पहले राष्ट्रभक्ति, फिर सिनेमा में मस्ती

पुष्परंजन : श्याम नारायण चौकसे इस समय उनके हीरो हैं, जिनकी इच्छा सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को अनिवार्य रूप से सुनाने, और उस दौरान रूपहले पर्दे पर दिखने वाले राष्ट्रध्वज के सम्मान में सभी दर्शकों के खड़े होने की रही है। ...

पुष्परंजन

श्याम नारायण चौकसे इस समय उनके हीरो हैं, जिनकी इच्छा सिनेमाघरों में राष्ट्रगान को अनिवार्य रूप से सुनाने, और उस दौरान रूपहले पर्दे पर दिखने वाले राष्ट्रध्वज के सम्मान में सभी दर्शकों के खड़े होने की रही है। जस्टिस दीपक मिश्र व अमिताव रॉय ने  ‘ए’ से लेकर ‘जी’ तक जो निर्देश दिये हैं, उसमें यह तय नहीं हुआ है कि जो लोग सिनेमाघरों में इसका पालन नहीं करेंगे, उनके विरूद्ध क्या कार्रवाई होगी। उन्हें किन धाराओं के अंतर्गत निरूद्ध किया जाएगा, और निगरानी के लिए हॉल के भीतर पुलिस बल का प्रबंध कैसे होना है? पुलिस के उपलब्ध न होने पर क्या ‘राष्ट्रभक्तों की फौज’ कानून-व्यवस्था स्वयं अपने हाथों में ले लेगी? ऐसे कई सारे सवालों के जवाब मिलने बाकी हैं।
14 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट में इस केस की अगली सुनवाई है, जिसमें केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखना है। तो फिर 10 दिनों के भीतर निर्देश पालन की जल्दी क्यों है? 5 जनवरी 2015 को केंद्रीय गृहमंत्रालय ने सभी राज्यों को एक स्पष्टीकरण भेजा था कि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान के समय दर्शकों से खड़े होने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। इससे अव्यवस्था और ‘कन्फ्यूजन’ की स्थिति पैदा होती है। केंद्र सरकार ने अपनी स्थिति पिछले साल ही स्पष्ट कर दी थी। तो क्या केंद्र सरकार के उस दिशानिर्देश को पलटने का रास्ता ढूंढा जा रहा है?
28 अक्टूबर, 2016 को सुप्रीम कोर्ट में रिट पेटीशन सिविल नंबर 855/2016 दाखिल की गई थी, और उसके ठीक चौंतीस दिन बाद 30 नवंबर 2016 को पहली सुनवाई में ही कोर्ट ने सरकार को दिशानिर्देश जारी कर दिया।  लोग इस खोजबीन में जुटे हैं कि चौकसे का संबंघ किसी हिंदूवादी संगठन से रहा है, या नहीं। 76 साल के चौकसे भोपाल में ‘राष्ट्रहित गांधीवादी मंच’ नामक एनजीओ चलाते हैं। पेशे से सिविल इंजीनियर रहे चौकसे ने सन् 2000 में सेंट्रल वेयरहाउसिंग कारपोरेशन से अवकाश प्राप्त कर लिया था।
इस फैसले के केंद्र में जस्टिस दीपक मिश्र हैं, जिनके बारे में संभावना व्यक्त की जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट के अगले मुख्य न्यायाधीश वही बनेंगे। न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर 4 जनवरी, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद से अवकाश ले रहे हैं। यह संयोग है कि तेरह साल पहले, जब श्याम नारायण चौकसे ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सिनेमा शो के शुरू में राष्ट्रगान अनिवार्य करने संबंधी याचिका दायर की थी, तब जस्टिस दीपक मिश्रा वहां जज थे। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र सुप्रीम कोर्ट के नामवर मुख्य न्यायाधीश रह चुके रंगनाथ मिश्र के भतीजे हैं।
यह 2002 के दिनों की बात है, जब चौकसे भोपाल के किसी सिनेमा हाल में फिल्म ‘कभी खुशी, कभी गम’ देखने गये थे। फिल्म में राष्ट्रगान उस हिस्से को देखते ही चौकसे उठ खड़े हुए, जिसका बाकी दर्शकों ने मजाक उड़ाया था। चौकसे को यह बात इतनी चुभ गई कि वे फिल्म प्रदर्शन के विरूद्ध अदालत में चले गये। जुलाई 2003 में डिवीजन बेंच के आदेश में न्यायमूर्ति दीपक मिश्र ने आदेश दिया था कि प्रोड्यूसर करण जौहर फिल्म के उस हिस्से को हटायें तभी मध्यप्रदेश के सिनेमाघरों में उसे दिखाने की अनुमति होगी। जज दीपक मिश्र की टिप्पणी थी, ‘कभी खुशी, कभी गम’ में राष्ट्रगान को जिस फिल्मी अंदाज में पेश किया गया, वह राष्ट्रीय चरित्र के विरूद्ध है। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का अपमान करता है, तो उसे राष्ट्रद्रोह की गतिविधियों में लिप्त माना जाना चाहिए।’ इस फैसले के विरूद्ध करण जौहर 2004 में सुप्रीम कोर्ट गये, और अंतत: नवंबर 2006 में तीन जजों की पीठ का नेतृत्व कर रहे सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाईके सभ्भरवाल ने बिना किसी कतर-ब्योंत के ‘कभी खुशी, कभी गम’ के ओरिजिनल प्रिंट के प्रदर्शन की अनुमति दे दी।
 तेरह साल पहले राष्ट्रगान का सम्मान नहीं करने वालों को राष्ट्रद्रोही मान लेने की जो अवधारणा न्यायमूर्ति दीपक मिश्र ने व्यक्त की थी, क्या उसे मान लेना चाहिए? ध्यान देने वाली बात है कि 30 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में अनुच्छेद 51(ए) के हवाले से सिर्फ मूलभूत कर्तव्यों की चर्चा हुई। 2003 में भोपाल हाईकोर्ट के फैसले से सत्रह साल पहले, अगस्त 1986 में केरल के एक स्कूल के ‘जेहोवा विटनेस मत’ को मानने वाले तीन छात्रों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, जिसमें जस्टिस चिनप्पा रेड्डी व न्यायमूर्ति एमएम दत्त ने टिप्पणी की कि बच्चों को राष्ट्रगान गाने के लिए स्कूल बाध्य नहीं कर सकता, क्योंकि इससे संविधान द्वारा प्रदत धार्मिक अधिकारों का हनन होता है।
न्यायमूर्ति चिनप्पा ने यह निर्णय 1943 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस राबर्ट एच. जैक्सन द्वारा दिये फैसले को आधार बनाकर दिया था। अमेरिकी संविधान के अनुसार कोई स्कूल, छात्र को राष्ट्रध्वज को सलामी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। जस्टिस चिनप्पा रेड्डी व न्यायमूर्ति एमएम दत्त द्वारा दिये फैसले के तीस साल हो गये। एक ही विषय पर, सुप्रीम कोर्ट के दो विपरीत आदेश हैं। एक राष्ट्रगान के सम्मान में उठ खड़े होने के लिए बाध्य करता है, दूसरा धर्म के आधार पर उसका पालन न करने की छूट देता है। सवाल यह है कि इस देश के नागरिक सुप्रीम कोर्ट के कौन से आदेश का पालन करें?
अमेरिका में क्या 1943 से अब तक कोई बदलाव आया है? क्या अमेरिकी सिनेमाघरों में दर्शकों को राष्ट्रगान दिखाया जाता है? इन सवालों का उत्तर जानने के लिए वॉयस ऑफ  अमेरिका में वरिष्ठ पत्रकार रह चुके गुलशन मधुर को मैंने वाशिंगटन मेल किया। उनके उत्तर को शब्दश: रख रहा हूं-‘ऐसी कोई परंपरा नहीं है। अगर ऐसा कोई नियम बनाने की कोशिश की जाए, तो यहां हंगामा खड़ा हो जाएगा। जब किसी आयोजन में राष्ट्रधुन बजती है, तो लोग बाकायदा सम्मान प्रदर्शित करते हैं। लेकिन किसी को बाध्य करने की बात यहां सोची भी नहीं जा सकती। ऐसा कोई हिटलरी कानून अब तक तो नहीं है, और न ही मुझे लगता है ऐसा होगा-ट्रंप के बावजूद!’
जापान में क्या स्थिति है? टोक्यो से हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक लक्ष्मीधर मालवीय ने मेल पर जवाब भेजा- ‘सनीमाघरों में लोग सनीमा देखने जाते हैं, चोंचले करने नहीं। जिसे आप राष्ट्रगान कहते हैं, जापान में वह सम्राठ के दीर्घायु होने की प्रार्थना है, जो नववर्ष आदि इने-गिने अवसरों पर प्राय: सम्राठ की उपस्थिति में समवेत गाई जाती है। भारत में यह सब औंधी खोपड़ी चलता है। असत्यमेव जयते! यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते-औरतों की पिटाई जितनी अधिक हिंदुस्तान में होती है, कहीं अफ्रीका में भी न होती होगी।’
 ताजा अपडेट के लिए यूरोप के मित्रों को मैंने ऐसा ही मेल भेजा। जो जवाब मिले, उसका निष्कर्ष यही था कि यूरोपीय सिनेमाघरों में राष्ट्रगान दिखाने की परंपरा नहीं है। जबकि जर्मनी, इटली उग्र राष्ट्रवाद के एपीसेंटर (अधिकेंद्र) रहे हैं। मगर नेपाल में राजशाही के दमनकारी दौर को जिन्होंने देखा है, उन्हें मालूम है कि वहां के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान दिखाने की परंपरा थी। सिनेमाघरों में जो लोग खड़े  होकर सम्मान नहीं करते थे, उन्हें  कभी-कभार पुलिस पकडक़र ले जाया करती थी। किशोरावस्था तक यह दृश्य मैंने स्वयं नेपाल के सिनेमाघरों में देखा है। उस देश में पंचायतकाल में जो राष्ट्रगीत हुआ करता था, वह राजा की स्तुति से भरपूर था। उसे 2006 में राजतंत्र की समाप्ति के साथ निरस्त कर दिया गया। 3 अगस्त 2007 को प्रदीप कुमार राई द्वारा रचित ‘सैयों थुंगा फूलका हामी, एउटै माला नेपाली’ को राष्ट्रगान के रूप में मान्यता मिली। संभवत: यह दुनिया का सबसे नवोदित राष्ट्रगान है। नेपाली प्रेक्षागृहों को ‘राष्ट्रीय सम्मान’ के पाखंड से दूर ही रखा गया है, न ही इसके लिए वहां कोई जोर-जबरदस्ती है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों के अमल के वास्ते सरकारी अमला कितना तैयार है, इस सवाल का उत्तर इस समय नोटबंदी में उलझकर रह गई राज्य सरकारों की ओर से नहीं मिला है। 18 अक्टूबर 2016 को पणजी के एक पिक्चर हॉल में एक विकलांग सलिल चतुर्वेदी के साथ राष्ट्रभक्तों ने जो बदसलूकी की थी, उससे यह पता चलता है कि ‘दिव्यांगों’ के प्रति मोदी जी की सद्भावना दिखाने के दांत भर हैं। इसकी गारंटी कोई नहीं दे रहा कि मुंबई, गोवा के सिनेमाघरों में मुस्टंडों ने जिन परिवारों व विकलांग व्यक्ति  से बदसलूकी की थी, देश के दूसरे हिस्सों में उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी।
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रगीत को सबसे पहले 27 दिसंबर, 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था।  मगर कांग्रेस ने राष्ट्रगीत को राजनीतिक कॉपीराइट क्यों नहीं बनाया, यह भी विमर्श का विषय है। राष्ट्रगीत से ‘अधिनायक’ शब्द को हटाने की अपील राजस्थान के गवर्नर कल्याण सिंह ने 7 जुलाई, 2015 को की थी। ‘सिंध’ को उद्धृत किये जाने को लेकर भी कई बार आपत्ति हुई है। असमगण परिषद् के विधायक फणि भूषण चौधरी का दावा है कि गुरुदेव ने मूल गीत में ‘कामरूप’ लिखा था, जिसे बदलकर ‘सिंध’ कर दिया गया।
सबसे दर्दनाक दास्तान राष्ट्रगीत को सुरों में ढालने वाले कैप्टन राम सिंह ठकुरी की है। उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने पेंशन देने से मना कर दिया था। ‘जन गण मन’, ‘कदम-कदम बढ़ाये जा’ व आईएनए का राष्ट्रगीत ‘शुभ सुख चैन की वर्षा बरसे’ को सुरों में बांधनेवाले कैप्टन राम सिंह ठकुरी दर-दर भटक रहे थे। तब सूबे के मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह थे। मामला अदालत में था, उसी दौरान 2001 में राम सिंह ठकुरी को लकवा मार गया। 15 अप्रैल 2002 को कैप्टन ठकुरी चल बसे। लखनऊ के भैंसाकुंड में दाह संस्कार के समय कैप्टन ठकुरी को सम्मान देने के लिए कोई बड़ा नेता या अफसर नहीं था, जिसे लेकर उत्तर प्रदेश शासन की आलोचना हुई थी। पता नहीं कवि जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी‘ ने क्या सोच कर लिखा था-‘शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले/वतन पर मरनेवालों का यही बाकी निशां होगा।’ क्या सचमुच ऐसा होता है?
pushpr1@rediffmail.com


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