परवेज हुदभॉय क्यों चिन्तित हैं?

सुभाष गाताड़े : परवेज हुदभॉय भारतवासियों के लिए अपरिचित नाम नहीं है! जानेमाने भौतिकीविद् और मानवाधिकार कार्यकर्ता के अलावा उनकी पहचान एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी के तौर पर है जिनके अन्दर बुनियादपरस्त ताकतों से लोहा लेने का माद्दा है। ...

सुभाष गाताड़े

परवेज हुदभॉय भारतवासियों के लिए अपरिचित नाम नहीं है! जानेमाने भौतिकीविद् और मानवाधिकार कार्यकर्ता के अलावा उनकी पहचान एक ऐसे सार्वजनिक बुद्धिजीवी के तौर पर है जिनके अन्दर बुनियादपरस्त ताकतों से लोहा लेने का माद्दा है। पाकिस्तान में इस्लामीकरण की बढ़ती आंधी में वह ऐसे शख्स के तौर पर नमूदार होते हैं, जो सहिष्णुता, तर्क$शीलता, नाभिकीय हथियारों से लैस दोनों पड़ोसी मुल्कों में आपस में अमन चैन कायम हो इसकी बात पर जोर देते रहते हैं। पिछले दिनों ‘डॉन’ अखबार में लिखे अपने नियमित स्तंभ में उन्होंने पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से प्रचारित किए जा रहे विज्ञान विरोध पर लिखा। ‘खैबर पख्तुनख्वा’ में प्रकाशित जीवविज्ञान की पाठ्यपुस्तक का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह उसमें चाल्र्स डार्विन के सिद्धांत को सिरे से खारिज किया गया है। किताब में लिखा गया है कि चाल्र्स डार्विन द्वारा प्रस्तावित इवोल्यूशन अर्थात विकासवाद का सिद्धांत ‘अब तक का सबसे अविश्वसनीय और अतार्किक दावा है।’ किताब इस धारणा को ही खारिज करती है कि संश्लिष्ट जीवन सरल रूपों से निर्मित हुआ। किताब के मुताबिक यह विचार कामनसेन्स/सहजबोध का उल्लंघन करता है और यह उतना ही ‘बकवास’ है जब यह कहा जाता हो कि दो रिक्शा के टकराने से कार विकसित होती है। हुदभॉय के मुताबिक प्रस्तुत किताब अपवाद नहीं है। खैबर पख्तुनवा की एक अन्य किताब बताती है कि ‘एक सन्तुलित दिमाग का व्यक्ति पश्चिमी विज्ञान के सिद्धांतों को स्वीकार नहीं कर सकता। /कहने का तात्पर्य सिर्फ पागल लोग स्वीकार सकते हैं ?/ सिंध की भौतिकी की पाठ्य पुस्तक स्पष्ट लिखती है कि ‘ब्रह्माण्ड तब अचानक अस्तित्व में आया जब एक दैवी आयत/श्लोक का उच्चारण किया गया।’ विज्ञान का यह विरोध निश्चित ही पाठ्य पुस्तकों तक सीमित नहीं है। वहां विज्ञान और गणित के तमाम अध्यापक अपने पेशे से असहज महसूस करते हैं।
अपने एक अन्य आलेख में वह भूतों-प्रेतों की ‘मौजूदगी’ को लेकर या पैरानार्मल परिघटनाओं का ‘तार्किक जामा’ पहनाने को लेकर वहां के शिक्षा संस्थानों में - जिनमें तमाम अग्रणी शिक्षा संस्थान भी शामिल हैं- आयोजित होने वाले ‘विशेषज्ञों’ के व्याख्यानों की चर्चा करते हैं, जिनमें भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। मुल्क के सबसे बड़े विश्वविद्यालय के एक ऐसे ही व्याख्यान के अंत में जिन्नों की मौजूदगी को लेकर ‘अंतिम प्रमाण’ के तौर पर वक्ता ने पूछा कि ‘आखिर हॉलीवुड का खरबों डॉलरों का व्यापार करने वाला फिल्मजगत हॉरर मूवीज या पैरानार्मल परिघटनाओं पर इतनी रकम बरबाद क्यों करता अगर उनका अस्तित्व न होता।’
पूरे मुल्क में बढ़ती इस बन्ददिमागी एवं अतार्किकता का जो परिणाम दिखाई दे रहा है, उसका निष्कर्ष निकालते हुए वह आगे बताते हैं- दुनिया में किसी भी अन्य इलाके की तुलना में पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में अतार्किकता तेजी से बढ़ी है और खतरनाक हो चली है। लड़ाईयों में मारे जाने वाले सिपाहियों की तुलना में यहां पोलियो कर्मचारियों की उम्र कम होती है। और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि, इस ह$कीकत को देखते हुए स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालय युवा मनों का प्रबोधन करने के बजाय उन्हें कुचलने में लगे हैं, अतार्किकता के खिलाफ संघर्ष निश्चित ही यहां अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है।
पड़ोसी मुल्क में बढ़ती बन्ददिमागी को लेकर हर वह शख्स चिंतित हो सकता है जो वैज्ञानिक चिन्तन, तर्कशीलता में ही नहीं समूची मानवता की बेहतरी में यकीन रखता हो। वैसे अगर हम अपने गिरेबां में झांकने की कोशिश करें तो लग सकता है कि यहां भी ऐसी कोशिशें जोर पकड़ती दिख रही है, अलबत्ता उस पर अधिक ध्यान नहीं गया हो। इतिहास अध्ययन में जनाब दीनानाथ बत्रा जैसे व्यक्ति का बढ़ता हस्तक्षेप इसी बात का संकेत देता है। याद रहे जनाब बत्रा न केवल कई भाजपाशासित कई राज्यों में शिक्षा के सलाहकार के तौर पर सक्रिय कर दिए गए हैं, बल्कि केन्द्रीय स्तर पर शिक्षा के भारतीयकरण को लेकर जो जानकारों की कमेटी बनी है, उसके भी वह अहम् सदस्य बताए जाते हैं। गुजरात सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए अनिवार्य बना दी गयी उनकी किताबों को पलटें, तो उनके चिन्तन का अन्दाजा लगता है। दो साल पहले गुजरात सरकार ने एक परिपत्र के जरिए राज्य के 42,000 सरकारी स्कूलों को यह निर्देश दिया कि वह पूरक साहित्य के तौर पर दीनानाथ बात्रा की नौ किताबों के सेट को शामिल करे।
प्रचारक से प्रधानमंत्री बने वजीरे आजम मोदी अम्बानी सेठ के अस्पताल के उद्घाटन के अवसर पर गोया बत्राजी की बातों को दोहराते दिखे थे जिसमें उन्होंने चिकित्सकीय विज्ञान को मिथकशास्त्र से जोड़ा था तथा गणेश और कर्ण की प्रचलित कहानियों के बहाने प्राचीन भारत में ‘प्लास्टिक सर्जरी’ और ‘जेनेटिक साइंस’ की मौजूदगी को रेखांकित किया था।
प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा वेबसाइट पर डाले गए उनके व्याख्यान के मुताबिक उन्होंने कहा था ‘हम गणेशजी की पूजा करते हैं। कोई प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने में जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर रख कर के प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया होगा।’
भारत के यह नए भाग्यविधाता किस तरह कुन्दजेहनी, बन्ददिमागी के दौर में यहां की जनता को ले जाना चाहते हैं, उसके बारे में कई बातें की जा सकती हैं, जहां ऐसे मौके अब अधिक सामने आते दिखते हैं जब संसद के पटल पर अनर्गल, अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों को परोसा जाता है। उदाहरण के तौर पर यह किस्सा मशहूर है कि टर्की की यात्रा पर निकले मौलाना आ•ााद ने जवाहरलाल नेहरू को यह सूचना दी कि वह टर्की के शासकों को कुरान की प्रति भेंट करना चाह रहे हैं, तब नेहरू ने उन्हें सलाह दी कि एक बहुधर्मीय मुल्क में जहां धर्मनिरपेक्षता का संघर्ष नाजुक मुकाम पर है, आप का किसी खास मजहब के नुमाइन्दे के तौर पर वहां जाना उचित नहीं होगा। इतना ही नहीं, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जब स्वाधीन भारत में कन्हैयालाल मुंशी ने वल्लभभाई पटेल के साथ मिल कर गांधी से मुलाकात कर सरकार से सहायता प्राप्त करने की बात कही तब उन्होंने साफ मना किया। उनका यह कहना था कि यह सरकार का काम नहीं है। साफ है नेहरू ने भी सेक्युलर मुल्क में मंदिर निर्माण के लिए सरकारी सहायता से साफ इन्कार किया।
बहरहाल, यह विचार महज किताबों या बहस मुबाहिसों तक सीमित नहीं है। यह फौरी तौर पर न केवल भारत में चल रहे ताज़ा अनुसंधानों की दिशा को भी प्रभावित कर रहा है, वहां फंड कटौती धड़ल्ले से हो रही है, और ऐसे अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो खास विचारधारा से प्रेरित है, जिसके लिए रिसर्च के पैमानों का उल्लंघन किया जा रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि जिसकी उपलब्धियां संदिग्ध हैं। चिकित्सा के रूप में गोमूत्र को बढ़ावा देने का विचार इसमें अहम् है। ‘तीसरी महत्वपूर्ण बात संसाधनों की कमी की आती है। एक पहलू पर अत्यधिक जोर ने विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान को मिल रहे पहले से सीमित फंड में भी कैची लग रही है। उदाहरण के तौर पर अक्टूबर 2016 में सरकार ने विज्ञान एवं औद्योगिक अनुसंधान रिसर्च /सीएसआईआर/का बजट आधा कम किया और उसे कहा कि वह उत्पादों को तैयार करके बाकी खर्चे जुटा लें, इतना ही नहीं, उसे यह भी कहा गया कि वह सोशल सेक्टर टेक्नालॉजी की तरफ अपना फोकस बनाए /जिसमें गोमूत्र पर अनुसंधान भी शामिल हो/ और उसकी मासिक प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करे। विडम्बना ही है कि अलसुबह हुई 2000 करोड़ रुपए की इस कटौती ने देश में अन्य स्थानों पर चल रहे रिसर्च के लिए सीएसआईआर के 38 सेन्टरों की मदद लेना नामुमकिन हुआ है। विडम्बना ही है कि एक तरफ सीएसआईआर जैसी स्थापित संस्था के फंड में कटौती करके देश भर में पहले से चल रहे अनुसंधान को प्रभावित किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे आयोजनों को विभिन्न सरकारी महकमों की तरफ से 12 करोड़ रुपए का अनुदान दिया गया है- जिसका आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी एक संस्था कर रही है।


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