़ते खतरे से लोग च्ंिातित हैं। आम लोगों के सामने एक बड़ा सवाल है कि वे एक दकियानूसी और कट्टर धार्मिक राज्य चाहते हैं या एक आधुनिक, प्रबुद्ध राज्य। इस प्रश्न पर विचार विमर्श एक लम्बे समय तक सैनिक सत्तावाद के कारण बाधित रहा है। वह जुझारू इस्लाम को बढ़ावा देता रहा है। कहना न होगा कि विश्व भर में लोग उसे शक की न•ार से देखते हैं।
लोग चिंतित हैं कि पड़ोसी देश भारत में आ•ाादी के बाद से ही जनतंत्र पनपा है और उसकी जड़ें मजबूत हुई हैं वहीं पाकिस्तान में एक लम्बे समय तक सैनिक शासन रहा है। अब भी सेना का दबदबा बना हुआ है और उसकी गुप्तचर संस्था देश पर हावी है। सेना देश के आंतरिक और बाहरी विरोधियों को दबाने के लिए इस्लाम का इस्तेमाल कर रहा है। आम पाकिस्तानी को न जीवन और न ही संपत्ति की सुरक्षा है। उसे सामाजिक एवं आर्थिक अवसर राज्य की ओर से नहीं मिलते हैं। हिंसा और अनिश्चितता का खतरा लगतार बना हुआ है। पिछले 67 वर्षों के दौरान अब तक पाकिस्तानी यह फैसला नहीं कर पाए हैं कि वे देश की इस्लामी पहचान बनाए रखना चाहते हैं या उसे एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में देखना चाहते हैं। बंगलादेश के अलग होने के बाद पाकिस्तान में भारत की तुलना में काफी कम मुस्लिम आबादी रह गई है। भारत में तो देशी रियासतें कब की खत्म हो चुकी हैं मगर पाकिस्तान में उनका अस्तित्व बना हुआ है। वहां अब भी दस रियासतें मौजूद हैं। पाकिस्तान का धार्मिक आधार 1971 में तब धराशायी हो गया जब बंगलादेश अलग हो गया।
आज पािकस्तान की हालत काफी दयनीय है। वहां शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है। जहां तक मीडिया का प्रश्न है वह सरकारी नियंत्रण और बढ़ते वाणिज्यिकरण के बीच झूल रहा है। सैनिक एवं अर्ध सैनिक नियंत्रण के कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। अभी हाल तक प्रेस को दबाकर और घूस के जरिए नियंत्रण में रखा जाता रहा है। देश के सामने आनेवाली समस्याओं पर शायद ही स्वतंत्र विचार विमर्श की गुंजाइश है। पाकिस्तान के अंदर शायद ही कभी अकादमिक या राजनीतिक बहस-मुबाहसें की गुंजाइश बनी है।
आयशा जलाल के अनुसार इतिहास की जगह एक कुपरिभाषित इस्लामी विचारधारा को थोपने के कारण एक आलोचनात्मक ऐतिहासिक परंपरा न विकसित हो पाई है और न ही तर्कसंगत सार्वजनिक बहस संभव है। पाकिस्तान के स्कूलों  में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह कृत्रिम राष्ट्रीय मिथकों को बढ़ावा देता है। हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच अंतर पर जोर दिया जाता है और इस प्रकार पाकिस्तान के अस्तित्व को उचित ठहराया जाता है।
आज पाकिस्तान की स्थिति काफी दयनीय बन गई है। उसे आतंकवादी विचारधारा और धार्मिक उन्माद से ग्रस्त हिंसा का उद्गम बताया जा रहा है। इसी से जुड़ा मुद्दा यह है कि पाकिस्तान का इतिहास वर्ष 1947 से आरंभ होता है अथवा इस्लाम के जन्म के समय से राज्य की इस्लामी पहचान का तालमेल आधुनिक राष्ट्र-राज्य के साथ कैसे बैठाया जाय? मुस्लिम राष्ट्रवाद के सामने यह एक बड़ा सवाल है। यहां एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान कैसे एक राष्ट्र के रूप में तब्दील हो गए और फिर दो राज्यों के बीच विभाजित होगा।
मोहम्मद अली जिन्ना का उदय एक उपनिषदवाद-विरोधी राष्ट्रवादी के रूप में हुआ। वर्ष 1916 में उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के जन्म का स्वागत करते हुए कहा था कि ''एक संयुक्त भारत जन्म के पीछे यह एक बड़ा कारक होगा।ÓÓ यहां तक कि वर्ष 1937 तक उनकी दिलचस्पी अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस के साथ गंठजोड़ करने की थी। उनका नजरिया अधिकतर मुस्लिम राजनेताओं से अलग था। मुसलामानों की दिलचस्पी उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी भारत में स्वायत्त राज्यों तक ही सीमित थी। शेष जगहों में वे चाहते थे कि अल्पसंख्यक मुसलमानों के अधिकारों की सुरक्षा की जाय। उस समय तक मुद्दा स्वायत्त राज्यों तक सीमित था जिससे एक राज्य दूसरे पर धौंस नहीं दिखायें।
इसमें बदलाव 1940 के लाहौर अधिवेशन में दिखा जब मुस्लिम लीग ने मांग की कि उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी भारत में मुसलमानों का दबदबा स्वीकार किया जाय। लीग ने सारे भारतीय मुसलमानों की ओर से बोलने का दावा किया। तब तक उनकी ओर से पाकिस्तान की मांग नहीं उठी थी बल्कि उनका जोर मुस्लिम हितों की रक्षा तक ही सीमित था। लाहौर प्रस्ताव में जिन्ना ने देश-विभाजन और पाकिस्तान का कोई जिक्र नहीं किया था। उनका कहना था कि तथाकथित हिन्दू प्रेस ने यह शब्द उनके ऊपर थोपा था। 'पाकिस्तानÓ शब्द वर्ष 1933 में कैम्ब्रिज के एक विद्यार्थी चौधरी रहमत अली की देन है। रहमत अली की कल्पना के पाकिस्तान में पंजाब, अफगानिस्तान (उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत सहित) कश्मीर, सिंध और बलोचिस्तान शामिल थे। ध्यान रहे कि इसमें बंगाल का कोई हिस्सा शामिल न था। यहां पर मुहम्मद इकबाल का जिक्र जरूरी है। उन्होंने देश के विभाजन की कोई बात नहीं की थी। उनका मानना था कि भारत दुनिया का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। उनका ख्याल था कि मुसलमान अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं का निर्वाह करते हुए वहां रहें। हिन्दुओं के साथ उनका कोई टकराव न हो। इकबाल हर तरह की मुस्लिम दकियानूसी के खिलाफ थे। भारत में स्थापित मुस्लिम राज्य इस्लाम को नई ऊंचाईयों पर ले जाएगा जिसमें ''अरबी साम्राज्यवादÓÓ कोई खलल पैदा नहीं कर पाएगा।
याद रहे कि रहमत अली की कल्पना के पाकिस्तान को खतरनाक और अव्यवहारिक धारणा बतलाकर दरकिनार कर दिया गया। फिर भी शहरी पंजाबी मुसलमानों के एक तबके ने उसे लोक लिया और उसे इकबाल की मुस्लिम राज्य की अवधारणा से जोड़कर देखना आंरभ किया। याद रहे कि इस अवधारणा को बढ़ावा देने में पंजाब और यूपी के हिन्दू स्वामित्व कै अंतर्गत संचालित समाचार पत्रों ने कम भूमिका नहीं निभाई। जहां तक मोहम्मद अली जिन्ना का सवाल है वे काफी हद तक पश्चिमी रंग में रंगे हुए वकील थे और धार्मिक रूढि़वाद से उनका कोई वास्ता नहीं था। किन्तु उन्हें अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए इस्लाम का सहारा लेना पड़ा। यदि वे ग्रामीण मुस्लिम जनता को उभारने की कोशिश करते तो उनका टकराव हिन्दू और मुसलमान दोनों भूमिपतियों से होता। वे इस स्थिति से बचना चाहते थे। उन्होंने यहां पाकिस्तान का सहारा लिया जिससे मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ खड़ा किया जा सके।
आ•ाादी के कुछ समय पहले क्रिप्स मिशन भारत आया जिसका उद्देश्य किसी न किसी तरह वायसराय की कार्यकारी समिति में कांग्रेस को लाना था। साथ ही उसने प्रांतों को भारत से अलग होने का अधिकार देने की बात की जिससे वे पाकिस्तान की अपनी मांग पर बल दे सकें। क्रिप्स मिशन का प्रयास विफल हो गया। वर्ष 1944 में दक्षिण के नेता राज गोपालाचारी ने पाकिस्तान का प्रस्ताव फिर से आगे रखा जिसमें पंजाब और बंगाल के मुस्लिम बहुमत वाले जिलों को काफी कुछ केन्द्र में स्वायत्तता देने  की बात की गई। कहा गया कि वे भारत में रहें और केन्द्र सरकार को रक्षा, संचार और वाणिज्य को छोड़कर अन्य मामलों में उनकी स्वायत्तता बनी रहे। मगर जिन्ना को यह प्रस्ताव पसंद नहीं आया। जिन्ना ने मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने का दावा किया और पाकिस्तान की मांग को जोरदार ढंग से दुहराया। उन्होंने पंजाब, बंगाल, सिंघ, और उत्तर- पश्चिम सीमा प्रांत के मुसलमानों को परस्पर जोडऩे की कोशिश की और इस प्रकार पाकिस्तान की अवधारणा को मृर्तरूप देकर आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अल्प संख्यकों के हितों की रक्षा उसी प्रकार की जाएगी जैसे भारत में होती है।
प्रश्न उठता है कि भारत का विभाजन क्यों हुआ जब मुस्लिम लीग मुसलमानों को हिन्दुओं के बराबर दर्जा देने की बात कर रही थी। यह स्थिति 1946 की गर्मियों में बदल गई। ब्रिटिश उपनिवेशवाद नहीं चाहता था कि भारत अखंड रहे और एक सुदृढ़ देश बन कर उभरे। ब्रिटेन और अमेरिका दोनों चाहते थे कि उनकी निजी पूंजी को चरने का पूरा मौका मिले। अखिल भारतीय कांग्रेस के प्रस्तावों तथा प्रस्तावित औद्योगिक नीति को देखते हुए उन्हें संदेह था कि भारत में शायद उनकी निजी पूंजी को बेधड़क चरने का अवसर न मिले इसीलिए वे भारत के विभाजन के पक्षधर बने। उनकी रणनीति थी कि पाकिस्तान बनाकर उसे भारत से भिड़ा दिया जाए और उनको बेरोकटोक काम करने का मौका मिले।


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