नोटबंदी : सरकार की आंख का अंजन चोरी

चिन्मय मिश्र : ककहते हैं जब दर्द हद से गुजर जाता है तो खुब-ब-खुद दवा बना जाता है। नोटबंदी के दर्द को अब तक हम सभी अपने-अपने तरीके से महसूस कर रहे थे और 50 दिन बीत जाने का इंतजार कर रहे थे। ...

चिन्मय मिश्र

कहते हैं जब दर्द हद से गुजर जाता है तो खुब-ब-खुद दवा बना जाता है। नोटबंदी के दर्द को अब तक हम सभी अपने-अपने तरीके से महसूस कर रहे थे और 50 दिन बीत जाने का इंतजार कर रहे थे। परंतु झारखंड के गिरीडीह जिले के प्रतापपुर गांव की शाबिजान बीबी ने नोटबंदी का स्थायी हल निकाल लिया। उसने अपने आठ बरस के बेटे शेखावत और छ: बरस की बेटी शैराबानो को कु एं में फेंक कर मार दिया और अब वह जेल में है। उसका पति शौकत अंसारी मुंबई में काम करता था परंतु नोटबंदी से बेरोजगार हो गया और खाली हाथ वापस गांव लौट आया। बच्चे दो दिन से भूखे थे और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अन्तर्गत पात्र होने के बावजूद उन्हें कभी भी समय पर नि: शुल्क राशन नहीं मिलता था। मां का कहना है, ‘बच्चे दो दिन से भूखे थे। वह उनकी यह यंत्रणा और अधिक नहीं देख पाई।’ जाहिर है अब सारी सरकारी मशीनरी उसके इस दावे को नकारने में जुट जाएगी। और वे इसमें कामयाब भी हो जाएंगे।
नोटबंदी की असफलता या सफलता का आकलन कब होगा यह तो नहीं पता लेकिन अखबारों के मुखपृष्ठ के भी आगे (जैकेट) छपे पेटीएम जैसी कंपनियों के पूरे पृष्ठ के विज्ञापन साफ दिखा रहे हैं कि नोटबंदी से किसके हिस्से क्या आया है। चर्चित पुस्तक रोड टू रुइन (बर्बादी का मार्ग) के लेखक जिम रिकाड्र्स लिखते हैं, ‘यूरोप और अमेरिका में लंबे समय से पूरी ताकत से यह युद्ध जारी है। सरकारें योजनाबद्ध तरीके से नकारात्मक ब्याज दर, राजसात करने वाले कराधान व तमाम अन्य तकनीकों से बचतकर्ताओं से उनकी संपत्ति लूट रही हैं। वह ऐसा करने के लिए बाध्य कर रहे हैं कि सभी बचतें सरकार नियंत्रित विशाल बैंकों में डिजिटल खातों के माध्यम में पहुंच जाएं। जब तक बचतकर्ता अपने पास नकदी रख पाएंगे तब तक वे इन राजसात करने वाली तमाम तकनीकों से स्वयं को बचा पाएंगे। अतएव यह अनिवार्य है कि सरकारें नकदी को विलुप्त या बहिष्कृत कर दें।’
हम भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों की हालत और उनके एनपीए (खराब ऋण) देख रहे हैं। वह ऋण किनके पास हैं, यह एक खुला रहस्य है जिसे सरकार तो क्या सर्वोच्च न्यायालय भी उद्घाटित नहीं करना चाहता। सन् 2014-15 में एनपीए 5 प्रतिशत जो कि सन् 2015-16 में 9.5 प्रतिशत यानी दुगुना हो गया है। यदि आज सार्वजनिक बैंक एनपीए से छुटकारा पाना चाहेंगे तो उनकी 60 प्रतिशत संपत्ति समाप्त हो जाएगी। गौरतलब है  सन् 2014-15 में बैंकों का लाभ 36350 करोड़ रुपए था जो कि सन् 2015-16 में घटकर 17,672 करोड़ रुपए यानी आधे से भी कम रह गया है। यह है ‘मोदी सरकार  के आधे कार्यकाल की महानतम उपलब्धि!’
सरकार मोदी जी अपनी नोटबंदी को लेकर काफी वाचाल हैं। वह यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि कहीं कोई चूक हुई है या हो रही है। बुंदेली कहावत है, ‘अपने मठा खों, को पतरा केत/ अपनी मताई को खों को  डाकन केत/’ एक भयानक भूल को सुधारने की जगह सरकार अब इसे न्यायोचित ठहराने पर तुल गई है। कैशलेस (नकद रहित) से लैस केश (कम नकदी) की बात तो छोड़ ही दीजिए कैश (नकदी) की कमी के चलते हम वस्तु विनिमय (बार्टर सिस्टम) वाली आदिम प्रणाली में पहुंच गए हैं। तुगलक ने कम से कम चमड़े के सिक्के तो बनाए थे, यहां तो अब मुद्रा ही उपलब्ध नहीं है। यदि आपके बैंक खाते में दो हजार रुपए से कम हैं तो आप एटीएम से भी नकदी प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि अधिकांश एटीएम में दो हजार से कम के नोट ही नहीं हैं। अब भी क्या हम इस योजना को ‘गरीब कल्याण योजना’ मानेंगे? कहते हैं न, ‘पांसा परे सो दांव, राजा करे सो न्याव’ अब मोदी जी राजा भी नहीं हंै और चूंकि वे चुने हुए नेता हैं इसलिए उन्हें तानाशाह कहना भी अनुचित है। तो क्या हम उन्हें सीरिया के राष्ट्रपति असद या रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की श्रेणी में रख सकते हैं? इसे समय पर छोड़ देना चाहिए। शासन की नीतियां भी काफी मजेदार हैं। एक तरफ मांग में कमी आने से गेहंू की कीमतें घट रही हैं वहीं दूसरी ओर सरकार ने गेहंू पर आयात कर शून्य कर दिया। यानी किसान के हित में जबरदस्त कदम! उसका गेहंू सड़ेगा और बड़े व्यापारी अपनी जरूरत की पूर्ति विदेशों के सस्ते अनाज से करेंगे। यह स्पष्ट है कि नोटबंदी से बनारस, महेश्वर, चंदेरी जैसे तमाम हाथकरघा केंद्रों की स्थिति दयनीय हो गई है। खेती के बाद सर्वाधिक रोजगार यही (हेंडीक्राफ्ट के साथ) क्षेत्र देता है। परंतु वहां फैली मुर्दनी बता रही है कि आने वाला समय उनके लिए कितना चुनौतीपूर्ण होगा। धीरे-धीरे यह वातावरण बनता जा रहा है कि भारत से अब गरीबी नहीं गरीब ही विलुप्त होंगे। कैसे? नोटबंदी ने हमें एक बार फिर समझा दिया है कि भारत में नागरिक की अपनी कोई निजता नहीं है। सबेरे उठकर शौच जाने से लेकर रात को सोने तक आपको वही करना है जो सरकार कहे। आपके घर शौचालय नहीं  है तो आपका बच्चा विद्यालय में जलील होगा और आप हर सरकारी विभाग में। उधर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कह दिया है कि नोटबंदी के बाद अगला कदम नसबंदी होना चाहिए। क्या करें? अपनी बात को अभिव्यक्त करने के लिए शब्द भी अपर्याप्त लगते हैं तभी तो कहावतें व लोकोक्तियां याद हो आईं। वो कहते हैं न, ‘मकड़ी अपनेई जार खों खा लेत।’ यानी अपने हाथों से सर्वनाश! भारतीय संविधान की प्रस्तावना लोकतंत्र, समस्त नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता और समानता दिलाने को प्रतिबद्ध है। वह व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। परंतु आज जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ आर्थिक मसला नहीं है। यह राजनीतिक होने के साथ ही साथ हमारे मूल अधिकारों के सर्वथा उल्लंघन का भी है।
इस नोटबंदी से कालाधन वापस आएगा या नहीं! इससे अमीरों/गरीबों को फायदा होगा या नहीं! या ऐसे तमाम सवालों से ऊपर सवाल यह है कि हमारे नीति निर्माता क्या गोपनीयता की आड़ में ऐसा निरंकुश कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हैं? यदि वह यह अनुमान नहीं लगा पाए कि इससे देश के जनता को कितनी त्रासदी भोगनी पड़ेगी, तो उनका नैतिक तौर पर सत्ता में बने रहना ही अनुचित है। राष्ट्रीयता और देशभक्ति के नाम पर अपने से असंतुष्टों का मुंह जबरन बंद करना बेहद लज्जाजनक है। एक अच्छी भली सामाजिक व्यवस्था को इस तरह तहस-नहस करने का अधिकार क्या सिर्फ बहुमत दे देता है? एक लोकप्रिय कहावत है, ‘बिच्छू का मंत्र न जाने सांप के बिल में हाथ डाले।’ महज 6 बाबूओं के भरोसे सारे देश को मुफलिसी का स्वाद चखा देना किस प्रकार का लोकतंत्र है? अपनी चूक या विफलता को प्रचारतंत्र की सहायता से  उपलब्धि बताने में एनडीए सरकार को महारत हासिल है। बैंकों में हेराफेरी से करोड़ों नए नोट अपात्रों के हाथ में जाने को लेकर कोई लज्जा नहीं है। बल्कि उनकी बरामदगी को महिमामंडित कर स्वयं को कालेधन से लडऩे का पुरोधा बताया जा रहा है। इस नोटबंदी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि हमारे अधिकांश भारतीय राजनीतिज्ञ अपने देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक  व आर्थिक ही नहीं, बल्कि भौगोलिक परिस्थितियों तक से अपरिचित हैं। चेन्नई व आसपास आए तूफान के बाद वहां पर ‘कैशलैस इकॉनामी’ जो कहर बरपा रही है वह ‘वरदा’ तूफान से भी ज्यादा त्रासदायी है।
इस नोटबंदी से यदि हम सबक लें कि ‘मरघटा की लकडिय़े’ किसी और काम नहीं आती तो बेहतर होगा। जो लकड़ी एक बार मरघट में आ जाती है फिर वह राख बनकर ही बाहर निकलती है। हमें अपने हाथ की बिलैया छोड़ के, म्याउं म्याउं करबो’ की मानसिकता को छोडऩा होगा। संसद के इस सत्र में (आलेख लिखे जाने तक) कोई कार्य नहीं हो पाया है। यहां तक कि नोटबंदी पर बहस भी। सरकार को चाहिए कि वह जनता में विश्वास की पुनस्र्थापना के लिए 1 जनवरी, 2017 से संसद का एक आपातसत्र सिर्फ  नोटबंदी पर चर्चा के लिए आमंत्रित करे।  कालाबाजारियों की प्रतिभा को क्या कहें, वह तो सरकार की आंख से अंजन तक चुरा ले गए। सरकार अवाक् देखती रह गई और सारा कालाधन बैंक में आ गया। जौंक ने कहा है- कितने मुफलिज हो गए कितने तवंगर हो गए, खाक में जब मिल गए, दोनों बराबर हो गए।
हमें जीते जी बराबर होने की जद्दोजहद करना होगी।                                                                 


 

देशबंधु से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें
facebook फेसबुक पर फॉलो करे.
और
facebook ट्विटर पर फॉलो करे.

Deshbandhu के आलेख

क्या मौजूदा किसान आंदोलन राजनीति से प्रेरित है ?