नोटबंदी : कितनी सार्थक और कितनी कष्टकारी

शीतला सिंह : एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वीकार कर रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में कालेधन के पापी तो कुछ थोड़े से लोग हैं, लेकिन उन थोड़े से पापियों पर अंकुश के लिए उन्होंने जो नोटबन्दी की है उससे परेशान सारा देश है। ...

शीतला सिंह
शीतला सिंह

एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वीकार कर रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में कालेधन के पापी तो कुछ थोड़े से लोग हैं, लेकिन उन थोड़े से पापियों पर अंकुश के लिए उन्होंने जो नोटबन्दी की है उससे परेशान सारा देश है। परेशानहाल आम लोगों की बैंकों में उमड़ रही भीड़ इतने दिनों के बाद भी कम नहीं हो पाई है और कई एटीएम तो अभी तक चुप हैं। केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली का कहना है कि गड़बड़ाई व्यवस्था को पटरी पर लाने में कम से कम तीन हफ्ते लगेंगे, जबकि जानकारों का अनुमान है कि अब नयी व्यवस्था का लाभ लोगों को नये साल में ही मिल सकेगा क्योंकि इस बात की अभी कोई गारंटी नहीं है कि अपेक्षित तीन सप्ताह में एटीएमों की तकनीक को नये नोटों के अनुरूप ढालने का काम पूरा कर लिया जायेगा। पांच सौ और दो हजार के नये नोटों का वजन और लम्बाई बंद किये गये पांच सौ व एक हजार के नोटों से भिन्न है और यांत्रिक गतिविधियों वाली डिजिटल अर्थव्यवस्था को नये सिरे से उनके अनुसार संचालित करने में देर भी लग सकती है।
प्रधानमंत्री ने 8 नवम्बर के विशेष प्रसारण में नोटबंदी की घोषणा की थी, तो कहा था कि बैंक केवल एक दिन 9 नवम्बर को ही बन्द रहेंगे, 10 नवम्बर से उनका काम आरम्भ हो जायेगा और एटीएम 11 नवम्बर से नये नोट उगलना शुरू कर देंगे। लेकिन लगता है कि उनकी मशीनरी ने उन्हें इस सम्बन्धी तकनीकी दिक्कतों से वाकिफ  नहीं कराया था। न ही उसकी व्यावहारिकता की परख की थी, जिससे कठिनाइयों को समय रहते हल किया जा सके। शायद इसीलिए अब, जब कड़वी वास्तविकताएं उजागर हो रही हैं, तो वे अतिविनम्र होकर उस देश से ‘पचास दिन’ मांग रहे हैं, जिसने उन्हें पहले ही पांच साल दे रखे हैं।
अब प्रधानमंत्री कुछ भी कहें, उनके इस कदम से सबसे अधिक परेशान वही हैं, जिन्हें देश में सबसे अकिंचन, साधारण, छोटे और मध्यम कहा जाता है। दूसरी ओर करोड़ों और अरबों का कालाधन उपजाने वाले निद्र्वन्द्व हैं। बड़े शहरों के स्वर्ण व्यवसायियों ने नोटबंदी की रात और दूसरे दिन अरबों का सोना मनमाने दामों पर बेचकर स्थिति का लाभ उठाया, लेकिन अब वे जांच-पड़ताल के समय दूकानों में ताले लगाकर ‘सौदा पटने का’ इंतजार कर रहे हैं। यह सौदा उन्हें मुख्य रूप से आयकर विभाग को पटाकर निपटाना है, जिसके विभिन्न करतब और उपाय वे पहले से ही जानते हैं। उनका कहना है कि हमें आम खाने से मतलब है, गुठली गिनने से नहीं। गुठली गिनने का काम तो सरकार को करना है।
देश में अभी तक आयकर की कोई सुचारु, सुविचारित या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं बनाई गई है। न ही जो व्यवस्था है, उसके अवगुणों के खात्मे के उपाय कर ऐसे हालात बनाये गये हैं, कि उस पर आंख बंद करके विश्वास किया जा सके। इसके बावजूद प्रधानमंत्री यह कह रहे हैं कि हम तो 30 दिसम्बर के बाद आजादी के बाद से अब तक का हिसाब लेंगे, तो उनका लक्ष्य जो भी हो, सर्वाधिक अंदेशा उस आम आदमी को ही होता है, जो सबसे अधिक परेशान है। दूसरी ओर कालेधन के पापियों की मानसिकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस जन-धन योजना के खाते खुलवाकर उन्होंने बड़ा यश लूटा था और जिनमें से ज्यादातर अभी तक खाली पड़े थे, नोटबन्दी से उनमें भी धन जाने लगा है।
आयकर विभाग के निर्देशों के अनुसार किसी भी खाते में, जिसके धारक के पास आयकर का स्थायी खाता नम्बर (पैन) न हो, एक बार में पचास हजार से कम रुपये ही बैंक में जमा किये जा सकते हैं। लेकिन इन खबरों के बाद कि जन धन के खाते का प्रयोग कई लोग अपनी अनुचित कमाई छिपाने के लिए कर रहे हैं और उनमें अपना कालाधन जमा करा रहे हैं, सरकार कह रही है कि वह इसकी भी जांच करायेगी। ऐसे में ढाई लाख तक का धन कहां से आता है, यह भी जांच का विषय हो जायेगा तो आम लोग इसका लक्ष्य बनेंगे ही और परेशान भी होंगे ही होंगे। दूसरी ओर हम देख रहे हैं कि जिनकी गिनती उद्योगपतियों में हैं और जो करोड़ों और अरबों में खेलते हैं, उन्हें छूने के लिए कोई आगे नहीं बढ़ रहा है।
सवाल यह भी है कि यदि 500 और 1000 रुपये के नोटों में ही कालाधन छिपाया जा रहा था, तो अब तो 2000 के नोट भी आ गये हैं। यानि भविष्य में कालाधन छिपाना कठिन के बजाय आसान हो जायेगा। ऐसे में भविष्य में काला धन न बढ़ सके, इसके लिए कौन से उपाय किये गये हैं, कोई नहीं जानता। फिलहाल, कालाधन न बढ़े, इसके लिए झूठ, बेईमानी, दगाबाजी, चोरी, डकैती और अनुचित साधनों की प्रवृत्तियों का निवारण जरूरी है। जब तक ऐसी व्यवस्था नहीं बन जाती, सामाजिक अन्याय व विषमता बनी रहती है, साथ ही शोषण को प्रश्रय देने वाले नियम-कानून विद्यमान रहते हैं, तब तक अनुचित धन जमा करने की होड़ को भी नहीं रोका जा सकता।
ऐसे में समझ में नहीं आता कि नई व्यवस्था का वह कौन सा उद्देश्य है जो खाली नोट बन्दी से पूरा हो गया है? कालाधनजनित स्थायी सम्पत्तियों, भूमियों, उद्यमों-व्यवसायों और अनुचित प्रवृत्तियों का समापन तो हुआ ही नहीं। देश में उद्योग-व्यवसाय की अनुकूलताओं सम्बन्धी विश्वबैंक की हाल की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में साधारण और जायज काम भी देर से ही होता है। यह देरी किन-किन क्षेत्रों में और कैसे हो रही है, रिपोर्ट में इसे भी गिनाया गया है। ढाई साल के मोदी के शासन में स्थिति में कोई सुधार हुआ हो, इसका उसमें उल्लेख तक नहीं है। यह रिपोर्ट उन लोगों ने तथ्यों, वास्तविकताओं और आंकड़ों के आधार पर तैयार की है जो कारणों की जांच कर रहे थे और जिनका इसे ढंकने या बढ़ाने में कोई स्वार्थ नहीं था।
जनता इस नोटबंदी का स्वागत और विरोध किस रूप में करती है, यह चुनाव परिणामों से ही पता चलेगा। लेकिन अब देवास और नासिक के नये नोट छापने वाले सिक्योरिटी प्रेसों से जिस तरह यह खबरें छनकर आ रही हैं कि उन्हें एक जनवरी से नये नोट लांच करने की बात बताई गई थी और अब उन्हें बेहद हड़बड़ी में काम करना पड़ रहा है, उससे अंदेशा होता है कि कोई एक बड़ी गड़बड़ी अर्थव्यवस्था के ध्वंस का खतरा न पैदा कर दे। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री होने के नाते कम से कम इसका ध्यान तो रखना ही चाहिए।


 

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