पाकिस्तान पर एक नजर-1

गिरीश मिश्र : इन दिनों पाकिस्तान को लेकर काफी चर्चा हो रही है किन्तु ध्यान से देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पूरी चर्चा सतही है क्योंकि किसी ने भी पाकिस्तान के अंदररूनी हालात और शक्ति-संतुलन पर ध्यान देने की जहमत नहीं उठाई है।...

डॉ. गिरीश मिश्र

इन दिनों पाकिस्तान को लेकर काफी चर्चा हो रही है किन्तु ध्यान से देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पूरी चर्चा सतही है क्योंकि किसी ने भी पाकिस्तान के अंदररूनी हालात और शक्ति-संतुलन पर ध्यान देने की जहमत नहीं उठाई है।
यहां हम अनेक पुस्तकों में से सिर्फ दो का जिक्र करेंगे। पहली पुस्तक है: ''ए केस ऑफ  एक्सप्लोडिंग मैंगो•ाÓÓ जिसके लेखक हैं- मोहम्मद हनीफ। दूसरी पुस्तक है: ''द स्ट्रगल फॉर पाकिस्तान: ए मुस्लिम होमलैंड एंड ग्लोबल पॉलिटिक्सÓÓ जिसकी लेखिका हैं- आयशा जलाल। दोनों पाकिस्तानी मूल के हैं और काफी प्रतिष्ठित हैं।
आइए हम पहली पुस्तक से अपनी चर्चा शुरु करें। यह पुस्तक उपन्यास बतौर लिखी गई है और लेखक ने तथ्यों को रोचक बनाकर पेश किया है यद्यपि इसके सारे चरित्र वास्तविक हैं। जून 1988 का पाकिस्तान। जनरल जिया को पक्का विश्वास है कि उनकी हत्या की साजिश रची जा रही है इसलिए उन्होंने अपने सरकारी आवास आर्मी हाउस के चारों ओर बाड़ा लगवाने के साथ ही कड़ी सुरक्षा कर ली है। ऐसे अनेक लोग हैं जो उन्हें मृत देखना चाहते हैं उनमें राजनेताओं के अतिरिक्त फौजी जनरल भी हैं जो अपनी पदोन्नति के लिए बेताब हैं। फौजी जनरल चाहते हैं कि यदि जनरल मिया को खत्म कर दिया जाय तो उनके ऊपर बढऩे का मार्ग प्रशस्त हो जाय। इतना ही नहीं, उनके सीआईए, आईएसआई और रॉ से भी खतरा दिख रहा है। मिलिटरी अकादमी के एक जूनियर अफसर की हत्या फौज ने कर दी है क्योंकि अली शिगरी से जिया भयभीत थे।
जिया को लगता है कि उनकी मृत्यु से कई लोगों को फायदा होगा। कुछ को प्रभाव बढ़ाने की ललक है तो कुछ लोग अपनी पहचान बनाने के लिए आतुर हैं।
महज दो महीने बाद जनरल जिया राष्ट्रपति के लिए निर्दिष्ट विमान पाक वन में बैठकर यात्रा पर निकलते हैं मगर विमान में उड़ान के समय विस्फोट हो जाता है जिसमें जिया और उनके साथ जा रहे सबकी मौत हो जाती है।
पाकिस्तानी टेलीविजन पर विमान हादसे के बाद दो बुलेटिनों के बाद उसके प्रसारण पर रोक लगा दी जाती है क्योंकि कहा जा रहा है कि पाकिस्तानी सेना का हौसला पस्त हो सकता है।
उपर्युक्त विमान बहावलपुर रेगिस्तान से उड़ा था जो अरब सागर से करीब 600 मील की दूरी पर है। थोड़ी देर के लिए जनरल जिया न•ार आते हैं और लगता है कि वे कुछ परेशान हैं। उनकी दाईं ओर पाकिस्तान स्थित अमरीकी राजदूत न•ार आ रहे हैं। बाईं ओर पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस) के प्रमुख जनरल अख्तर हैं। उनको देखने से लगता है कि संभावित हादसे को देखते हुए उन्हें विमान में नहीं सवार होना चाहिए। जो भी हो उन सहित दस व्यक्ति विमान में सवार होते हैं। विमान हादसे का शिकार हो जाता है और जनरल जिया, पाकिस्तानी राजदूत तथा जनरल जिया के सहयोगी समेत दस के दस लोग मर जाते हैं।
विमान बनाने वालों अमेरिकी कंपनी लॉकहीड के विशेषज्ञ विमान के उडऩे के मात्र चार मिनट बाद वह हादसे का शिकार होने के कारणों का विश्लेषण करते हैं।  इस कंपनी के सी-190 विमान में प्रत्यक्षतया कोई खामी न•ार नहीं आती है फिर भी वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया है। फलित ज्योतिष में विश्वास रखने वाले मानते हैं कि काफी अरसे पहले ही भविष्यवाणी सामने आई थी कि पाकिस्तानी फौज के शीर्ष पर बैठे लोग और अमेरिकी राजदूत विमान हादसे के शिकार हो जाएंगे। उपन्यासकार मोहम्मद हनीफ के अनुसार वामपंथी बुद्धिजीवी मानते हैं कि एक क्रूर तानाशाही का खात्मा होना ही था और इसे वे ऐतिहासिक द्वंद्ववाद के आधार पर स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। उधर अफगानिस्तान से सोवियत फौज के सिपाही घर वापसी की तैयारी में जुटे हैं। खाने-पीने और बहावलपुर में खरीदारी कर झूमते-झामते विमान में सवार होकर जा रहे हैं। उनका मनोभाव काफी बदल गया है। वे यही सोचकर आए थे कि उनकी घर वापसी शायद ही हो पाएगी।
अब बहावलपुर से उडऩे वाले पाकिस्तानी विमान की ओर देखें। महज कुछ पलों में वह हादसे का शिकार हो जाता है। उसमें सारे के सारे लोग मर जाते हैं। जनरल जिया समेत सभी जनरलों के परिवारों को पूरा मुआवजा मिलता है। उनके परिवारों को यह सख्त हिदायत है कि वे मृत व्यक्तियों के ताबूतों को न खोलें। विमान चालकों के परिवार वालों को अलग बंद रखा जाता है और कुछ दिनों के बाद उन्हें छोड़ दिया जाता है। अमेरिकी राजदूत के शव को अर्लिंग्टन कब्रिस्तान में दफनाकर उसके इर्द-गिर्द कतिपय सुशिष्ट शब्द लिख दिए जाते हैं। किसी भी मृत व्यक्ति की शव परीक्षा नहीं होती है। इस प्रकार मृत्यु के कारणों पर पर्दा डाल दिया जाता है। अमेरिकी पत्रिका ''वैनिटी फेयरÓÓ और ''न्यूयार्क टाइम्सÓÓ ने जरूर संपादकीय लिखकर उनकी मृत्यु से जुड़े कुछ सवाल उठाए। इसके बाद मृतकों के घरवालों ने कोर्ट में मुकदमे दर्ज करवाए किन्तु उन्हें उच्च पद देकर उनका मुंह बंद करवा दिया गया। मोहम्मद हनीफ का मानना है कि विमानन के इतिहास में पूरी घटना पर पर्दा डालने का प्रयास शायद ही कभी हुआ है। विमान हादसे के बाद न मृतकों का शव मिला और न ही कोई फोटो खींचकर प्रदर्शित किया जा सका। विमान के मलबे में हड्डियों के टुकड़े जरूर यत्र-तत्र  मिले किन्तु उसमें सवार लोगों की ठीक से पहचान असंभव थी। किसी प्रकार से सबको दफना दिया गया।
उपन्यास के अनुसार अली शिगरी पूरी घटना का प्रत्यक्षदर्शी था। बतलाया गया कि एक अनजानी वस्तु ने विमान को टक्कर मारी जिससे वह क्षतिग्रस्त होकर गिर गया। एक छोटे अफसर अली शिगरी के बयान के अनुसार, 31 मई 1988 की सुबह वह ड्यूटी पर ठीक साढ़े छ: बजे आया और उसने अपना काम शुरु किया। तभी उसने महसूस किया कि उसका तलवार को बांधने वाला बेल्ट ढीला हो गया है। जब उसने कसने की कोशिश की तो वह टूट गया। वह अपने बैरक की ओर उसके बदले नए बेल्ट के लिए गया मगर उसने अतिक नामक व्यक्ति को अपना काम सौंप कर बैरक में चला गया।
उधर 15 जून 1988 को जनरल जिया कुरान शरीफ पढ़ते समय आयत 21:87 पर आ गए और उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी। वे अपने आधिकारिक आवास आर्मी हाउस में ही बने रहे और उसे छोड़कर राष्ट्रपति निवास में जाने को तैयार नहीं थे। दो महीने और दो दिन बाद पहली बार आर्मी हाउस से निकलकर हवाई जहाज में बैठे और उसके हादसे में उनकी मृत्यु हो गई। यद्यपि राष्ट्र भर में खुशी हुई किन्तु कुरान शरीफ की उपर्युक्त आयत को दुबारा पढऩे पर उनके मन में भ्रम पैदा हो गया क्योंकि उसमें कहा गया था कि वे उन लोगों में हैं जिन्होंने अपनी आत्मा को उत्पीडि़त किया है। सुबह के समय जनरल जिया कुरान शरीफ का अंग्रेजी अनुवाद पढऩे लगे थे जिससे नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद उनके द्वारा उसे स्वीकारने के अवसर पर दिए जाने वाले भाषण को तैयार करने में मदद मिलती। वे कुरान शरीफ से कोई उपयुक्त पैराग्राफ को उद्धृत करना चाहते थे जिससे उनका भाषण दमदार बन सके। जनरल जिया अपना भाषण उर्दू में देना चाहते थे मगर बीच-बीच में अरबी उद्धरण देकर अपने सऊदी मित्रों को प्रभावित करना चाहते थे। किन्तु उन्हें असली चिंता रोनाल्ड रीगन की थी जो शायद उनके उर्दू-अरबी मिश्रित भाषण को नहीं समझ पाएं। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी में ही भाषण देने का निर्णय लिया। जनरल जिया ने सैनिक इतिहास संबंधी सारी पुस्तकों और अपने पूर्ववर्ती जनरलों की तस्वीरों को अतिथिगृह में लगवा कर वर्तमान कमरे को प्रार्थनागृह बना दिया था। साथ ही वही मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक का दफ्तर भी बन गया था। वे जहां रहते थे वह एक औपनिवेशिक युग का बंगला था जिसमें 14 शयन कक्ष, अठारह एकड़ का लॉन और एक छोटी मस्जिद थी।
नया राष्ट्रपति निवास तो तैयार था मगर वे वहां नहीं जाना चाहते थे। वहां विदेशी अतिथियों और स्थानीय मुल्ला लोगों का आदर-सत्कार किया जाता था। उन्हें डर था कि कहीं आर्मी हाउस से निकल कर वहां जाने पर उनकी सुरक्षा खतरे में न पड़ जाए। जनरल जिया सदैव कुरान शरीफ में अपना पथ प्रदर्शन ढूंढते थे। ग्यारह वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को सत्ता से अपदस्थ करने के पहले उन्होंने कुरान शरीफ का मनन कर पथ प्रदर्शन लिया था। उनको सत्ता से हटाकर मुकदमा चलाया था। फांसी की सजा को निरस्त करने की अपील को ठुकराकर फांसी पर लटकाने का फैसला लेने के बाद उन्होंने कुरान शरीफ से ही पथ प्रदर्शन लेने की कोशिश की थी। जनरल जिया इतिहास के चौराहे पर खड़े थे। पिछले ग्यारह वर्षों से वे प्रतिदिन कुरान शरीफ से पथ प्रदर्शन पाने की कोशिश में लगे थे। वे आर्मी हाउस की मस्जिद के इमाम से पथ प्रदर्शन चाहते थे मगर उनसे मिलने के पूर्व वे अपने शयन कक्ष से गुजरे जहां उनकी पत्नी सोई हुई थीं। उनकी पत्नी उन पर दबाव डाल रही थीं कि वे राष्ट्रपति निवास में चलें मगर वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे।
वे अपने निवास के साथ जुड़ी मस्जिद में नमाज के लिए पहुंचे। इमाम ने प्रार्थना शुरु की और उनके पीछे जनरल जिया बैठे थे और उन्हें साथ ही इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस के प्रधान जनरल अख्तर थे।
जनरल जिया को आर्मी चीफ बने मात्र 16 महीने हुए थे। उनको भुट्टो ने ही इस पद पर बैठाया था। उन्होंने भुट्टो को अपस्थ कर चीफ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेशन के रूप में अपने को पदस्थापित कर दिया था। भुट्टो को जेल में डाल दिया गया। सारे देश में आंतक का माहौल था। अब एक ही रास्ता था: षडय़ंत्र के जरिए जनरल जिया को उखाड़ फेंका जाय। कहना न होगा कि साजिश के जरिए ही जनरल जिया को समाप्त किया जा सकता है।
मिलिटरी अकादमी के अली शिगरी को आगे किया गया। उसके पिता जो सेना के अधिकारी थे उनकी हत्या कर दी गई थी। अली शिगरी जनरल जिया से बदला लेना चाहता था। अली के कारण भले ही कई लोगों का भला होगा मगर वह तो सिर्फ बदला लेना चाहता है।
उपर्युक्त उपन्यास ''ए केस ऑफ एक्सप्लोडिंग मैंगोजÓÓ काफी रोचक है यद्यपि उसने पाकिस्तान की तत्कालीन स्थिति को अपना आधार बनाया है। दूसरी पुस्तक की चर्चा हम अगली बार करेंगे।


 

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