नोटबंदी : फेल तो होना ही था!

राजेन्द्र शर्मा : नोटबंदी सचमुच दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक निकली। हिम्मत दिखाने के दिखावे को छोडक़र, अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल करने में उतनी ही नाकाम और देश से उतनी ही ज्यादा कीमत वसूल करने वाली। ...

राजेंद्र शर्मा

नोटबंदी सचमुच दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक निकली। हिम्मत दिखाने के दिखावे को छोडक़र, अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल करने में उतनी ही नाकाम और देश से उतनी ही ज्यादा कीमत वसूल करने वाली। नोटबंदी की नाकामी का सबूत और किसी ने नहीं, खुद रिजर्व बैंक ने यह कहकर दे दिया है कि नोटबंदी का एक महीना पूरा होने तक ही, एक हजार और पांच सौ रुपए के खारिजशुदा नोटों में पूरे 11.55 लाख करोड़ रुपए बैंकिंग व्यवस्था में वापस आ चुके थे। खुद रिजर्व बैंक के अनुसार, यह इन नोटों में देश में चलन में मौजूद कुल नकदी का पूरे 81 फीसद हिस्सा होता है। 2016 के मार्च के आखिर में, कुल 14.17 लाख करोड़ रुपए पांच सौ और हजार रुपए के नोटों में चलन में थे। यह समझने के लिए किसी भारी विशेषज्ञता की जरूरत नहीं होगी कि बाकी तीन हफ्तों में चलन में मौजूद इन नोटों का बाकी हिस्सा भी बैंकिंग व्यवस्था में लौट चुका होगा। वास्तव में नोटबंदी का पहला महीना पूरा होने की पूर्व-संध्या में सरकार के वित्त सचिव ने एक संवाददाता सम्मेलन में इस सच्चाई को स्वीकार भी कर लिया था, हालांकि बाद में इसके निहितार्थों को पहचान कर उन्हें अपने मुंंह से ऐसी बात कहने का खंडन करना पड़ा था। खारिजशुदा नोटों में लगभग सारी राशि के व्यवस्था में लौट आने का सीधा-सीधा मतलब होगा कालेधन, भ्रष्टïाचार और आतंकवादी फंडिंग पर भी प्रहार करने में नोटबंदी के हथियार का पूरी तरह से विफल हो जाना।
याद रहे कि नोटबंदी के कदम को अपने घोषित लक्ष्यों में सफलता, ठीक इसी रूप में मिलने जा रही थी कि कालाधन या भ्रष्टïाचार से कमाया गया पैसा या आतंकवादी फंड, हिसाब-किताब में आने के डर से व्यवस्था में वापस नहीं आने जा रहा था। इस तरह 30 दिसंबर की अंतिम तारीख के बाद इन नोटों में जमा पैसा, खुद ब खुद नष्टï हो जाने वाला था। अचरज नहीं कि नोटबंदी को शुरू-शुरू में दूसरी सर्जिकल स्ट्राइक के रूप में प्रचारित भी किया गया था। नोटबंदी की घोषणा के साथ ही उसके समर्थकों की ओर से इसके अनुमान भी पेश किए जाने शुरू हो गए थे कि इस तरह मिट्टïी हो जाने वाला पैसा, कितना होगा? जानकारों द्वारा भी आम तौर पर बड़े नोटों की नकदी के 25 से 30 फीसद तक हिस्से के इस प्रहार से नष्टï हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा था। बाकायदा 3.4 लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा भी पेश किया गया था। लेकिन, सच्चाई क्या है? तीन सप्ताह का समय बाकी है और मुश्किल से ढाई लाख करोड़ रुपए की राशि उक्त नोटों में आने के लिए रहती है। नोटबंदी के फैसले के वे आलोचक ही सही साबित होते न•ार आते हैं, जिन्होंने शुरू में ही आगाह कर दिया था कि नोटबंदी का यह कदम, नकदी के रूप में जमा कर के रखे जा रहे कालेधन का भी एक छोटा सा ही हिस्सा नष्टï कर पाएगा, फिर कालेधन की समूची अर्थव्यवस्था को ध्वस्त करने की तो बात ही करना बेकार है। सच तो यह है कि इसी सच्चाई को पहचान कर खुद सरकार नोटबंदी के बीच में ही, आयकर कानून में संशोधन की आड़ में, कालेधन की घोषणा और वास्तव में फिफ्टी-फिफ्टी के आधार पर कालेधन को सफेद करने की एक और योजना भी ले आई है।
यह भी गौरतलब है कि नोटबंदी के प्रहार से कालेधन की भारी मात्रा के नष्टï हो जाने के इन्हीं अनुमानों की रेत पर नोटबंदी से अंतत: जनता को पहुंचने वाले लाभों के अनेक महल खड़े किए गए थे। कहा जा रहा था कि इस तरह लाखों करोड़ रुपए का कालाधन नष्टï होने से, किसी प्रकार सरकार के हाथों में इतनी ही राशि आ जाएगी। और इस तरह अचानक आई संपन्नता के बल पर सरकार, दिल खोलकर गरीबों के कल्याण पर और ढांचागत क्षेत्र में निवेशों आदि पर खर्चा करेगी। इसी तरह के ‘दूरगामी लाभ’ के दिलासों के आधार पर जनता से नोटबंदी की ‘फौरी परेशानियां’ झेल लेने के लिए कहा जा रहा था, अब भी कहा जा रहा है और जाहिर है कि आगे भी कहा जा रहा होगा।  लेकिन, न सिर्फ नोटबंदी से बेकार होने वाली संभावित रकम के तेजी से घटते जाने ने इन सारे ताश के महलों को गिरा दिया है, इसी बीच खुद रिजर्व बैंक के गवर्नर ने यह भी स्पष्टï कर दिया है कि अंतत: जो थोड़ी-बहुत राशि इस तरह नष्टï होती भी है, उसके सरकार के खाते में पहुंच जाने की अटकलों का कोई आधार नहीं है। सरकार की खर्च करने की सामथ्र्य नोटबंदी के इस असर से अप्रभावित ही रहेगी।
वास्तव मेें नोटबंदी के महीने भर में साफ हो गई अपने घोषित लक्ष्यों को हासिल करने में उसकी घोर विफलता को ही देखकर और उसकी जनता के बीच भारी प्रतिक्रिया की आशंका से मोदी सरकार ने और खुद प्रधानमंत्री मोदी ने भी, नोटबंदी के लक्ष्यों को ही बदलने की कवायद शुरू कर दी है। कालाधन-मुक्त की जगह, अब देश और अर्थव्यस्था को कैश-मुक्त बनाने का शोर है। नोटबंदी का एक महीना पूरा होने पर जहां संसद में विपक्ष ने एकजुट होकर ‘काला दिवस’ मनाया, वहीं वित्त मंत्री ने इसके जवाब में कैश-लेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए पूरी ग्यारह रियायतों का ऐलान किया। और खुद प्रधानमंत्री ने इस मौके पर ट्विटर के माध्यम देश को यह याद दिलाना खासतौर पर जरूरी समझा कि नोटबंदी, ‘हमारे लिए इसका भी मौका है कि नकदीरहित भुगतानों को अपनाएं और नवीनतम प्रौद्योगिकी को आर्थिक लेन-देन का हिस्सा बनाएं।’ जाहिर है कि मोदी सरकार लक्ष्य ही बदलकर, नोटबंदी के अपने फैसले की जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रही है।
इस एक महीने में यह भी खुलकर सामने आ गया है कि इस नोटबंदी की देश को बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। यह कीमत महीने भर बाद भी देश भर में हर समय दसियों लाख लोगों के अपना ही पैसा हासिल करने के लिए लाइनों में लगे होने की तकलीफ तक ही सीमित नहीं है, हालांकि महीने भर में सौ से ज्यादा लोगों की जानें ले चुकी यह तकलीफ भी कोई मामूली नहीं है। इससे भी बढक़र यह कीमत देश की आर्थिक गतिविधियों पर ही हमले की है। मनमोहन सिंह के नोटबंदी से जीडीपी में 2 फीसद की कमी के अनुमान के बाद, अब तो खुद रिजर्व बैंक ने भी चालू वित्त वर्ष के वृद्घि दर के अनुमान में 0.5 फीसद की कमी कर दी है। जो वृद्घि दर पहले 7.6 फीसद रहने का अनुमान था, अब 7.1 फीसद ही रह जाने वाली है। इस गिरावट अलग-अलग एजेंसियों के अनुमानों में तो अंतर हो सकता है, लेकिन यह स्वत: स्पष्टï है कि इसकी सबसे बुरी मार अनौपचारिक क्षेत्र यानी खेती व दस्ताकारी आदि समेत छोटे व्यापार तथा छोटे उद्यमों और उनमें काम करने वालों पर ही पड़ रही है। एक नाकाम कदम की इतनी भारी कीमत। वास्तव में इसे मूर्खता कहना भी इसके नुकसान की गंभीरता को घटाना है।


 

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