पश्चिम एशिया की लड़ाई की धमक यूरोपीय राजधानियों में

शेष नारायण सिंह : सीरिया की लड़ाई में यूरोप के देशों और अमेरिका की भूमिका को लेकर वहां के बड़े अखबारों में मुख्य खबरें लगातार छाई हुई हैं। आज भी ऐसी ही स्थिति है। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट की मुख्य खबर रूसी राष्ट्रपति, व्लादिमीर पुतिन की तथाकथित पलटी को लेकर है।...

शेष नारायण सिंह

सीरिया की लड़ाई में यूरोप के देशों और अमेरिका की भूमिका को लेकर वहां के बड़े अखबारों में मुख्य खबरें लगातार छाई हुई हैं। आज भी ऐसी ही स्थिति है। अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट की मुख्य खबर रूसी राष्ट्रपति, व्लादिमीर पुतिन  की तथाकथित पलटी  को लेकर है। एक दिन पहले वे फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद से अपनी राजधानी में मिले थे जब फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने उनसे क्रेमलिन जाकर मुलाक़ात की थी। उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति से कहा था कि रूस को अमेरिकी नेतृत्व वाली उस सैनिक गठजोड़ के साथ सहयोग करने में कोई दिक्क़त नहीं है। यानी वे भी पश्चिमी देशों की उस लड़ाई में सीमित ही सही, सहयोग करने को तैयार हैं जिसने पश्चिम एशिया में एक खतरनाक संघर्ष की शुरुआत कर दी है। अमेरिकी निशाने पर फिलहाल इस्लामिक स्टेट के लड़ाके हैं। यह अलग बात है कि अभी कुछ दिन पहले तक अमेरीका और उसके साथी संगी, सीरिया की शिया हुकूमत को तबाह करने के  लिए  उसी इस्लामिक स्टेट की मदद करते पाए गए थे। फ्रांस के राष्ट्रपति को वचन देने के  बाद रूस ने जो पलटी मारी है वह अमेरिकी और यूरोपीय अखबारों की सुर्खियां हैं। यह अलग बात है कि भारत के अखबारों में इस खबर को वह रुतबा नहीं दिया गया है. रूसी राष्ट्रपति के निजी प्रवक्ता, दिमित्री पेस्कोव ने शुक्रवार को पत्रकारों को बताया कि दुर्भाग्य से अभी हमारे पार्टनर लोग इस तरह के किसी गठजोड़ में काम करने को तैयार नहीं हैं। सच्चाई यह है कि रूस किसी ऐसे गठजोड़ में शामिल नहीं होगा जो सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद की ही धुनाई की योजना पर काम कर रहा हो, उनकी शर्तें साफ हैं। वे उसी हालत में सीरिया के हमले में अमेरिका और उसके साथियों को सहयोग करने को तैयार हैं जब सीरिया के राष्टï्रपति को कूटनीतिक और सैनिक संरक्षण दिया जाए और इस्लामिक  स्टेट के आतंकवादियों के अलावा उन लोगों को भी निशाने पर लिया जाए जो सीरिया के शिया राष्टï्रपति को बेदखल करके वहां सुन्नी सत्ता कायम करना चाहते हैं। यह सभी लड़ाके अमेरिका की कृपा और उसके सहयोग से लड़ाई लड़ रहे हैं। ज़ाहिर है अमेरिका अपने इन चेलों के  खिलाफ कोई भी सख्त कार्रवाई करने को किसी भी सूरत में तैयार नहीं होगा। रूस का मानना है कि सीरिया के राष्टï्रपति असद की मर्जी के बिना उनके  देश में कोई भी सैनिक कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
ब्रिटेन के अखबार गार्जियन में भी फ्रांस के राष्टï्रपति ओलांद और  उनकी परेशानियों का जि़क्र है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने उनको वचन दिया है कि इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के ऊपर जिस हवाई हमले की योजना बन रही है ,उसमें वे मदद करेगें यानी उनकी फौज भी सीरिया के हमले में सक्रिय रूप से शामिल होगी। लेकिन ब्रितानी प्रधानमंत्री के रास्ते में बहुत अड़चनें हैं। ब्रिटेन के ज़्यादातर नेताओं को वह दिन भी याद है जब अमेरिकी राष्टï्रपति बुश की इराक हमले की योजना में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर बहुत बढ़-चढ़कर शामिल हुए थे और बाद में पता चला कि इराक के राष्टï्रपति, सद्दाम हुसैन के पास जिन सामूहिक नरसंहार के हथियारों की मौजूदगी का बहाना बनाकर सैनिक कार्रवाई की गयी थी , वे हथियार कहीं थे ही नहीं। आज तक ब्रिटेन को उस गलत फैसले के कारण मजाक का विषय बनने के लिए अभिशप्त होना पड़ रहा है।  ब्रिटेन में फौजी कार्रवाई के विरोध का आलम यह है कि उनके प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने फ्रांसीसी राष्टï्रपति ओलांद से अपने संसद सदस्यों के पास सीधी अपील करवाई है कि वे अपनी सरकार को  इस्लामिक स्टेट पर हवाई हमले के अभियान में शामिल होने की अनुमति दें। इसके एक दिन पहले ही प्रधाममंत्री कैमरन ने संसद सदस्यों से अपील की थी कि हवाई हमलों की सैनिक कार्रवाई को समर्थन दें। उन्होंने कहा था कि, 'ऐसा करने का कारण यह है कि आई एस आई एस से हमारे देश को और हमारी जीवन शैली को डाइरेक्ट ख़तरा है. इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने इसके पहले भी ब्रितानी नागरिकों को बंधक बनाकर मार डाला है और हमारे लोगों के ऊपर ट्यूनीशिया में 7/7 के हमले कर चुके हैं। हमें अपनी सुरक्षा अपने सहयोगियों  को आउटसोर्स  करके संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। हमारे दोस्त देश फ्रांस पर हमला हुआ है. अगर हम अभी शामिल नहीं होंगें तो जब हम पर हमला होगा तो सब पूछेगें तब कहाँ थे। Ó  फ्रांसीसी राष्टï्रपति  ने भी लगभग यही बात ब्रितानी संसद सदस्यों से कही और दावा किया कि उनका गठबंधन मानवता के यूरोपीय दृष्टिकोण की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। आज जब इंसान ही इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है ,तो आतंकवाद को ख़त्म करना यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों की बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। ब्रिटेन का हवाई हमलों में शामिल होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि लेबर पार्टी के बहुत सारे सदस्य इसके खिलाफ हैं। फ्रांस के विदेश मंत्री ने भी गार्जिन अखबार में एक लेख लिखकर ब्रितानी संसद सदस्यों से इसी आशय की अपील की है।  
ब्रिटेन पर सीरिया की लड़ाई को लेकर एक और मुसीबत खड़ी हो गयी है। लंदन के अखबार इंडिपेंडेंट ने लिखा है ब्रिटेन ने सउदी अरब को जो हथियार बेचे थे उन हथियारों का इस्तेमाल सीरिया के राष्टï्रपति बशर अल असद के खिलाफ और यमन में हो रहा  है। खबर है कि इन मिसाइलों का इस्तेमाल यमन में गैरसैनिक ठिकानों और नागरिक आबादी पर हो रहा है। ब्रितानी विदेश मंत्री फिलिप हैमंड के सलाहकारों और वकीलों से सरकार को  बता दिया है कि अगर यह साबित हो गया तो  ब्रिटेन पर युद्ध अपराधों के लिए मुक़दमा चल सकता है। ब्रिटेन ने यह विशेष मिसाइलें साउदी अरब को बेच रखी हैं। यह हथियार पश्चिमी यमन में युद्धरत हौथी शिया विरोधियों के खिलाफ लगाई गयी हैं। साउदी अरब इस इलाके में खाड़ी के उन सुन्नी शासकों की अगुवाई कर रहा है जो यमन के निर्वासित राष्टï्रपति,आबेद-रब्बो मंसूर हादी को उनकी सत्ता वापस दिलवाना चाहते हैं। इन हमलों में ब्रितानी मिसाइलों  का इस्तेमाल स्कूलों ,अस्पतालों आदि पर हो रही सैनिक कार्रवाई में भी हो रहा  है।  अमनेस्टी और ह्यूमन राइट्स वाच ने भी इसी तरह की चेतावनी  दी है।


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